श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय २६१
एक ही वस्तु भरी होती है। शर्करा का ईंख बना दिया जाय ऊपर का कठिन छिलका और भीतर सूखा और गन्ने
को निचोड़ कर रस निकाल लिया जाय इस प्रकार का त्रिगुण दोष उसमें नहीं होता। उसी प्रकार परमात्मा श्रीहरि
इस चराचर सृष्टि में अद्वितीय रूप में भरा हुआ है, सत्त्वादिगुणों के क्षोभ से ही उसमें अनेकत्व का आभास होता
है। जिस प्रकार बहुरूपिया अपने एक ही देह के अनेक रूप बनाता है उसी प्रकार सच्चिदानंद श्रीहरि आत्मरूप में
चराचर में एक ही होते हुए भी अनेक रूपों में दिखायी देता है। यही द्वैत का अद्वैत है। कुछ लोगों के मन में एक
शंका उपस्थित होती है, 'जीव अद्वैतरूपी है' यह तो हमें स्वीकार है लेकिन एक तरफ तुम ही कहते हो कि जीव
'पराधीन' है और अब कहते हो कि अद्वैत होने के कारण वह स्वतंत्र है। ये दोनों विचार परस्पर विरोधी हैं, उन्हें
सच कैसे माना जाय ? एक और अद्वैत का प्रतिपादन करते हो और उधर लोकपालों को भी मेरा भय है ऐसी बात
करते हो, यह बात हमारी समझ से परे है। अद्वैत को किसका भय है ? हे उद्धव ! यदि तुम्हारे मन में इस प्रकार
की शंका उपस्थित होती है तो उसे तुम्हारे मन का स्पर्श न होने दो। उसका रहस्य तुम्हें बताता हूँ, सुनो। जैसे-
जैसे जीव उपाधि से तादात्म्य प्राप्त करता है वैसे-वैसे उसे अनेकता का भास होने लगता है और जहाँ अनेकत्व
का आभास होता है वहाँ पराधीनता पहले ही उपस्थित हो जाती है। वहाँ फिर ईश्वर की सत्ता का नियंत्रण होता
है। प्रचण्ड सेना एकत्र होने पर भी वह सेनापति के बिना व्यर्थ है, रसीला आम कितना ही क्यों न पक जाय
लेकिन उसकी अच्छी सुरक्षा आवश्यक है, उसी प्रकार जब तक जीव को अनेकता का आभास होता है तब तक
सृष्टि के लिये उत्पत्तिकर्त्ता, संहारकर्त्ता तथा नियंता के रूप में ईश्वर सदैव रहता है और इस प्रकार जीव पराधीन
रहता ही है। अनेकता के कारण पराधीनता प्राप्त होती है इसीलिये नियंता ईश्वर रहता है। ईश्वर की ऐसी सत्ता
देखने पर जीवों को भय लगने लगता है। मेरी ईश्वरी सत्ता के भय से यम भी थर-थर काँपता है। फिर इन्द्रादि
देवताओं की क्या बात की जाय ? ब्रह्मदेव भी मुझसे डरते हैं। मेरी अंत प्रलय की सत्ता का प्रभाव हरिहर के
मस्तक पर भी पड़ता है। अनेकता का संहारक महाकाल मैं ही हूँ। इसीलिये जब तक अनेकत्व है तब तक काल
का भय भी दुःसह है और जब यह अनेकत्व ही समाप्त हो जाता है तो फिर काल किसका विनाश करेगा ?
सारांश अनेकत्व के माथे पर ईश्वरभय की काल सत्ता हैं। हे उद्धव ! उस अनेकत्व के कारण ही जीव को सदा
पराधीनता है। अनेकत्व जब समाप्त होता है तभी काल समाप्त होता है। फिर भय किसका रहेगा ? एकत्व में ही
स्वानंद होता है। जब द्वैत का मल न उठे तब सारी सृष्टि उसे ऐक्य रूप में ही दिखायी देती है। तब आत्मज्ञान से
स्वानंद की अगणित राशियाँ उपभोग के लिये प्राप्त होती हैं। निजात्म ज्ञान का अलौकिक और द्वैतभाव से रहित
अद्वैत सुख को छोड़ परममूर्ख कर्मवादी अनेक प्रकार के लोकों की इच्छा करते हैं। कर्मवादी अर्थात् लोकप्रवृत्त
ही अत्यन्त श्रेष्ठ है इसलिये कर्म करके ही उत्तम भोग भोगने चाहिये ऐसा पहले कहा गया था। इसी का खण्डन
कर उद्धव के मन में अद्वैत भावना दृढ़ करने के लिये भगवान उसी निरूपण को आगे बढ़ा रहे हैं।
यावदस्यास्वतन्त्रत्वं तावदीश्वरतो भयम्।
य एतत् समुपासीरंस्ते मुह्यन्ति शुचर्पिताः ॥ ३३ ॥
जिनमें गुण विषमता होती है वही नर भोगों के प्रति आसक्त होते हैं ऐसा समझ लो। वे ही नर यागादिक
कर्म कर भोग का स्थान भी प्राप्त करते हैं। लेकिन जिस लोक को भी वे प्राप्त करते हैं वहाँ से याज्ञिकों को पतन
होने का भय रहता ही है इसलिये वह लोक भी अशाश्वत है यह जान कर उस लोक का अधिपति भी दुःखी ही
दिखायी देता है। वह पद भी जाता है, वह लोक भी जाता है और भोगकर्म से भोग भी नष्ट होते हैं और किये
हुए कर्म तो व्यर्थ होकर वे अधःपतन से दुःखी होते हैं। घायल हुए व्यक्ति को चाबुक से मारने पर जैसी वेदना