श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 274, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंके प्रभाव से होम करने जाता है। जारणमारणादि कर्म करने के लिये बकरी, लोमड़ी, बन्दर, गिरगिटांग, मेढ़क,
मछली, मगर, गिद्ध तथा चील जैसे पशु-पक्षियों का भी होम करते हैं। नग्न भैरव, वैताल, भूत, पिशाच, कंकाल,
मारको, मेसको, मैराल आदि प्रबल भूतों की उपासना करते हैं। काली चिड़िया, मालढोक, चील, कौंआ, बगुला,
उल्लू को मारकर तथा काली बिल्ली को समारोहपूर्वक लाकर शाबरी मंत्रों से होम करते हैं। चलती घानी से तेल
चुरा कर लाते हैं और शनिवार को प्रदोष के समय नहाते हैं तथा मध्यरात्रि में होम में डाकिनी तथा शाकिनी को
जागृत करते हैं। शराब का घड़ा भरकर रखते हैं, मातंगी की पूजा करते हैं और मोहिनी मंत्र का जप कर शव की
खोपड़ी में रुधिर भर कर रखते हैं। पूरे शरीर में हल्दी पोतते हैं, कपाल पर सिंदूर पोतते हैं और कामेच्छा पूरी
करने के लिये अत्यन्त परिश्रम से भजन साध्य करते हैं। होमपात्र उसी क्षण तैयार करने के लिये पीपल को जड़
के साथ उखाड़ते हैं और आसन के नीचे रखने के लिये फल और फूलयुक्त वनस्पतियों को उखाड़ते हैं। मंत्रबीज
का जाप करने के लिये मृग-भालू के शव का ताजा चमन मँगवाते हैं। पाप का भय नहीं मानते। इस प्रकार पशु,
पक्षी तथा जलचर आदि जीवों को भयंकर पीड़ा पहुँचाते हैं, इतना ही नहीं अपितु ब्राह्मण का रक्त लेकर भी
जारण-मारण की क्रिया करते हैं। गौ-ब्राह्मणों को नितांत कष्ट देते हैं, इतना ही नहीं बल्कि जमीन, सम्पत्ति तथा
स्त्री का अपहरण करने के लिये उनकी हत्या भी करते हैं। मन्दिर में भगवान के सामने एकत्र अथवा शिवालय में
शिवजी के सामने रखा हुआ द्रव्य अथवा पदार्थ उठाने में जरा भी सुस्ती नहीं दिखाते। अधर्म में उनकी वासना
इतनी अथाह रहती है। सारांश यह कि इस प्रकार का कर्म करने में वह अकर्म के कारण नरक में इस प्रकार
प्रवेश करता है जैसे चन्द्रमा अन्धकार में डूब जाता है क्योंकि अकर्म इतना प्रबल है कि वह जीव के ज्ञान का
विनाश करता है तथा उसे मूढ़ बनाकर उसे नरक के प्रवाह में बहाता है। उस नरक की स्थिति बड़ी विचित्र है।
करोड़ों वर्षों से वहाँ जाते हुए भी उसकी गहराई किसी को मालूम नहीं हुई। फिर कोई उससे कैसे उबर सकता
है? उसे ही 'अंधतम नरक' कहते हैं, उसे देखते ही वृत्ति अन्धी हो जाती है। मूर्खतावश बाहर आने का मार्ग
भूलकर वह नरक में ही लोटता रहता है और इस प्रकार कर्मभोग का जब तक अन्त नहीं हो जाता तब तक
आकल्प नरक ही भोगता रहता है और फिर उसे स्थावर अवस्था प्राप्त होती है, अर्थात् वह वृक्ष अथवा पाषाण
हो जाता है। इस प्रकार उसकी जड़ अवस्था होती है। उसे सुख स्वप्न भी नहीं दिखाई पड़ते। वह असहनीय
दुःख भोगता रहता है। इस प्रकार अधर्म प्रवृत्ति का आचरण करने से सुख का अंश भी नहीं प्राप्त होता। अनिवार
भोग भोगते हुए उसकी उससे मुक्ति नहीं होती।
कर्माणि दुःखोदर्काणि कुर्वन् देहेन तैः पुनः।
देहमाभजते तत्र किं सुखं मर्त्यधर्मिणः ॥ २९ ॥
हे उद्धव! भाई, सुनो मरण जीव का धर्म है। उसके हिस्से में सुख कभी आता ही नहीं है। वह सदा दुःखद
स्थिति में ही रहता है। नरदेह प्राप्त कर वे बड़े-बड़े क्रूर कर्म करते हैं जिससे उन्हें दुःख के ही फल प्राप्त होकर
वे जीव को बड़ी से बड़ी यातनायें भुगतने के लिये बाध्य करती हैं, जिससे वे दुःख के भँवरे में फँस कर स्वयं
ही अपने घातक बन जाते हैं। वे संतचरणों से विमुख हो जाते हैं, उन्हें स्वप्न में भी सुख नहीं प्राप्त होगा। कामी
लोग क्रूर कर्म ही करते रहते हैं जिससे उनका दुःख बढ़ता ही रहता है। सारांश, प्रवृत्ति में रहकर सकाम कर्म
करने पर भी, भले ही वे कर्म विधिपूर्वक ही क्यों न किये हों लेकिन उसे सदा अनिवार दुःख भोगना पड़ता है।
विधिपूर्वक सकाम कर्म करने पर स्वर्ग से पतन होता है और वही कर्म अविधि से करने पर नरक प्राप्त होता है।