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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जनार्दन तुम्हारे मुख से बोल रहे हैं। तुम में प्रेम का ज्वार उठ रहा है, उसे नियंत्रण में रखो और अगली कथा
सुनाने का मन में निश्चय कर कथा का प्रारम्भ करो। आपने स्मरण दिला कर अच्छा ही किया। इसीलिए मैंने
आपके चरणों पर पूरा विश्वास रखा है। जहाँ कहीं आपको गलती लगती हो उसे आप सुधार दें। ग्रंथार्थ सिद्ध
कर मुझे सज्जनों के बीच मान्यता दिलायें। उन्होंने कहा, "ठीक कह रहे हो। तो हे कविपोषक! तुम्हारे ग्रन्थ का
सन्दर्भ ठीक तरह से जानने के लिए अब संस्कृत पर भी टीका करना शुरू कर दो।" इसी भाषण पर भक्तिभाव
रख कर मैं आपके चरणों से लगा हूँ। अब आपकी आज्ञा से कथा प्रारम्भ करता हूँ तो नैमिषारण्य में सूत
शौनकादिकों को पिछला कथा सन्दर्भ इस प्रकार सुना रहे हैं। इससे पूर्व दशम स्कन्ध में नौ लक्षणों से युक्त कथा
सुनायी। अब ग्यारहवें स्कन्ध में श्रीकृष्ण मोक्ष का लक्षण बता रहे हैं। जो चिदाकाश के पूर्णचन्द्र हैं और
ज्ञानयोगियों में श्रेष्ठ हैं ऐसे वे शुकयोगिन्द्र बोलने लगे और सुनने लगे राजा परीक्षित। उसने कहा, "महाराज,
इसीलिए मैंने सर्वस्व का त्याग किया। तभी आपने कृपापूर्वक दर्शन दिये। मेरे भाग्य की अब कोई सीमा नहीं है।
सचमुच इस मोक्ष की कथा अगाध है। जिन्हें अपने मोक्ष के प्रति आस्था है उन्हें मन लगाकर अत्यन्त आदर के
साथ श्रवण करने के लिए तैयार रहना चाहिए। मन को एकाग्र कर कान में रखना चाहिए और अवधान को
सावधान कर श्रवण करना चाहिए। भगवान ने अनेक युगों में अनेक अवतार धारण किये किन्तु इस श्रीकृष्ण
अवतार का चमत्कार कुछ और ही है। हरि की लीला अगाध है। उसका रहस्य देवताओं की समझ में भी नहीं
आता। जिसने जन्म लेते ही माया (माँ) से अलग होकर अपनी ही लीला से अपना पोषण किया जिसने
बाल्यावस्था में ही पूतना आदि को मुक्ति का सुख भोगने दिया, माँ को विश्वरूप दिखलाया, गोपालों को वैकुंठ
का दर्शन कराया और फिर भी अपना बालरूप नहीं बदलने दिया। बालक था तभी अनेक बलवान लोगों को
मारा, संसार में विलक्षण कर्म किये किन्तु बाल्यावस्था की सीमा कभी पार नहीं की। साक्षात परब्रह्म होते हुए
चोरी की, देवता होते हुए भी व्यभिचार किया, पत्नी और बच्चे रहते हुए भी ब्रह्मचारी होने का आदर्श प्रस्तुत
किया। अधर्म से धर्म की वृद्धि की, अकर्म से कर्म का उद्धार किया, अनियमितता से अत्यन्त कठिन नियमों का
पालन किया। संग से निःसंगता सम्पादित की, भोग से योग को बढ़ाया, बिना त्याग किये अत्यन्त अव्यंग और
निर्दोष त्याग किये। कर्मठ लोगों को बोध कराने के लिए कर्म की जड़ता के बन्धन तोड़ डाले और स्पष्ट कर
दिया कि भोग से भी मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। भक्ति, भुक्ति और मुक्ति इन तीनों को एक ही पंक्ति में
बिठाया। इसकी ख्याति के सम्बन्ध में क्या कहा जाय? इसने मिट्टी खाकर विश्वरूप दिखलाया। उस श्रीकृष्ण
का उत्तम एवं परमपवित्र चरित्र मैं तुम्हें बताऊँगा। इस अवतार में आत्मबोध का पूरी तरह विस्तार हुआ है इसमें
जरा भी सन्देह नहीं है। एकादश स्कन्ध के सारांश में आदि और अन्त में कहीं संक्षेप में तो कहीं विस्तार से
परमात्मस्थिति अर्थात मुक्ति के ही सम्बन्ध में कहा गया है। नारद ने वसुदेव को 'निमि-जयंत' की कथा संवाद
रूप में संक्षेप में बतायी। और उद्धव पर अत्यन्त प्रेम होने के कारण उसे अनेक दृष्टांत देकर श्रीकृष्ण ने स्वमुख
से जो कथा सुनायी वह 'विस्तारस्थिति' है। पहले दशम स्कन्ध में निरोधन लक्षण बताये थे जिसमें श्रीकृष्ण ने
अनेक युक्तियाँ सोच कर किस प्रकार अधार्मिक लोगों का संहार कर पृथ्वी का भार कम किया था इसके बारे में
बताया गया था। उनके अधर्म के कारण पृथ्वी आक्रोश कर रही थी, इसलिए लोगों की सहायता के लिए पूर्णब्रह्म
भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया। उन दुष्ट दैत्य और दानव तथा पृथ्वी के लिए भारस्वरूप हुए समस्त राजाओं
का श्रीकृष्ण भगवान ने वध किया। पिछली कथा का सारांश श्रीशुक आगे बता रहे हैं।

प्रथम अध्याय ९
श्रीबादरायणिरुवाच
कृत्वा दैत्यवधं कृष्णः सरामो यदुभिर्वृतः।
भुवोऽवतारयद्भारं जविष्ठं जनयन्कलिम्॥ १॥
स्वयं पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण ने लोगों का चित्त रंजन करने वाले बलवान को लेकर तथा वीर यादवों को एकत्र कर
दैत्यों का संहार किया। जिन्हें यादव नहीं मार सकते थे, उनके सम्बन्ध में श्रीकृष्ण ने निराली युक्ति की योजना की।
वह यह कि उन्होंने उनके ही मित्र, निकट सम्बन्धी, रिश्तेदार इनमें परस्पर घोर कलह उत्पन्न कर दिया और पृथ्वी
का भार कम करने के लिए पाण्डवों को भी क्षुब्ध कर कलह के बहाने कौरवों का भार हलका किया।
ये कोपिताः सुबहु पाण्डुसुताः सपत्नैर्दुद्यूतहेलनकचग्रहणादिभिस्तान्।
कृत्वा निमित्तमितरेतरतः समेतान् हत्वा नृपान्निरहरत्क्षितिभारमीशः ॥२॥
अत्यन्त अघोर कृत्य करने वाले दुष्ट, जिनकी सेना पृथ्वी के लिए भारस्वरूप थी, उनका संहार करने के
लिए उन्हें एकत्र किया जाए और भूमि का भार हलका किया जाए इस उद्देश्य से कृष्ण ने कलह का कारण
उपस्थित किया। श्रीकृष्ण के इस संकल्प के अनुसार कपट के पाँसों का निर्माण हुआ। उसी कपट से देखिए
कौरवों का समुदाय अनायास ही मारा गया। संसार में जुआ दुष्ट लोग ही खेलते हैं। तिस पर इस जुए का प्रारम्भ
कपट से हुआ। दुष्टबुद्धि कौरवों ने जानबूझ कर धर्म के सामने कपट के पाँसे फेंके। सीधे-सादे अनाड़ी लोग भी
धर्मपत्नी का छल नहीं करते और द्रौपदी तो सचमुच धर्म की पत्नी थी, उसे ये लोग बाँधकर सभा में ले आये।
इतना ही नहीं बल्कि उसकी वेणी के केश खींचे जिससे किचकिच इतनी बढ़ी। वास्तव में उसका यही कर्म
उसके लिए हानिकारक सिद्ध हुआ। जंगल में कोई किसी को लूटता है तो राजा उसकी खोज करता है लेकिन
अगर भरी सभा में राजा ही लूटने लगे तो समझ लो कि वह मृत्यु को ही निमंत्रण देता है। बिना किसी अन्याय
के यदि राजा ही लूटने लगे तो वहाँ भगवान सहायता के लिए दौड़ कर आता है। द्रौपदी वस्त्रहरण यही कौरवों
का मुख्य अन्याय था। आग लगाना, विष प्रयोग करना तथा स्त्रियों का अपहरण करना, घात लगाकर मारना,
मारने के लिए हाथ में शस्त्र लेना, अवज्ञा और उपहास, दुर्वचन, धर्म का छल इसी को श्रीकृष्ण ने निमित्त
बनाया। पतिव्रता स्त्री को अनावृत्त किया इस कारण मृत्यु तो होनी ही थी। यही कलह का कारण बना और इसी
कर्म से पूरे कुल का विनाश हो गया। ऐसा जो धर्म का विरोधी होता है उसका वध ईश्वर निश्चित रूप से करता
है। सचमुच इसीलिए उसने पाण्डवों के मन में भीषण क्रोध निर्माण किया। पृथ्वी का भार कम करने के उद्देश्य
से सगे-सम्बन्धी, इष्ट मित्र, सखा, भाई, शास्त्रज्ञ और जो अत्यन्त पवित्र थे उनमें भी विचित्र प्रकार का कलह
उत्पन्न किया। पृथ्वी का भार हलका करने के लिए श्रीकृष्ण ने सुहृद, सखा, भाईयों का भी, उनके साथ आयी हुई
राजसेना पर हमला कर समूल गोत्र का वध किया।
भूभारराजपृतना यदुभिर्निरस्य गुप्तैः स्वबाहुभिरचिन्तयदप्रमेयः।
मन्येऽवनेर्ननु गतोऽप्यगतं हि भारं। यद् यादवं कुलमहो ह्यविषह्यमास्ते॥ ३॥
ऐसे दुष्टों का साथ देने वाले और अधर्माचरण करने वाले, भूमि के लिए केवल भारभूत ऐसे अनेक राजा
और उनकी सेना का संहार किया। कलह का तो मात्र बहाना था। पृथ्वी पर अधर्म करने वाले राजा और उनकी
इतनी अधिक सेना को खोज-खोज कर मारा कि उसका कोई हिसाब नहीं। फिर भी श्रीकृष्ण को लगा कि पृथ्वी

