श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 273, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय २५७
के सुख को आग लगे। सुख की आशा में याज्ञिक व्यर्थ ही फँस जाते हैं। हे उद्धव! इस प्रकार जिसे 'स्वर्गसुख'
कहते हैं वे इस प्रकार दुःखी होते हैं। मूर्ख ही स्वर्ग को सुख मानते हैं लेकिन वह मार्ग दोषरहित नहीं है।
याज्ञिक लोग विधिपूर्वक कर्म करते तो भी उन्हें महादुःख प्राप्त होता है। लेकिन यह मत समझो कि अविधि से
कर्म करने से वे सुखी होंगे। यहाँ कर्ममार्ग की प्रवृत्ति दो प्रकार की होती है। एक में विधिपूर्वक आचरण होता
है तो दूसरी में अविधि से। अभी मैंने तुम्हें जो बातें बतलायीं वह वेद विधानोक्त स्थिति है। विधियुक्त कर्म के
आचरण से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, यह उचित प्रवृत्ति है। पुण्य का क्षय हो जाने पर किस प्रकार स्वर्ग से पतन
होता है यह भी तुम्हें बतलाया। अब अविधि से किये हुए आचरण के सम्बन्ध में भी सुनो। वे मतिहीन लोग
वेदविधि का उल्लंघन कर खराब लोगों की संगत से किस प्रकार अप्रकृति से अधर्म करते हैं उसके सम्बन्ध में
भी सुनो।
यद्यधर्मरतः सङ्गादसतां वाजितेन्द्रियः।
कामात्मा कृपणो लुब्धः स्त्रैणो भूतविहिंसकः ॥ २७॥
जीव स्वभाव से ही कामासक्त होते हैं इसलिये उन्हें वांछित विषय प्राप्त होते ही वे उस पर लंपट हो जाते
हैं और इच्छित वस्तु प्राप्त न होने पर उनका मन व्याकुल हो जाता है, यह प्राणिमात्र का स्वभाव ही है। ऐसे
स्वभाव वाले मनुष्य का यदि दुष्ट पुरुष के साथ सम्बन्ध हो जाये तो उसे अधर्म पर ही श्रद्धा होने लगती है और
वह अकर्म के लिये प्रवृत्त होता है। चंचल होने के कारण मन भी वानर की तरह है। दुष्ट संगति से यदि वह
मदिरापान करे तथा उसे कामरूपी बिच्छू काट ले तो वह अटपटांग बातें कहने लगता है। इसमें आश्चर्य कैसा ?
पागल के हाथ में मशाल दे देने से वह जगह-जगह आग ही लगाता फिरेगा। उसी प्रकार वे भी दुष्टों की संगति
से होली जलाकर धर्म को समूल भस्म कर देते हैं। छोटे बच्चे के हाथ में शस्त्र देने पर वह यह नहीं देखता कि
जिस प्रकार वह प्रहार कर रहा है वह शरीर उसका है अथवा किसी और का। वह अपना शरीर भी काट लेता है।
वह अपने हित के बारे में नहीं सोचता। जिस प्रकार शरीर में देवता का संचार होने पर ढोंग करने वाली लड़की
के बोलने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होता या बहुरुपिया के संन्यास में जिस प्रकार वैराग्य तृणमात्र भी नहीं होता
उसी प्रकार वह भी कुसंगति से ही ढोंग रचाता है जिसके कारण विवेक के लिये कोई स्थान नहीं रह जाता और
वह कामशास्त्र की राह पकड़ लेता है। कामशास्त्र की लत से उसकी वासना बढ़ जाती है जिसके चलते वह
अधर्म की योजना बनाता है और अधर्म के कारण अकर्म करके निन्दनीय कर्मों का आचरण करता है। निन्दनीय
कर्मों की प्रवृत्ति के लिये भोग की लिप्सा मूल कारण है। भोग की लालच में ही अधर्म का विस्तार होता है।
अधर्म के बढ़ते ही वह परधन और परस्त्री के लिये अनेक प्रकार की युक्ति लड़ा कर शरीर का नाश करता है।
स्त्री के लिये तो उसकी व्याकुलता देखने लायक होती है। स्त्री के छंद में वह स्त्रैण बनता है और उस स्त्री को
प्राप्त करने के लिये प्राणी की हिंसा भी करता है।
पशूनविधिनाऽऽलभ्य प्रेतभूतगणान् यजन्।
नरकानवशो जन्तुर्गत्वा यात्युल्बणं तमः ॥ २८ ॥
विधि जो बताती है उसे नहीं कहना, वेद की बात नहीं सुनना, स्मृतिशास्त्र मन को स्वीकार्य नहीं है ऐसी
स्थिति में स्वेच्छा से कर्म करना। जारण, मारण, उच्चाटन, स्तंभन, मोहन, वशीकरण आदि के प्रयोग कर असाध्य
अंजन सिद्ध कर स्त्रियों को वश में करना। नमक, राई और भिलावा शहद में मिला कर तामसी व्यक्ति शाबरी मंत्र