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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 869 में से

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पृष्ठ 282

ग्यारहवाँ अध्याय
श्री गणेशाय नमः! श्री कृष्णाय नमः! हे ओंकाररूप श्री गुरु! तुम्हें नमस्कार है। तुम सत् और चित् के मेघ
हो। तुम स्वानंद जीवन की वृष्टि करते हो जिससे मुमुक्षुरूपी मयूरों को आनन्द होता है और वे हर्ष से नाचने
लगते हैं। उन सजल मेघों को देखकर वे 'सोऽहं' अर्थात् 'मैं ब्रह्म हूँ' का आर्तनाद करने लगते हैं और
रोमांचरूपी पंख खोलकर अत्यन्त तीव्र गति से सत्त्व का नृत्य करने लगते हैं। स्वानंद के आवेग में नृत्य करने के
कारण उनके सारे शरीर में बड़ी-बड़ी आँखें उभर आती हैं और वे सारे पंख शोभित हो जाते हैं, इसीलिये
श्रीकृष्ण उन पंखों को मस्तक पर धारण करते हैं। वह मेघ सामने देखकर आर्त (भक्त मुमुक्षु) रूपी चातक मुँह
खोलते हैं। मुँह में एक बूँद पड़ते ही वे सुखी तथा नित्य निर्दोष हो जाते हैं। आर्त की तृष्णा तत्काल दूर होती है।
वे स्वानंदजल से तृप्त होकर हर्षोल्लास के साथ सुख का उपभोग करते हैं। उत्तम और निर्मल भूमि देखकर,
उचित समय पर वे मेघवृष्टि करते हैं। उनकी वह सतत और प्रचण्ड वृष्टि शुरू होने पर जल की अनगिनत लहरें
उठने लगती हैं। उस कृपारूपी वर्षा की शुरुआत होते ही शिष्यरूप नदी में बाढ़ आ जाती है। विकल्परूपी कूड़ा
वह बाढ़ अपने प्रवाह में बहा ले जाती है। अनन्तर वह निर्मल प्रवाहयुक्त नदी चिदैक्‍य सागर में जा मिलती है
और उससे समरस होकर आत्मस्वरूप में स्थिर हो जाती है। फिर वैराग्य से शुद्ध की हुई भूमि अपनी ही आर्द्रता
से गीली हो जाती है और मृदु हो जाती है। लेकिन उसमें बीज अंकुरित नहीं हुए होते ऐसी उस भूमि पर जब
जल की निरन्तर वर्षा होने लगती है तो वासनारूपी ढेले गलने लगते हैं और सद्भाव की आर्द्रता मिलने से ज्ञान
की वाष्प निकलने लगती है। तब वहाँ आत्मबीज बोये बिना ही अपने आप परिपूर्ण अंकुर निकल कर खेत में
फसल स्वयमेव तैयार हो जाती है। बालों में दाने स्वाभाविक रूप से ही स्वस्थ्य एवं पुष्ट रहते हैं। परमकूपा से
पोषण से पुष्ट होकर समदृष्टि के बाल पकने लगते हैं। परमानन्द से सृष्टि भर जाती है। जीव और शिव एकरूप
हो जाते हैं। दुःखरूपी अकाल समाप्त होकर सुख के सुकाल का उदय होता है। कृपाधन सद्गुरु जब कृपा की
वर्षा करने लगते हैं तो सच्छिष्यों में हर्ष का कोलाहल शुरू हो जाता है। आत्मज्ञानरूपी पर्जन्य की जब वर्षा होने
लगती है तो साथ ही अवताररूपी ओलों की भी वर्षा होती है। वे ओले कार्य के अनुरूप आकार प्राप्त कर अन्त
में निराकार में विलीन हो जाते हैं। उस पर्जन्य के तुषार यदि दैवयोग से जड़मूढ़ पर पड़ जाएँ और उसका एक
बूँद भी सहसा उसके मुँह में पड़ जाय तो वह संतों की सभा में सम्मान पाता है। श्री हरिरूपी सद्गुरु महामेघ की
जिस पर कृपा हो जाय वही चराचर में धन्य होकर देवताओं में तथा मानवों में भी पूजनीय बन जाता है। 'गुरु'
शब्द का अर्थ भारी (वजनी) है। लेकिन वह इतना हलका है कि भवसागर में स्वयं तैर कर शिष्य को भी पार
कराता है। उसका आदि, मध्य और अन्त वेद भी नहीं जान पाये। यह वही सद्गुरु आनन्दघन जनार्दन है जिसने
मेरा एकाकीपन दूर कर इस एक एका को (एकनाथ) को पावन कर दिया और देखो! आत्मज्ञान का बोध
कराकर जो एक है वही अनेक है और जो अनेक है वही एक है यह निश्चित कर दिया। निजआत्मैक्य का ज्ञान
कराकर उसी ऐक्य से भक्ति मार्ग पर लगा दिया और अपनी ही कथा सुनाने के लिये मुझे श्रीभागवत सुनाने के
लिये खड़ा कर दिया। भागवत की कथा यही है कि दशम अध्याय के अन्त में उद्धव ने श्रीकृष्ण को बद्धों की
और मुक्तों की व्यवस्था के बारे में पूछा। उद्धव का प्रश्न अत्यन्त जटिल था। उसे सुनने के बाद अब श्रीकृष्ण
अपने अंतःकरण का गुह्य ज्ञान उद्धव को बताने वाले हैं। वे प्रश्नोत्तर श्रवण करने से जन्ममरण के फेरे समाप्त हो