१० श्रीमद् एकनाथी भागवत
का भार अभी कम नहीं हुआ है। इसका कारण यह था कि जिन यादवों ने शक्तिशाली होकर असंख्य दुष्टों का
संहार किया था, वही यादव अब विद्रोही हो गये थे यह बात श्रीकृष्ण को अच्छी नहीं लगी। इसलिए यादवों का
नाश हुए बिना पृथ्वी का पूरा भार कम नहीं होगा और यह यादवकुल कैसे नष्ट होगा इसके बारे में वे विचार
करने लगे। कपूर खाने से अग्नि बढ़ती है लेकिन कपूर समाप्त होने पर अग्नि भी बुझ जाती है। उसी प्रकार
यादवों द्वारा सबका संहार होने के बाद अन्त में उनके ही संहार की बारी आयी। जब तक केले के पेड़ में फल
नहीं आते तब तक वह बढ़ता रहता है लेकिन केले पुष्ट होते ही माली वह पेड़ काट डालता है। उसी प्रकार
यादव वंश की इतनी अधिक वृद्धि हुई कि वह अब भविष्य में संहार के ही लिए थी। फल पकने के बाद जब
उसकी गन्ध फैलने लगती है तो माली उसे तोड़ कर ले जाता है उसी प्रकार अपने ही कुल के फलों को तोड़कर
ले जाने का विचार श्रीकृष्ण के मन में आया। श्रीकृष्ण की कृपा से यादव अपने बाहुबल से पराक्रम कर बढ़े हुए
थे लेकिन वही श्रीकृष्ण उनके नाश का संकल्प कर मन ही मन क्षुब्ध हुआ था। यादवों का कुल अत्यन्त
प्रबल हुआ। उन पर शासन करने वाला कोई नहीं रहा। ऐसे इन उन्मत्त वीरों की अवस्था श्रीकृष्ण के लिए असह्य
हो उठी।
नैवान्यतः परिभवोऽस्य भवेत् कथञ्चिन्मत्संश्रयस्य विभवोन्नहनस्य नित्यम्।
अन्तःकलिं यदुकुलस्य विधाय वेणुस्तम्बस्य वह्निमिव शान्तमुपैमि धाम ॥ ४॥
यदि मैं निजधाम को चला गया तो यही लोग अधर्म के लिए प्रवृत्त होंगे। क्योंकि कुकर्म के लिए प्रवृत्त
होने में सम्पत्ति का मद और अहंकार का अतिरेक यहीं बाते मुख्य रूप से कारणीभूत होती हैं। मेरे ही बल से
बलशाली होकर ये सारे अजिरथि बन बैठे हैं। इनका सामना करने के लिए भूमण्डल पर कोई नहीं बचा है।
इनका गर्व मैं ही उतार सकता हूँ। इंद्रादि देवतागण, दैत्य, राक्षस या दानवों के वश में भी ये नहीं हो सकेंगे और
अगर ये इसी प्रकार पीछे पड़े रहें तो इन यादवों का संहार करने के लिए पुनः मुझे ही अवतार लेना पड़ेगा। इस
प्रकार अब अपनी ही आँखों के सामने अपने कुल को काल के मुँह में झोंकने का विचार कर श्रीकृष्ण ने वही
निश्चय पक्का किया। यदुवंश रूपी वंशबेल श्रीकृष्ण के कृपा जप से बढ़ी हुई थी। वहाँ अब कपट के बहाने
ऋषियों के शाप की चिनगारी गिरी। वास्तव में वह श्रीकृष्ण के संकल्प और ब्रह्मशाप से भड़क उठी। वह अब
स्वजनों के विरोध के रूप में तथा कालाग्नि के कोप से सबके विनाश का कारण बनेगी। इस प्रकार यादवों के
कुल का निर्दलन कर फिर अपनी लीला से अपने निजधाम जाने की श्रीकृष्ण ने योजना बनायी।
एवं व्यवसितो राजन् सत्यसङ्कल्प ईश्वरः।
शापव्याजेन विप्राणां संजह्रे स्वकुलं विभुः ॥ ५ ॥
इस प्रकार अपने कुल को स्वयं ही नष्ट करने का विचार उनके मन में आया और उन्होंने समूलकुलक्षय
का निश्चय किया। अब यह कार्य हो कैसे ? इस पर जगदीश ने यह विचार किया कि ब्राह्मण के शाप के बहाने
कुल का अपने आप ही विनाश हो जाएगा। बस इतना सिद्ध हो जाए तो अवतार की इतिकर्तव्यता समाप्त हो
जाएगी और फिर स्वलीला से निजधाम चलें ऐसा यदुवीर ने विचार किया। श्रीकृष्ण 'लीलाविग्रह' अर्थात् स्वेच्छा
से देह धारण करने (जीवों की तरह कर्म के अनुसार देह धारण करनेवालों की तरह नहीं) वाले तथा नितान्त
सुन्दर थे। उनकी गुणकर्मक्रिया अत्यन्त पवित्र थी। वह परिपूर्ण ब्रह्म, पूर्णावतारी तथा संसार का उद्धार करने
वाला था।

