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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 278, कुल 869 में से

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पृष्ठ 278

२६२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
होती है उसी प्रकार उसे जीवन-मरण के चक्र में घूमते समय अत्यन्त दुःख होता है और वह अघोर गर्भवास
भोगता है। रहट के कलशों के फेरे लगते रहते हैं, एक भरता है, एक खाली होता है उसी प्रकार यह भी जन्म से
लेकर मृत्यु तक इसी प्रकार चक्कर लगाता रहता है। बिच्छू के काटने से छटपटाने वाले की दाढ़ी में जैसे आग
लग जाय उसी प्रकार भोगक्षय से पतित होने वाले को गर्भ की पीड़ा भी सताती है। स्वर्गादि लोकों की अनित्यता
मालूम नहीं होती इसीलिये उन्हें अधिक दुःख भोगना होता है। संसार के भँवरजाल में फँसने के कारण ही उन्हें
कष्टों का फल दुःखों के रूप में प्राप्त होता है। जिन लोकों में भोगने के लिये भाग मिलते हैं उन लोकों को और
भोगों को अनित्य कहा जाय तो वह भी उचित, नहीं है क्योंकि भोगलोक यदि सत्य होते तो उन्हें 'अनित्य' कहा
जाता। जिस प्रकार रस्सी से सर्प का भ्रम होता है उसी प्रकार इन चौदह लोकों की स्थिति है। वह सारा माया का
ही खेल होने के कारण उसमें सुख का अंश कैसे होगा ? जो केवल मायामय है वहाँ भोगसुख कैसा ? कर्मठ लोग
मूर्ख होते हैं इसीलिये मायिक वस्तुओं की इच्छा करते हैं। मृगजल के तालाब में यदि चावल और केले की खेती
होती तो विषयभोग से सुख प्राप्त हुआ होता। लेकिन जो भ्रांत हैं उनकी समझ में यह बात नहीं आती। संसार तो
सारा भरा पूरा दिखायी देता है, उसे मायामय कैसे कहा जाय ? यदि तुम ऐसा समझते हो तो तुम्हें सहज भाषा में
बताता हूँ, सुनो !
कालआत्माऽऽगमो लोकः स्वभावो धर्म एव च।
इति मां बहुधा प्राहुर्गुणव्यतिकरे सति॥ ३४॥
यह संसार पूरी तरह मायामय एवं काल्पनिक है क्योंकि उसकी उत्पत्ति अज्ञान से ही है। मन में विकल्प
आने के कारण ही वह एक को अनेक कहता है। धतूरे का बीज खाने से बुद्धिमान व्यक्ति भी पागल हो जाता है
और उसे जो हैं ही नहीं ऐसे खरगोश, मछली, गौ, सर्प आदि का भास होने लगता है। उसी प्रकार माया के पाश
में फँसने के कारण उसे भ्रमवश अनेकत्त्व का भास होने लगता है। आकाश के बादलों को देखकर सुशोभित
नगर और किले दिखायी देने लगते हैं। अँधेरे में रस्सी देखकर वह कहने लगता है कि यह साँप है, यह लाठी है
या फूलों की माला हैं या कोई मोतियों का हार भूल गया है। उसी प्रकार मैं निजात्मा पुरुषोत्तम सर्वत्र होते हुए
मुझे नाना प्रकार के रूप देकर मुझे काल, आत्मा, वेद, स्वभाव, धर्म आदि के नाम से पुकारते हैं। प्रकृति क्षोभक
होने के कारण मुझे 'काल' कहते हैं। प्रकृति का नियामक होने के कारण मुझे 'आत्मा' कहते हैं, कर्म का प्रबोध
होने के कारण मुझे 'वेद' कहा जाता है और अदृष्ट का द्योतक होने के कारण मुझे 'धर्म' के नाम से पुकारा जाता
है। अदृष्ट को दृष्ट कर उसका भोग कराने के कारण उसे 'धर्म' कहते हैं। अब जिस कारण से उसे 'स्वभाव'
कहते हैं उसे भी जान लो। 'आत्मा-भोक्ता' इसी का नाम स्वभाव है। जिस परिणाम के कारण आत्मा, भोक्ता,
स्वभाव आदि का कारण बनता है, उसे स्वभाव कहते हैं। अनेक प्रकार के लोगों की प्राप्ति अदृष्ट का फल है।
मुझे 'लोक' कहने का भी यही कारण है। सारांश, मुझ अकेले को मूर्ख लोग व्यर्थ ही अनेक मानते हैं। दीवार
पर अनेक रंगों से यथातथ्य चित्र चित्रित रहता है जिससे दीवार नाना रूपों में दिखायी देती है, लेकिन वह
एकरूप ही रहती है। उसके अनुसार नाना प्रकार के रूप, नाना प्रकार के 'धर्म, 'नाना प्रकार के नाम तथा नाना
प्रकार के कर्म इन सबमें सदा सर्वोत्तम आत्माराम मैं हूँ। मेरे सिवा खाली जगह एक अणु के लिये भी नहीं है।
सारे देहों में सदासर्वदा मैं सर्वोत्तम आत्माराम ही हूँ। जिस प्रकार समुद्र में लहरें रहती हैं उसी प्रकार मुझमें सारा
जगत दिखायी देता है, लेकिन वह जगत नहीं स्वयं मैं ही हूँ और अव्यंग्य सुख मुझमें ही है। मैं शुद्ध बुद्ध मुक्त