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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 869 में से

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पृष्ठ 281

दसवाँ अध्याय २६५
आपने बोध कराया। इससे मैं बड़ी असमंजस में पड़ गया हूँ। भगवन्! एक ही को एक ही समय बन्धन और
मुक्ति कैसे होगी? हे अनंत! आप कृपालु हैं। इसलिये इसमें सत्य क्या है यह बतायें। मुक्ति को आप आगंतुक
कहें तो मोक्ष अनित्य हुआ और बन्धन को आगंतुक कहें तो उसका आदि भी हुआ। पहले बन्धन था ही नहीं वह
आज से उत्पन्न हुआ इस प्रकार यदि कहा जाय तो वह शास्त्रार्थ के विरुद्ध होगा। श्रुति, स्मृति और शास्त्रों के
अनुसार मुक्ति और बन्ध अनादि सिद्ध हैं और आत्मा एक होते हुए उसकी ये दो अवस्थाएँ? और वे भी एक
दूसरे के विपरीत? यह बात कितनी विचित्र है? यदि बद्धता बढ़ती है तो वह मुक्ति का छल करेगी और मुक्ति
बिफर जाय तो वह बन्धन को को भी निगल लेगी। ये परस्पर विरोधी स्थितियाँ आत्मा के पास किस तरह रह
पाती हैं? यदि शाम को भोर होगी तभी विद्या और अविद्या एक होगी, सूर्य यदि अन्धकार की गठरी बाँध दे तंभी
ये अवस्थायें आत्मा के साथ रहेंगी। हींग को यदि कर्पूर की गन्ध आने लगे, यदि अविद्या विद्या के बीच आये,
खरगोश यदि शेर पर टूट पड़े तभी ये अवस्थाएँ आत्मा के साथ रहेंगी। उद्धव ने कहा, "हे कृष्णनाथ! ये दो
अवस्थाएँ कैसी हैं यह समझ में आ जाय तो समझो मुक्ति भी हाथ लग गयी, ऐसा मैं निःसन्देह समझता हूँ।"
उसने पुनः कहा, भगवन्! तुम ही मोक्षदाता हो, इसलिये मुझे वे अवस्थाएँ स्पष्ट करके बतायें। इतना कह कर
उसने उनके चरणों पर मस्तक रख दिया। उद्धव का यह मार्मिक प्रश्न सुनकर नारायण परम संतुष्ट हुए। मेरा
उद्धव अब ज्ञानी हो गया इस विचार के मन में आते ही वे आनन्द से डोलने लगे। परमार्थ के प्रति उसकी
छटपटाहट तथा उसके प्रश्न का महत्त्व ध्यान में लाकर वे अपनी काया उद्धव पर न्यौछावर करने के लिये तैयार
हो गये। भगवान् भक्तों के वचन का कभी उल्लंघन नहीं करते। इसके लिये उन्होंने अपने गुप्त ज्ञान का भण्डार
खोल दिया। सचमुच, जब परमेश्वर प्रसन्न होता है तो वह भक्तों पर अपार कृपा ही करता है। उद्धव का प्रश्न
गहरा होने के कारण जगजीवन कृष्ण कृपा से द्रवित हो उठा। एका जनार्दन (एकनाथ) विनयपूर्वक बताता है
कि वह आनन्द का मेघ ही बन कर आया। उसकी वृष्टि से अब शिष्यरूप नदी में आनन्द की बाढ़ आयेगी
जिसके फलस्वरूप शिष्य ज्ञानगंगा के समुद्र से जा मिलेगा। संसार की आस्था छोड़कर जो भक्तिमार्ग पर चल
पड़ा वही इस भागवत का सच्चा अधिकारी है और वही परमार्थ का वास्तविक ग्राहक है और जिसके पेट में
संसार की ही चिन्ता है, उसके मन में यह कथा सुनकर विपरीत भावनाएँ उत्पन्न होंगी क्योंकि चित्त जिस चीज
का चिन्तन करता है वैसे ही होता है। जब तक चित्त सावधान और स्थिर नहीं है तब तक भागवत समझ में नहीं
आयेगा। उसी प्रकार गुरु के बिना भागवत का अर्थ प्राणियों की समझ में नहीं आयेगा। जो संसार से विरक्त होगा,
जो गुरु-चरणों के प्रति अनुरक्त होगा उसे ही परमार्थ प्राप्त होगा और उसे ही भागवत की फलप्राप्ति होगी।
श्रीकृष्ण का मुख देखकर ही उद्धव को नित नया समाधि सुख प्राप्त होता था, फिर भी और अधिक सुनने की
उसे इच्छा थी, इतनी महान थी उसकी श्रद्धा। जिसका वेदों ने भी प्रतिपादन किया है ऐसा वह ज्ञानस्वरूप
परमात्मा श्रीकृष्ण, जिसका गुह्यज्ञान बार-बार सुनने को मिले इसलिये उसने नितांत योग्य प्रश्न ही पूछा था। अब
भगवान श्रीकृष्ण विद्या और अविद्या का निराकरण करेंगे। यह अगला अध्याय बहुत सरस है। श्रोतागण मेरी ओर
ध्यान दें। श्रीकृष्ण और उद्धव के बीच हुए संवाद की कथा अत्यन्त आह्लाद देने वाली है। इससे एका जनार्दन
(एकनाथ) में भी महाज्ञान और परमानंद प्रकट होगा।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे श्रीकृष्ण उद्धव संवादे
परमहंस संहितायां एकाकार टीकायां दशमोध्यायः ॥ १० ॥
श्री कृष्णार्पणमस्तु ।

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