प्रथम अध्याय ११
स्वमूर्त्या लोकलावण्यनिर्मुुक्त्या लोचनं नृणाम्।
गीर्भिस्ताः स्मरतां चित्तं पदैस्तानीक्षतां क्रियाः ॥ ६ ॥
समस्त मंगलों से पूर्ण मंगल तथा गोकुल की स्त्रियों को रिझाने वाला वह श्रीकृष्ण स्वयं मोक्ष की नौका ही
था। उसका सौन्दर्य अलौकिक था। जो भक्तकामकलद्रुम, मेघ की तरह नीली कांतिवाला मनोहर दीखने वाला,
जिसका नाम त्रैलोक्य में प्रसिद्ध है, ऐसे वह पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण स्वभाव से ही इस नाम के अनुरूप है। श्रीकृष्ण
के सौन्दर्य पर जहाँ लक्ष्मी पागल हो उठी, बेचारा मदन जन्म लेने को विवश था वहाँ दण्डचंद्र की क्या दशा है ?
जिसका नाम त्रैलोक्य को पवित्र करने वाला है, जो राक्षसों को. भस्म करने वाला है, जिसे 'पूर्णकाम' कहा जाता
है, वह भक्तों के लिए सदा सुगम है। त्रैलोक्य में जितना भी कुछ सौन्दर्य है, वह सब भूल कर श्रीकृष्ण के पास
आ गया था या यों कहिए कि कृष्ण के सौन्दर्य से ही त्रैलोक्य का सौन्दर्य सुशोभित होता है। जो सारे सौन्दर्य की
शोभा है, लावण्य की राशि है, जिसके अंग की प्रभा से संसार को शोभा प्राप्त हुई है। जो हर्ष में भी परम हर्ष,
अथवा सुख को ही अत्यन्त सुख देने वाला परमसुख है, जिसके कारण विश्राम को भी आराम मिलता है, वह
निराकार ही मानों साकार हुआ अथवा त्रैलोक्य के सम्पूर्ण लावण्य से युक्त सुन्दर श्रीकृष्ण, शोभा को भी सुशोभित
करने वाला था। जमा हुआ घृत पिघलने पर भी उसका घृतपना नष्ट नहीं होता, उसी प्रकार निराकार स्वरूप
साकार होने पर भी वह पूर्ण परब्रह्म ही था। उसे देखते ही देखने की इच्छा पूरी होती है, देखते-देखते ही देखना
पूरा हो जाता है, दृष्टा के साथ दर्शनक्रिया भी लज्जित होकर अपने स्वरूप में लौट जाती है। दृष्टि संतृप्त होकर
ढकार लेती है और व्यक्ति अपना पड़ोसी बनकर कृष्ण स्वरूप का आनन्द अनुभव करता है। एक बार श्रीकृष्ण
के माधुर्य का आस्वाद लेने पर जिह्वा रसस्वाद को भूल जाती है क्योंकि फिर स्वाद ही अच्छा नहीं लगता।
उसकी माधुरी विचित्र है। उस माधुरी ने अमृत का स्वाद भी फीका कर दिया है। इस प्रकार जिह्वा हरिरस में पूर्ण
रूप से सुख का अनुभव करती है। श्रीकृष्ण की हवा से ही सारा संसार नीरस हो जाता है। श्रीकृष्ण की
सुगन्धवायु के सिवा अन्य कोई गन्ध नाक को अच्छी ही नहीं लगती। वास, सुवास, पुष्प, ज्ञेय, घ्राता और घ्राण
ये सब कृष्ण के मकरंद से स्वयं ही एकत्र होकर उनके यहाँ विश्राम के लिये आते हैं। उनके शरीर के स्पर्श से
देह, देही और देहपन यह भाव नष्ट हो जाता है। देह ही अपनी देहबुद्धि किस तरह भूल जाता है? कठिन की
कठिनता नष्ट हो जाती है, मृदु की मृदुता लुप्त हो जाती है, इस प्रकार स्पर्श का स्पर्शत्व नष्ट हो जाता है, ऐसी
अवस्था श्रीकृष्ण ने कर डाली है। उसके पठन से वाच्य-वाचक का स्थान जो वाणी है उसने 'नेति' शब्द को
मिटा कर उसे निःशब्द कर दिया है। वाक वाचा में ही समा गयी, वाक्शक्ति अवाक हो गयी। कृष्णनाम ने
वाच्य-वाचक का भेद नष्ट कर दिया। उन चरणों का चिन्तन करते ही चित्त सहज ही विस्मृत हो जाता है और
फिर निश्चिंत होकर कृष्ण चरणों में विश्राम करता है। चित्त, चिन्ता और चिन्तन इन तीनों का स्मरण ही नहीं
रहता। श्रीकृष्ण चरणों का चिन्तन करते ही चित्त परिपूर्ण ब्रह्म ही हो जाता है। भूमि पर पड़े उसके पदचिन्ह
आश्चर्यजनक है। उसे देखते ही कर्माकर्म का लय हो जाता है और फिर कर्म, कर्त्ता और क्रिया यह भ्रम उसके
पदरज से निर्भ्रम हो जाता है। उसके चरणों की छाप देखते ही कर्माकर्म के बन्धन टूट जाते हैं क्योंकि कर्म का
मुख्य अंग है माया जिसका अल्पांश भी शेष नहीं रह पाता। गौ के पीछे अंकित पद-चिह देखने पर कर्त्ता के
साथ कर्म का विलय हो जाता है। 'अकर्म' यह कहना भी शेष नहीं रहता। इस प्रकार कर्म का निष्कर्म हो जाता
है। उसकी कीर्ति सुनने से श्रोता का श्रोतापन ही नहीं रह जाता, वक्ता का वक्तापन शेष नहीं रह जाता, वक्ता का
वक्तापन नहीं बच पाता, केवल श्रवणमात्र से ही परब्रह्म स्वरूप की प्राप्ति होती है।

आच्छिद्य कीर्तिं सुश्लोकां वितत्य ह्यञ्जसानु कौ।
तमोऽनया तरिष्यन्तीत्यगात्स्वं पदमीश्वरः ॥७॥
इस प्रकार उदारकीर्त्ति कृष्ण ने अपने अवतार को विख्यात बना दिया। उसके कारण जड़ जीवों का उद्धार
होता है और श्रवणमात्र से त्रैलोक्य पावन होता है। स्वयं निजधाम जाने के बाद, अपने बाद संसार सागर को पार
करने के लिए भगवान स्वयं की कृष्ण कीर्त्तिरूपी नौका छोड़ गये थे। इस नौका की स्थिति विचित्र है। कल्पांत
में भी वह डूबने नहीं देती। उसके श्रवणमात्र से आज तक कितने ही श्रद्धालु तर गये और आगे भी कितने ही तर
जायेंगे यह मालूम नहीं है। श्रीकृष्ण की कीर्त्तिरूपी नौका को भवसागर में छोड़ना ही पर्याप्त है, उसके छोड़ते ही
सागर सूख जाता है। फिर श्रवणार्थी पुरुष जो नौका से उतरता है वह सूखे कदमों से ही सागर पार करता है। जो
कृष्ण की कीर्ति का पठन करते हैं उनके जन्ममरण का संसार शून्य हो जाता है वे अत्यन्त पावन और कीर्तिमान
हो जाते हैं और सुरगण उनकी वन्दना करते हैं। श्रीकृष्ण कीर्त्ति का आदर से पालन करने पर चारों मुक्तियाँ पैरों
तले आ जाती हैं। उनके योग से त्रिभुवन पावन होता है, हरिनाम से परम निर्वृत्ति अर्थात् परमानन्द प्राप्त होता है।
श्रीकृष्ण कीर्त्ति के नामाक्षर श्रवणद्वार से भीतर प्रवेश करते ही, अंतःकरण में भरा हुआ सारा अज्ञान एकाएक
खड़बड़ा कर बाहर आ जाता है। उसी प्रकार (कृष्ण कीर्ति) के गर्जन से अज्ञान को बाहर भी कोई आसरा नहीं
मिलता। इसलिए भय के मारे उसका सपरिवार विलय हो जाता है। इस प्रकार कृष्णकीर्त्ति में परमानन्द प्राप्त होता
है। कृष्णकीर्त्ति प्रताप के प्रकाश से सारा संसार कृष्णमय ही दिखायी देने लगता है। इसलिए वह कीर्ति उसे
कीर्त्तिमंत की ही तरह सहज ही निजसुख प्रदान करती है। जिसे देखने पर देखना समाप्त हो जाता है, जिसे
चखने पर चखना पूर्ण हो जाता है, जिसका श्रवण करने से श्रवण समाप्त हो जाता है, जिसका चिन्तन करने से
चित्तवृत्ति ही जम जाती है। जिसकी भेंट हो जाने पर मिलन की कमी कभी नहीं रह जाती, जिसके साथ बात
करने से परमार्थ को ही आलिंगन हो जाता है, और जिसके आलिंगन करने से आलिंगन की इच्छा विलीन हो
जाती है और जिसका नाम लेने से महाभय का भी नाश होता है, ऐसा वह सत्य संकल्प ईश्वर, वह सर्वेश्वर
शार्ङ्गधर स्वलीला से अर्थात् स्वेच्छा से शीघ्र ही निजधाम जाने के लिए उद्यत हुए।
राजोवाच
ब्रह्मण्यानां वदान्यानां नित्यं वृद्धोपसेविनाम्।
विप्रशापः कथमभूद् वृष्णीनां कृष्णचेतसाम् ॥८॥
तब परीक्षित ने बड़े आदर के साथ पूछा कि हे शुकयोगीन्द्र ! यादव तो विप्र भक्ति में विनम्र थे। ऐसा होते
हुए भी उन्हें शाप क्यों मिला यह बतलाइए। यादव दानवीर थे, राजा होते हुए भी परम पवित्र थे, निरन्तर ब्राह्मणों
की सेवा में तत्पर रहते हुए कृष्ण के आज्ञाधारी थे। सदैव कृष्ण का सहवास होने के कारण यादवों के पास
निरन्तर साधुसंत रहते थे। नारदमुनि तो सदैव वहीं रहते थे। ऐसा होते हुए भी यादवों को शाप कैसे मिला ? दक्ष
के शाप का प्रभाव, कृष्ण के पास रहने से नहीं होगा, इसलिए नारद भी द्वारका में ही रहते थे। फिर, ऐसा वह
श्रीकृष्ण स्वयं वहाँ उपस्थित रहने पर भी यादवों को शाप कैसे मिला ?
यन्निमित्तः स वै शापो यादृशो द्विजसत्तम।
कथमेकात्मनां भेद एतत्सर्वं वदस्व मे ॥ ९ ॥
शाप के लिए मूल कारण हैं संताप। तब ब्राह्मणों को क्रोध कैसे हुआ ? और शाप भी क्या दिया ? इसे

प्रथम अध्याय १३
कृपया संक्षेप में बतायें। यादव तो सभी भाई बंद हैं, एक दूसरे के चहेते और उनका पालनकर्ता स्वयं श्रीकृष्ण !
ऐसा उनमें ऐक्य भाव और समस्त एक परिवार होते हुए उनमें की परस्पर एकता टूट कर मारपीट तक की
नौबत कैसे आ पहुँची ? 'आत्मा वै पुत्रनामासि' (आत्मा ही पुत्र है) यह श्रुति सबके लिए प्रमाण है। ऐसा होते
हुए भी श्रीकृष्ण के ही लड़के शाप से कैसे बाधित हुए ? वह शाप सच कैसे हुआ ? 'कुल का विनाश करने
का संकल्प कृष्ण का ही था, वही ब्राह्मणों के शाप के लिए कारणीभूत हुआ और इसीलिए वह सभी यादवों
के लिए बाधक हुआ इसे ध्यान में रखो। कृष्ण संकल्पमात्र से ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार करता
है। उसने ही यादवकुल का संहार करने का निश्चय किया' यह कहकर, शुक उसके अवतार की महत्ता का
वर्णन करते हैं।
श्रीशुक उवाच
बिभ्रद्वपुः सकलसुन्दरसन्निवेशं कर्माचरन्भुवि सुमङ्गलमाप्तकामः।
आस्थाय धाम रममाण उदारकीर्तिः संहर्तुमैच्छत् कुलं स्थितकृत्यशेषः ॥ १०॥
कर्माणि पुण्यनिवहानि सुमङ्गलानि, गायज्जगत्कलिमलापहराणि कृत्वा।
कालात्मना निवसता यदुदेवगेहे पिण्डारकं समगमन्मुनयो निसृष्टाः ॥ ११ ॥
परीक्षित राजा से शुक्राचार्य ने कहा, "कर्ता तथा कराने वाला वह एक श्रीकृष्ण है। उसने ही अपने
लड़कों को शाप मिले इसलिए उनके मन में अविचार उत्पन्न किया। श्रीकृष्ण के मन में निजधाम जाने की
उत्कंठा लगी हुई थी इसलिए शेष बचा हुआ कार्य भी पूरा करने की उसे जल्दी हो रही थी। अब मेरा कुलक्षय
कब होता है यही चिन्ता भगवान के मन में लगी हुई थी। भगवान का यही उद्देश्य शाप के लिए कारणीभूत
हुआ ऐसा समझ लो। जिस कृष्ण ने कुलक्षय का विचार मन में लाया था, उस कृष्ण की सुन्दर मूर्ति का वर्णन
उल्लसित मन से शुक परीक्षित से करने लगे। समस्त सौन्दर्य का अधिष्ठान, ऐसा मनोहर सुशोभित वेष उसने
धारण किया था। उस जगदीश ने अपने शरीर में मानों सभी प्रकार के लावण्य का संग्रह किया था। कैसा
चमत्कार कहा जाए। उसके सौन्दर्य पर ऐसा तेज चढ़ गया था कि उसके प्रत्येक अंग पर लोगों की दृष्टि जम
सी गयी थी। कृष्ण का स्वरूप इतना आकर्षक था कि लोगों की दृष्टि भय से काँप रही थी। जिस प्रकार गुड़
पर मक्खियाँ आकर बैठती हैं उसी प्रकार कृष्ण के स्वरूप पर लोगों की दृष्टि जम सी गयी थी और उसने
उनके शरीर को चारों ओर से बाँध दिया था। आँखें दर्शन लोभ के कारण ललचायी हुई थीं। आँखों में मानों
जिह्वा निकल आयी थीं। इस प्रकार श्रीकृष्ण मूर्ति की शोभा मानों स्वानंद का साकार भण्डार ही था। उस
श्रीकृष्ण को जिस दृष्टि ने देखा वह मानों लौटने के लिए तैयार ही नहीं थी। वे उसका अधिक से अधिक
आलिंगन कर रही थीं। इसलिए सारी सृष्टि उन्हें कृष्णरूप ही दिखायी देती थी। आँखों को उसकी ऐसी चाह
थी कि कामिनियाँ उस पर टूट पड़ती थीं और इसीलिए गोपियों के मन में उस गोविन्द के लिए मीठी चाह
उत्पन्न हो गयी थी। कृष्ण इस प्रकार अत्यन्त सुन्दर था इसलिए उसमें विषय की अभिलाषा हो ऐसी बात नहीं
है क्योंकि वह पूर्णकाम अर्थात निरिच्छ और केवल आत्मस्वरूप में ही रमण करते थे। कृष्ण यदि पूर्णकाम थे
तो वे द्वारका में घर बसाकर स्त्रीपुत्रों के साथ राजसी ठाठ से रहकर विषयों का उपभोग क्यों करते थे ? तो
इसका कारण यह है कि श्रीकृष्ण चारों आश्रमों के प्रकाशक हैं तथा त्रैलोक्य में सच्चे गृहस्थ एक अकेले
श्रीकृष्ण ही हैं, सच्ची निष्ठा से वही ब्रह्मचारी हैं। कृष्णदेह में 'दैव' अर्थात 'भाग्य' की प्रधानता नहीं थी। वह

'लीलाविग्रही' अर्थात स्वेच्छा से देहधारण करने वाला (अन्य जीवों की तरह कर्म से कर्मपरावलंबी-देह
धारण करने वालों की तरह नहीं) तथा शुद्ध चैतन्य सागर पर एक लहर के समान उसका देह था। उसके सारे
कर्म पवित्र करने वाले थे। उनका श्रवण और कथन करने से ही सबका उद्धार होता है। कृष्ण के कर्मों का जो
स्मरण करता है, उसका वही कर्म जीव को कर्मबन्धन से मुक्त करता है। दोनों का उद्धार करने के लिए ही
श्रीकृष्ण ने ऐसा उत्कृष्ट कर्माचरण किया था। यदि यह कहें कि श्रीकृष्ण सकाम होंगे इसीलिए उन्होंने
कर्माचरण किया तो फिर जिसका नाम दूसरे को निष्काम कर सकता है वह स्वयं सकाम कैसे हो सकता है?
श्रीकृष्ण की विषय भोग लीलाओं का स्मरण करने से संन्यासी भी अपने आप निष्काम हो जाते हैं। विषयी
लोगों की भी विषयेच्छा नष्ट हो सके ऐसा ही उदार कर्माचरण उसने किया सभी दृष्टियों से पूर्णकाम होते हुए
उसने असाधारण कार्य किये। केवल स्मरण मात्र से लोग भवसागर पार कर सकें इसलिए उसने अपनी कीर्ति
का विस्तार किया और वह कर्म भी कितना मंगलदायक था। किंचित श्रवण मात्र से ही कर्म का फल तत्काल
नष्ट हो जाता है। श्रवण से मन में सद्भाव उत्पन्न होता है, सद्भाव से देवत्व प्रकट होता है और उससे
अहंकार नष्ट होता है। श्रीकृष्ण की कीर्ति का स्मरण, श्रवण अथवा पठन करने से अनेक लोगों का उद्धार हुआ
है और आगे भी होगा। पूर्वजन्म में पुण्य कमाया है तभी हरिकथा में मन लगता है, अन्यथा अनेक लोगों को
अनायास ही गहरी निद्रा आ जाती है। जो हरिकथा में तत्पर रहते हैं उनके पुण्य की कोई सीमा नहीं है। कीर्तन
से दीनों का उद्धार हो इसलिए श्रीकृष्ण ने इस सरल उपाय की योजना की है। हरिकीर्तन की कथाओं को जोर
से कहने से प्रायश्चित लज्जा से नत हो जाते हैं और तीर्थों का बड़प्पन भी कम हो जाता है। नाममात्र से ही
मुक्ति प्राप्त होती है। इस प्रकार अपनी कीर्ति से उदार, पूर्णब्रह्म शार्ङ्गधर, लीलाविग्रही सर्वेश्वर ने यदुवंश में
पूर्णावतार धारण किया था। उसे नहीं लगता था कि पृथ्वी का भार कम हुआ है क्योंकि जो अत्यन्त प्रबल
यादव बचे हुए हैं उनका भी निर्दलन हो जाना चाहिए ऐसा उनका विचार था। श्रीकृष्ण ने कहा, अब इस
अवतार में मेरे लिए इतना ही कार्य बच रहा है—अपने वंश को समाप्त करना। उसे पूरा कर फिर निजधाम को
चलूँ। यादवों के कालस्वरूप देवाधिदेव ने भविष्य को ध्यान में रखते हुए जो चमत्कार किया उसे सुनिए।
नारदादि मुनियों को स्वयं श्रीकृष्ण ने बुलाकर आग्रहपूर्वक बताया कि अब आप लोग यहाँ से चले जाएँ क्योंकि
संतजन जिस स्थान को छोड़ कर चले जाते हैं वहाँ अनर्थ की लीला शुरु हो जाती है। इसलिए यादवों के
विनाश के लिए पहले यही आवश्यक है यह जानकर उन्होंने यह युक्ति रची। भक्त, संत और साधु जिसके
निकट हों वहाँ अनर्थ की भीड़ नहीं रहती। यह रहस्य केवल श्रीकृष्ण को ही मालूम था। जहाँ संतों का
समुदाय रहता है वहाँ जन्म और मृत्यु का भी अभाव रहता है। यह बात केवल श्रीकृष्ण को ही मालूम होने के
कारण उसने ब्रह्मपाश के लिये इसी उपाय की योजना की। जिस स्थान को छोड़ कर संत दूर चले जाते हैं वहाँ
अनर्थ तत्काल मस्तक पर प्रहार करता है। इसे ध्यान में रखकर ही श्रीकृष्ण ने समस्त ऋषियों को द्वारका के
बाहर भेज दिया। ऋषिगण अपने-अपने आश्रम की ओर जाने वाले थे किन्तु इस नाटकीय श्रीकृष्ण ने तीर्थ का
बहाना बनाकर उन्हें 'पिंडारका' भेज दिया। जिनका स्मरण करते ही कलिकाल भी भय से काँपने लगता है,
ऐसे किन-किन ऋषियों को श्रीकृष्ण ने पिंडारका भेजा, जरा सुनो।
विश्वामित्रोऽसितः कण्वो दुर्वासा भृगुरंगिराः।
कश्यपो वामदेवोऽत्रिर्वशिष्ठो नारदादयः ॥ १२ ॥
जो तपस्या के तेज से देदीप्यमान, जो पूर्ण ज्ञान में योग से चैतन्यधन हैं जिनका श्रीकृष्ण निरन्तर वन्दन

प्रथम अध्याय १५
करते थे वे सारे बड़े-बड़े ऋषि पिंडारक जाने के लिए निकल पड़े। गायत्री मंत्र से प्रति सृष्टि निर्माण करने में
समर्थ महा हठी विश्वामित्र भी शीघ्र ही चल पड़े। जहाँ शीत और ऊष्मा की बाधा नहीं होती ऐसे आश्रम में रहने
वाला और जिसके नाम से द्वंद्व भागने लगते हैं, ऐसा असित मुनि भी तत्काल निकल पड़ा। जिसने सूर्य की शरण
में जाकर उसके घोड़े के कान में बैठकर सम्पूर्ण वेदपाठ किया, वह कण्व ऋषि भी निकल पड़ा। जो अत्याहारी
होते हुए भी निराहारी के नाम से प्रसिद्ध थे वे दुर्वासा ऋषि भी तेजी से द्वारका के बाहर चल पड़े। जिस भृगु ने
मारी हुई लात को श्रीकृष्ण हृदय पर धारण कर वह 'श्रीवत्स' भूषण कह कर विचरण करता है, वह भृगु ऋषि
भी चल पड़ा। अंगिरांऋषि तो स्वयं सृष्टि में बुद्धिमान, जिसका पुत्र देवगुरु बृहस्पति था वह भी जाने के लिए
निकला। कश्यप की बात तो विचित्र ही थी। उसने सुर, नर, किन्नर आदि को जन्म दिया और जिस लिए इस
सृष्टि को 'काश्यपसृष्टि' भी कहते हैं, वह भी जाने के लिए निकल पड़ा। सभी युक्तों में जो योग्यता में श्रेष्ठ है,
जिनका वर्णन वेदों में भी है वे वामदेवऋषि भी जाने के लिए निकल पड़े। अत्रि का भी चमत्कार ही है। उन्होंने
तीन देवताओं को जन्म दिया। उस श्रीदत्त महाराज को बड़े-बड़े योगी भी वन्दन करते हैं। अनुसूया का यह कैसा
अहोभाग्य है। वे अत्रि मुनि सभी ऋषियों में श्रेष्ठ होते हुए भी श्रीकृष्ण की आज्ञा मानने के लिए सदैव तत्पर
रहते थे। इसलिए उन्होंने पिंडारक जाने में बड़ी जल्दी की। जो श्रीराम के सद्गुरु, ब्रह्मज्ञान के कारण नितांत
उदार, जिसकी कफ़नी की ऐसी महिमा थी कि उसने तेजस्विता में सूर्य को भी पीछे छोड़ दिया। ऐसा वह
वसिष्ठ ऋषि भी कृष्ण की सूचना स्वीकार कर तुरन्त द्वारका छोड़ कर पिंडारक जाने के लिए निकल पड़े। उसी
प्रकार देवर्षि नारद जिसका ज्ञान भी अगाध था जो सदैव परमानन्द में लीन रहते थे और जिनकी उत्सुकता
हरिकीर्तन में ही रहती थी वे भी कन्धे पर वीणा रखकर ब्रह्मपद गाते-गाते ब्रह्मानन्द से नाचते-गाते पिंडारक की
ओर चल पड़े। ऐसे सारे मुनिश्रेष्ठ और बड़े-बड़े ऋषि सपरिवार शिष्य समुदाय के साथ पिंडारक में एकत्र हुए।
इस प्रकार पिंडारक में शाप देने और अनुग्रह करने में भी समर्थ सभी ऋषि एकत्र हुए और कृष्ण के वैभव का
वर्णन करने लगे। कपटी-नाटकी श्रीकृष्ण ने इधर तुरन्त कुलक्षय करने की इच्छा से अपने ही लड़कों का कपट-
मेला आयोजित कराकर बड़े-बड़े ऋषियों की हँसी उड़वायी। निंदा, अपमान तथा दिल्लगी करने से ब्राह्मणों का
छल होता है और यदि ब्राह्मणों का पूरी तरह द्वेष हुआ तो फिर कुलक्षय हो गया ऐसा निश्चय ही समझिये !
ब्राह्मणों के गुस्से के सामने कुल की क्या बिसात है। महादेव का लिंग गल गया और इन्द्र की सारी सम्पत्ति समुद्र
में डूब गयी। सारा समुद्र भी खारा कर डाला।'ऐसा भयानक कोप था ब्राह्मणों का। ऐसा चरित्र जिन ऋषियों का
था 'वे सब वहाँ एकत्र थे। पृथ्वी पर ब्राह्मण ही ब्रह्म का रूप है और उसका वचन परमप्रमाण है यह सच कर
दिखाने के लिए ही श्रीकृष्ण ने कुल का संहार कर दिखलाया।
क्रीडन्तस्तनुपव्रज्य कुमारा यदुनन्दनाः।
उपसंगृह्य पप्रच्छुरविनीता विनीतवत्॥ १३॥
सभी यादवपुत्र गेंद खेलने लगे। वे गेंद को ऊपर ही ऊपर लोक लेते थे और एक-दूसरे को मारते हुए
शरीर को बचाते हुए भागते जाते थे। इस प्रकार विविध प्रकार से मजे लेते हुए वे यादवों के लड़के पिंडारक
पहुँचे। उनमें अपनी अमीरी का जबरदस्त अहंकार भरा हुआ था। वे सभी मदोन्मत्त होकर बड़े उद्धत हो गये थे।
उन्होंने अपने मन में विचार किया कि यहाँ भूत भविष्य जानने वाले अनेक महर्षि एकत्र हुए हैं। सुना है कि
उनकी बातें बिल्कुल सच सिद्ध होती हैं। लेकिन हम लोग उन्हें अवश्य चकमा दे सकेंगे। क्योंकि जो कभी भी

१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
घटना सम्भव नहीं है, वह इनके वचनों से भी कैसे घटेगा ? यह कहकर यादव वंश के लड़कों ने बड़े-बड़े
ऋषियों के सामने एक कपट प्रस्तुत किया।
ते वेषयित्वा स्त्रीवेषैः साम्बं जाम्बवतीसुतम्।
एषा पृच्छति वो विप्रा अंतर्वत्न्यसितेक्षणा ॥ १४ ॥
पहले से ही लक्ष्मी के मद में लीन, तिस पर कपट की योजना बनायी। उन्होंने जांबवती के पुत्र 'सांब'
को स्त्री के वेष में सजाया। वह साँवला और सुन्दर था। उसकी आँखें पानीदार थी। उस पर वह स्त्रीवेष
बहुत ही फबने लगा और वह अभिनय पटु होने के कारण स्त्रियोचित लज्जा, नेत्रकटाक्षादि हावभाव आदि का
उत्तम ढंग से प्रदर्शन कर सका। उसने आँखों में काजल लगाया था। वह इस प्रकार नेत्रकटाक्ष करने लगा
जिससे उस पर नजर टिक नहीं पाती थी। वह स्वाभाविक रूप से ही सुन्दर और नाजुक था। तिस पर वह
हंस की गति से धीरे-धीरे चलने लगा। कुछ शैतान बच्चों ने उसके पेट पर कपड़े के टुकड़े बाँध कर पेट को
बड़ा कर दिया था, जिससे वह कोई गर्भवती स्त्री मालूम होती थी। सखियों के कन्धे पर हाथ रख कर वह
धीमे कदमों से इस प्रकार चल रही थी ताकि पेट न हिलने पाये। इस प्रकार पग-पग पर सुस्ताते हुए चलने
वाली उस युवती को ऋषियों ने देखा। स्त्रियोचित मर्यादा का पालन करते हुए वह ऋषियों से थोड़े से अन्तर
पर खड़ी हो गयी। उसके साथ के लड़के ऋषियों के पास पहुँच आए उन्होंने उन्हें साष्टांग दण्डवत किया।
छल करने के उद्देश्य से आये उन यदुकुमारों ने उन ऋषियों की प्रदक्षिणा की, अत्यन्त आदर के साथ उनका
चरणस्पर्श किया और बोले, हम आपके दर्शन के लिए आये हैं। इस प्रकार वे सभी राजकुमार भीतर से अनम्र
होते हुए भी ऊपर से विनम्र होने का दंभ भरते हुए हाथ जोड़कर खड़े हो गये और अत्यन्त लीनता से उन
ऋषियों से इस प्रकार निवेदन किया, "महाराज ! उस तरफ वह जो स्त्री खड़ी है, उसे आपके वचनों पर
अत्यधिक विश्वास है। वह गर्भवती है और उसका समय पूरा हो चला है। उस सुन्दरी को आप से स्वयं
पूछने में लज्जा का अनुभव हो रहा है।"
प्रष्टु विलज्जती साक्षात् प्रभूतामोघदर्शनाः ।
प्रसोष्यन्ती पुत्रकामा किं स्वित्सजनयिष्यति ॥ १५ ॥
उसे स्वयं आपके पास आकर पूछने का साहस नहीं होता, इसलिये उसने हमारे माध्यम से आपसे विनती
की है। आप सचमुच ही सत्यदर्शी हैं, आपका वचन कभी भी असत्य नहीं होता। साक्षात हरिहर भी आपकी
वन्दना करते हैं। आप सभी प्रकार का ज्ञान प्रदान करने में उदार हैं। इसलिये यह गर्भवती स्त्री आपसे यह
सविनय पूछ रही है कि वह किसे जन्म देगी ? उसे तो पुत्र की इच्छा है। इस प्रकार वे कपट भक्ति से हाथ जोड़
कर खड़े हो गये। उन्हें कपट ही प्रिय होने के कारण उन्हें फल भी उनकी भावना के अनुरूप ही मिले। उनका
यह झूठा कर्म पहचान कर नारद तो ऋषियों के आगे नाचने लगे। उन्होंने मन ही मन कहा, यादवों की मृत्यु अब
अत्यन्त निकट आ गयी है। चूँटी को जब पर निकलने लगते हैं तो उसकी मृत्यु निश्चित हो जाती है। इस प्रकार
ब्राह्मणों का छल होने पर कुल का विनाश निश्चित ही है। ब्राह्मण भले ही गाली या शाप दे लेकिन उसे
भक्तिपूर्वक प्रणाम करना चाहिए। ब्राह्मण यदि मारने के लिए आये तो उसके सामने मस्तक झुकाना चाहिये। उन
ब्राह्मणों का छल करना विषभक्षण करने की तरह है। विष में तो केवल खाने वाले के प्राण चले जाते हैं किन्तु
ब्राह्मणों का छल करने से सारे कुल का नाश होता है। विद्वान अथवा अविद्वान का मन में विचार लाये बिना,

प्रथम अध्याय १७
ब्राह्मण पृथ्वी पर ब्रह्म का ही अवतार है ऐसा समझना चाहिए। उसका छल करने से कुलक्षय निश्चित है ऐसा
समझना चाहिए।
एवं प्रलब्धा मुनयस्तानूचुः कुपिता नृप।
जनयिष्यति वो मन्दा मुसलं कुलनाशनम्॥ १६॥
हे राजाधिराज परीक्षित सुनो ! इस प्रकार उन यादवों के शरीर में मानों मृत्यु की वायु का संचार ही हो चुका
था इसलिए वे उन ऋषियों का छल करने गये। उनका प्रश्न कपटपूर्ण है, यह मालूम होने पर उन्हें अत्यन्त क्रोध
हुआ। फिर क्या ! उन उद्धत लड़कों पर उन्होंने अनिवार्य वाग्वज्र छोड़ा। उन्होंने कहा, अरे ! इसके गर्भ से जो
बालक उत्पन्न होगा वह तुम्हारे कुल के लिए कालस्वरूप होगा। आप सभी अभागे हैं। शुद्ध लोहे के मूसल का
वह प्रसव करेगी।
तच्छ्रुत्वातेऽतिसंत्रस्ता विमुच्य सहसोदरम्।
साम्बस्य ददृशुस्तस्मिन् मुसलं कुलनाशनम्॥ १७॥
यह शापवचन सुनकर यादवों के वे लड़के घबरा गये। उन्होंने तत्काल उस सांवा के पेट पर बाँधा हुआ
कपड़ा हटा कर देखा। तो वहीं पर लोहे का मूसल निकला हुआ दिखायी दिया। उसे देखते ही सब लोग
भयविह्वल हो गये, एकाएक चौंक गये और आश्चर्यचकित हो गये। यादवों के कुल का विनाश करने का जो
संकल्प श्रीकृष्ण ने लिया था वही उन ऋषियों के शब्द के साथ तत्काल मूसल बन गया। ब्राह्मण जिन-जिन
वचनों का उच्चार करते हैं उन्हें श्रीकृष्ण झूठा नहीं होने देते। ब्राह्मण के मुँह से निकले हुए शब्द को श्रीकृष्ण
स्वयं सच करके दिखाते हैं। उन महान ऋषियों का कोप देखकर तथा कुलक्षय का शाप सुनकर उन यदुकुमारों
को बड़ा खेद हुआ और वे भय से काँपने लगे।
किं कृतं मन्दभाग्यैर्नः किं वदिष्यन्ति नो जनाः।
इति विह्वलिता गेहानादायं मुसलं ययुः॥ १८॥
हम भाग्यहीन हैं, हमने व्यर्थ ही कपटपूर्वक उन महान ऋषियों को चिढ़ाया और अपने ही हाथ से अपना
घात कर कपट के द्वारा घर में कुलक्षय ले आये। अब नगरवासी हमें क्या कहेंगे? वे कहेंगे इन ब्राह्मणों का
छल करने की क्या आवश्यकता थी? इसलिए चिंताक्रांत हो कर, म्लान मुख से वे सब उस मूसल को लेकर घर
आ गये।
तच्चोपनीय सदसि परिम्लानमुखश्रियः।
राज्ञ आवेदयाञ्चक्रुः सर्वयादवसन्निधौ ॥ १९॥
सभा में वसुदेव, उग्रसेन, बलराम, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न आदि अनेक यादव बैठे थे, केवल श्रीकृष्ण वहाँ नहीं
था। ऐसी उस सभा में सांब आदि सभी कुमार आये और लोहे का वह मूसल सामने रखकर मुँह छोटा कर पूरा
वृत्तांत सुनाने लगे।
श्रुत्वाऽमोघं ब्रह्मशापं दृष्ट्वा च मुसलं नृप।
विस्मिता भयसंत्रस्ता बभूवुर्द्वार्रकौकसः ॥ २० ॥
श्लोक २०—ब्राह्मणों का हमारे ऊपर भयंकर कोप हुआ है यह देखकर यादव भी भय से काँपने लगे।

१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ब्राह्मणों का शाप कभी व्यर्थ नहीं जाता यह जानने के कारण भय के मारे उनकी सूझबूझ समाप्त हो गयी। प्रत्यक्ष
मूसल देख कर तो उनमें खलबली मच गयी। नागरिकों में तो यही कोलाहल मच गया कि अब यादवों का कुल
बचता है या नहीं ? राजा परीक्षित ! सुनो, भविष्य की गति बड़ी कठिन है क्योंकि वह वृत्तांत उन्होंने श्रीकृष्ण को
नहीं जानने दिया। वे अपने ही मत से विचार करने लगे।
तच्चूर्णयित्वा मुसलं यदुराजः स आहुकः।
समुद्रसलिले प्रास्यल्लोहं चास्यावशेषितम् ॥ २१॥
यादवों के राजा उग्रसेन ने लोहे के हथौड़े से उस मूसल का चूर्ण बनवाकर उसे समुद्र में फिंकवा दिया।
लेकिन उस मूसल का अग्रभाग अत्यन्त दुष्कर था। किसी भी प्रकार से उसका चूर्ण नहीं हो पा रहा था। वह
निखालस वज्र की तरह कठिन था। इसलिए उसे उसी तरह समुद्र में दूर फेंक दिया।
कश्चिन्मत्स्योऽग्रसोल्लोहं चूर्णानि तरलैस्ततः।
उह्यमानानि वेलायां लग्नान्यासन्किलैरकाः ॥ २२॥
मत्स्यो गृहीतो मत्स्यघ्नैर्जालेनान्यैः सहार्णवे।
तस्योदरगतं लोहं स शल्ये लुब्धकोऽकरोत् ॥ २३ ॥
समुद्र की लहरों के ज्वार से लौह का वह सारा चूर्ण प्रभास तीर्थ के तट पर लगकर बड़ी-बड़ी घास के
रूप में प्रस्फुटित हुआ। लोहे का टुकड़ा एक मछली ने निगल लिया। उस मछली को एक मछुआरे ने जाल डाल
कर अन्य मछलियों के साथ पकड़ लिया। फिर जब मछुआरे ने उस मछली को चीरा लगाया तो उसके पेट में से
लोहे का टुकड़ा निकला। उसे देखकर मछुआरे को बड़ी प्रसन्नता हुई क्योंकि वह लोहा जिसे प्राप्त होता है वह
बड़ा भाग्यशाली होता है। कहते हैं कि मछली के पेट से निकले हुए लोहे का निशाना अचूक लगता है और
इसीलिए असाध्य शिकार भी सध जाता है। इसलिए मछुआरे ने उस लोहे का बाण बनाया।
भगवान्ज्ञातसर्वार्थ ईश्वरोऽपि तदन्यथा।
कर्तुं नैच्छद्विप्रशापं कालरूप्यन्वमोदत ॥ २४ ॥
लोहे का चूर्ण बनाने की तथा उसे समुद्र में फेंकने की वार्ता बिना किसी के कहे सर्वज्ञ श्रीकृष्ण को मालूम
हुई। लेकिन ब्राह्मणों के शाप को झुठलाने का विचार भी उसके मन में नहीं आया। कोई कह सकता है कि यह
उसके वश में ही नहीं होगा। ब्राह्मणों का शाप झुठलाना उनसे सम्भव ही नहीं था। तो देखो, जिसने गुरु के
मृतपुत्र को जीवित कर दिया वह श्रीकृष्ण कलिकाल का भी नियंता था। कलिकाल के दाँत तोड़ कर जिसने
देवकी के गर्भ वापस लाये, वह श्रीकृष्ण वास्तव में ईश्वर का भी ईश्वर है। मन में आयी हुई बात को मूर्त रूप
देने का सामर्थ्य मुझ में है यह बात वह जानता था। बिना किसी की नींद भंग किये जिसने पूरी मथुरा को द्वारका
में स्थानान्तरित कर दिया वह श्रीकृष्ण क्या नहीं कर सकता? लेकिन उसने भी अपने कुल की ममता का मोह
नहीं किया। अपने कुल के क्षय का प्रसंग आया। फिर भी उसने ब्राह्मणों का शब्द झूठा सिद्ध नहीं होने दिया।
यद्यपि ब्राह्मण ने लात मारी फिर भी उसने उसे हृदय पर धारण कर लिया। उसे ही श्रीवत्सलांछन कहते हैं। उसे
ही सर्वभूषणों में श्रेष्ठ मानकर वह हृदय पर धारण करता था। इसीलिये वह पूर्ण ब्रह्मण्यदेव है। श्रीकृष्ण ब्राह्मणों
को अपने मस्तक पर रखकर उनका वंदन करता था। वह ब्राह्मणों के वचन को कभी झूठा नहीं होने देता था।

इसलिए, वेदस्तुतिपाठक उसका 'पूर्ण ब्रह्मण्यदेव' के रूप में वर्णन करते हैं। स्वयं श्रीकृष्ण भी ब्राह्मणरूप ही था
इसीलिए तो वह ब्राह्मणों का पक्ष लेता था। कुलक्षत्रय हुआ फिर भी ब्राह्मणों पर कुपित नहीं हुआ। ब्राह्मणों का
शाप सुनकर वह मोह में नहीं पड़ा, बल्कि उलटे मेरा संकल्प पूरा हुआ यह ठीक ही हुआ ऐसा उसने कहा। इस
प्रकार कालरूपी श्रीकृष्ण ने इसमें प्रसन्नता ही मानी। कुलक्षय से क्षिति अथवा दुःख से उसने जरा भी सम्बन्ध
नहीं रखा। इसके विपरीत उसे परम संतोष प्राप्त हुआ। उसकी ज्ञानमय कथा अगले अध्याय में है। वह अत्यन्त
रसाल एवं आनन्ददायक है इसलिए श्रोताओं को मेरे निरूपण पर ध्यान देना चाहिए। उसमें नारद और वसुदेव में
बहुत ही मधुर संवाद होगा। जनक और ऋषभदेव के प्रश्नोत्तर सुनकर जीव आनन्द सागर में तैरता रहेगा। यह
रसाल ब्रह्मज्ञान की कथा है, शुद्ध परमार्थ है। उसके प्रति मैं आपके मन में रुचि जगाऊँगा। इसके लिए एकनाथ
गुरु जनार्दन की तथा अर्थ की ओर ध्यान देने के लिए श्रोताओं की प्रार्थना कर रहा है।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशे स्कंधे परमहंससंहितायां
एकाकारटीकायां विप्रशापः प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु।

द्वितीय अध्याय
हे देवाधिदेव ! तुम्हारी जय हो। तुम स्वसामर्थ्य से ब्रह्मभाव का भोग करते हो। जब तुम कृपा से अवलोकन
करते हो, तब विश्व में विश्वात्मा की व्याप्ति का अनुभव होता है। इस विश्व में जो विश्ववासी है, उस पर
विश्वास रखने के लिए तुम कहते हो और वैसा से तुम प्रसन्न होते हो और प्रसन्न होने पर अपने निजपद में स्थान
देते हो। उन चरणों की कृपा से 'अहं' 'सोहं' के बन्धन टूट जाते हैं और मैं तुम्हारे उदर में प्रवेश कर जाता हूँ।
तुम मेरी माता हो इस दृष्टि से जब तुम्हारी ओर देखता हूँ तो पाता हूँ कि पिता भी तुम ही हो। इससे अधिक
आश्चर्य की बात और क्या बताऊँ? इस लोक में तो माता और पिता अलग-अलग रहते हैं लेकिन वे दोनों
जनार्दन में ऐक्यरूप में विद्यमान हैं और मैं उनका नन्हा-सा बालक बन गया हूँ। इसलिए इन दोनों का स्नेह
एकत्र कर इस बालक को पालते हो और प्रतिदिन आत्मबोध का नया वैभव दिखला रहे हो। शिव, शक्ति, गणेश
तथा उसी प्रकार विश्व, विष्णु, सूर्य आदि अनेक अलंकार अपनी ही प्रसन्नता के लिए मुझे पहनाते हो। इस प्रकार
तुम मुझे, अपने शिशु को आभूषण पहनाते हो और कृपादृष्टि से वह वैभव तुम ही देखते हो। बालक के शरीर
पर अलंकार पहनाने से, उसकी शोभा और सुख बालक को कैसे मालूम होगा ? वह वैभव तो माँ ही भोगती है।
इस प्रकार मुझसे ग्रन्थ कहलवा कर उसका सुख जनार्दन ही लें। अपने चिद्रत्नों की माला मेरे गले में तुम ही
पहनाते हो और सुरक्षा के लिए एकात्म होकर मेरे पीछे दौड़ते हो। जिसका पिता सम्पन्न होता है, उसे सभी लोग
सम्मान देते हैं। उसी प्रकार जनार्दन ने इस एका को अपना कहा, इसलिए अमान्य होते हुए भी वह अधिक
मान्यता के लिए पात्र हुआ है। बालक स्वयं बोल नहीं सकता इसलिए उसकी माँ उसे बोलना सिखलाती है।
उसी प्रकार इस ग्रन्थ की कथा गुरु जनार्दन मुझसे कहलवा रहे हैं। उन्होंने यहाँ कितना बड़ा चमत्कार कर
दिखाया कि श्रीभागवत के एकादश स्कन्ध का अर्थ और वह भी मराठी भाषा में मुझ जैसे मूर्ख से कहलवाया।
खैर ! पहला अध्याय श्रवण कर राजा परीक्षित मौन बैठे रह गये। आगे की कथा सुनने की उन्हें इच्छा नहीं दिखाई
दी। क्योंकि, यदि मैंने अब प्रश्न किया तो शुक्राचार्य कृष्ण निधन की कथा सुनाएंगे। इसलिए वह राजा शान्त बैठ
गया। उसके मन का यह अभिप्राय जानकर शुक्राचार्य बोले, "हे परीक्षित ! इस अध्याय को मोक्ष का प्रस्ताव
समझ लो। यह पूरा अठारहवाँ स्कन्ध ही बड़ा अलौकिक है। इसमें एक से एक बढ़कर श्लोक हैं तथा
आत्मसाधन करने वाले के लिए पग-पग पर मुक्तिसुख प्राप्त होता है।" इतना सुनते ही राजा सावधान हो गया।
क्योंकि उसे मुक्तिसुख की अत्यधिक चाह थी। उसने सर्वांगों को कर्ण बनाया। यह देखकर शुक्राचार्य के चित्त
को अतीव आनन्द हुआ और उन्होंने कहा, "तुम तो अवधान की मूर्ति ही बन गये हो, तो अब अंतःकरण को
शान्तकर गुह्यज्ञान सुनो।" दूसरे अध्याय में नारद और वसुदेव के बीच के संवाद का निरूपण है। इसमें मुख्य
रूप से भागवतधर्म का लक्षण प्रश्नोत्तर के रूप में बताया गया है।
श्रीशुक उवाच
गोविन्दभुजगुप्तायां द्वारवत्यां कुरूद्वह।
अवात्सीन्नारदोऽभीक्ष्णं कृष्णोपासनलालसः ॥ १ ॥
जो मुक्त लोगों में अग्रणी है, ब्रह्मचारियों में शिरोमणि है, जिसे योगीजन भी वन्दनीय मानते हैं, जो

द्वितीय अध्याय २१
भक्तमण्डल में अत्यन्त श्रेष्ठ है, जो ब्रह्मरस का सागर तथा आत्मबोध का पूर्णचन्द्र है, वह शुक योगीन्द्र बोलने
लगा और कुरुवंश का राजाधिराज सुनने लगा। शुक्राचार्य ने कहा, जो व्यासजी के साक्षात गुरु तथा मेरे परमगुरु
महामुनीश्वर नारद हैं उनका श्रीकृष्ण भजन से अत्यन्त प्रेम था। श्रीकृष्ण ने स्वयं ही सारे मुनिजनों को द्वारका से
पिंडारक भेजा था, लेकिन नारदजी वहाँ से बार-बार द्वारका आते थे क्योंकि द्वारका में कालपुरुष का प्रवेश नहीं
होता था। इसलिये वहाँ श्रीकृष्ण अपने स्वसामर्थ्य से विचरण कर रहे थे। नारदजी को दक्ष का शाप था कि वे
क्षणभर के लिए भी एक स्थान पर नहीं रह सकेंगे, लेकिन यह शाप हरिकीर्तन में लागू नहीं होता था इसलिए वे
निरन्तर कीर्तन में ही लीन रहते थे। कीर्तन गाने में जिसकी ख्याति थी वे लक्ष्मीपति श्रीकृष्ण स्वयं द्वारका में
निवास करते थे इसलिए वहाँ भी इस शाप की बाधा नहीं उपस्थित होती थी इसीलिए नारदजी निरन्तर वहीं
निवास करते थे। नारद को पूर्ण ब्रह्मज्ञान था तो फिर उसे सगुण श्रीकृष्ण मूर्ति क्यों अच्छी लगती थी ? क्योंकि
यद्यपि श्रीकृष्ण देहधारी थे फिर भी उनका देह केवल चैतन्यमय था इसलिए श्रीकृष्ण का भजन नारदजी को
अत्यन्त प्रिय था। इस प्रकार जब श्रीकृष्ण का भजन मुक्तों को भी भला लगता है तो ऐसा भाग्यहीन कौन है जो
उसे नहीं भजता ? शुक्राचार्यजी इसी का निरूपण करते हैं।
को नु राजन्निन्द्रियवान्मुकुन्दचरणाम्बुजम्।
न भजेत्सर्वतोमृत्युरूपास्यममरोत्तमैः ॥ २ ॥
हे राजश्रेष्ठ ! यह उत्तम नरदेह पाकर भी जो श्रीकृष्ण को नहीं भजता, उसे माया रूपी घोर दुःख ग्रस लेता
है, यह जान लो। जिस भगवान के लिए उसके पैरों से निकले उदक को मस्तक पर धारण कर सदाशिव
महाश्मशान में आत्मध्यान में बैठा हुआ है, जिनसे साक्षात ब्रह्माजी पैदा हुए हैं वहाँ दूसरों की क्या बात की
जाय ? नरदेह पाकर भी जो नारायण को नहीं भजता उसे पूर्ण रूप से मृत्यु से ग्रसित समझना चाहिए। परमात्मा
श्रीकृष्ण को छोड़कर जो लोग अन्य प्रकार के साधनों के फेर में पड़ते हैं उनको संसार बन्धन से कभी मुक्ति नहीं
मिल सकती। श्रीकृष्ण चरणों को छोड़कर कुछ लोग इन्द्रादि देवों का भजन करते हैं, लेकिन जब वे देवता ही
मृत्युग्रस्त हैं तो वे भजने वालों की मृत्यु को कैसे टाल सकते हैं ? सभी इन्द्रिय सुरक्षित होते हुए भी जो श्रीकृष्ण
चरणों का भजन नहीं करता, वह कहीं भी जाए लेकिन मृत्यु उसका साथ नहीं छोड़ती। वह हर क्षण उसका
विनाश करती है। महामुनि नारद, मुक्त होते हुए भी निरन्तर उनके भजन में तल्लीन रहते हैं। वह हमेशा द्वारका में
ही रहते थे। उनकी श्रीकृष्ण पर अत्यन्त प्रीति थी।
तमेकदा तु देवर्षिं वसुदेवो गृहागतम्।
अर्चितं सुखमासीनमभिवाद्येदमब्रवीत् ॥ ३ ॥
अहा ! नारदजी धन्य हैं। उन्हें सर्वत्र श्रीकृष्ण ही दिखाई देते थे। उन्हें सदा हरिनाम का ही व्यसन था और
वे परमानन्द में ही निमग्न रहा करते थे। जो श्रीकृष्ण का चहेता था और जिसे श्रीकृष्ण सभी दृष्टियों से चाहते थे,
जिसके संग से जड़ जीवों को भी मुक्ति प्राप्त होती है, उसे देखते ही वसुदेव को अत्यन्त प्रसन्नता हुई। उन्हें
साष्टांग दण्डवत कर उन्हें बैठने के लिए उच्चासन दिया। साक्षात परब्रह्म ही घर में आये हैं, इस प्रकार श्रद्धाबुद्धि
से उनकी पूजा प्रारम्भ की। नारद साक्षात नारायण ही हैं इस दृढ़ विश्वास से उन्होंने उनकी पूजा की। सुवर्णपात्र
में उनके पैर धोकर मधुपर्क विधि से उनकी पूजा की। इस प्रकार प्रेमपूर्वक पूजा कर—वसुदेव अपने आसन पर
बैठ गये और प्रसन्न अंतःकरण से बोलने लगे।

२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वसुदेव उवाच
भगवन्भवतो यात्रा स्वस्तये सर्वदेहिनाम्।
कृपणानां यथा पित्रोरुत्तमश्लोकवर्त्मनाम् ॥ ४॥
आज आपने स्वयमेव आने की कृपा की इससे मैं अत्यन्त भाग्यवान हो गया हूँ। आप की निकटता से हम
कृतकृत्य हो गये हैं। माँ जब नहीं दिखायी देती तो बच्चा लोगों के बीच असहाय हो उठता है, लेकिन माँ के आते
ही उसके मन में आनन्द समा नहीं पाता। उसकी भी अपेक्षा आपका आगमन अधिक श्रेष्ठ है क्योंकि उससे
प्राणिमात्र को नित्य ही सुख प्राप्त होता है। दीनों का उद्धार करने के लिए आप सहज ही पृथ्वी पर संचार करते
हैं। माँ को आये देख बालक को नित्य नया वैभव प्राप्त होता है लेकिन आपका आगमन समस्त दीनजनों को
सहज ही आत्मसुख का वैभव प्राप्त कराता है। माँ जो सुख प्रदान करती है वह नश्वर रहता है और आपके
आगमन से जो सुख प्राप्त होता है वह शाश्वत होता है। परा से परे चिन्मात्र चित्सुख भोगने का अवसर प्राप्त
होता है। आप भागवत धर्म पर चलने वाले हैं। हम लोग जब प्रयाग संगम पर निष्काम बुद्धि से कोटियज्ञ करते
हैं, तभी हमारी आप से भेंट होती है। नारदजी ! आप भगवत्स्वरूप हैं। आपकी भेंट मात्र से मनुष्य—निष्पाप हो
जाता है। तुम्हारी थोड़ी भी कृपा हो जाए तो तुम्हारा चित्स्वरूप अंतःकरण में अंकित हो जाता है। तुम्हारे ही
कारण भक्ति को अलौकिक महिमा प्राप्त होती है। तुम्हारे ही कारण भक्ति के सामर्थ्य का प्रसार हुआ। तुम्हारे ही
कारण भक्ति भगवत्स्वरूप बनी। तुम अपनी आत्मनिष्ठा के कारण चित्स्वरूप बन गये हो। आप ही भक्ति की
प्रकाशक मशाल हैं, भक्ति मार्ग के पथप्रदर्शक हैं। नारदजी ! आपके अनेक उपकार हैं। आपने भक्ति की हाट ही
सजा दी है। तुमने ही श्रेष्ठ और परिपूर्ण भागवत शास्त्र का व्यासजी को उपदेश कर दीन जनों का उद्धार करने के
लिए दस लक्षण प्रकट किये। नारदजी ! आप ईश्वर समान हैं। लेकिन यह उपमा भी कम है। इस अभिप्राय से
वसुदेव बोले।
भूतानां देवचरितं दुःखाय च सुखाय च।
सुखायैव हि साधूनां त्वादृशामच्युतात्मनाम् ॥ ५ ॥
देवताओं से प्राणियों को सुख और दुःख प्राप्त होते हैं और उनका भोग भोगना पड़ता है। अधिक या कम
वृष्टि होने से प्राणियों में घबराहट उत्पन्न होती है। इसलिए मुझे सचमुच ही ऐसा लगता है कि उन देवताओं की
अपेक्षा साधु ही श्रेष्ठ हैं क्योंकि देवताओं की करनी से दुःख मिश्रित सुख उत्पन्न होता है लेकिन साधु निर्दोष
सुख के दाता हैं। अर्थात् दुःखक्लेशरहित सुख प्रदान करते हैं। तिस पर तुम्हारे जैसा कृपालु आत्मसखा मिलने पर
क्या पूछना। परमार्थ सुख की मानों बहार ही आ जाती है। यह महिमा इन लोगों की समझ में नहीं आती और
विशेष बात यह है कि एक बार यह सुख प्राप्त होने पर वह कल्पांत में भी समाप्त नहीं होता। नारदजी ! यह
अच्युतात्मस्थिति निश्चित रूप से आपके ही पास है। तुम्हारी महिमा की बराबरी भगवान से भी नहीं हो सकती।
वह कैसे ? तो नारदजी ! उसे मैं यथार्थ ढंग से बताता हूँ। देवता का अवतार होने पर उसके दास को सुख प्राप्त
होता है और दैत्य भयाक्रांत हो उठते हैं लेकिन यह भेदभाव आपमें नहीं है। आप देवताओं के भी अपने हैं और
दैत्यों को भी आप पर विश्वास है। रावण तुम्हें एकान्त में अपने मन की गुह्य बातें सुना रहा था। रावण ने
देवताओं को कारागृह में डाल रखा था लेकिन वही तुम्हारे चरणों का वन्दन कर रहा था। अन्त में तुम सचमुच
ही राम के भी मित्र थे। सारांश यह कि तुम्हारे में विषमभाव नहीं है। जरासंध कृष्ण का बैरी था, लेकिन उसके

द्वितीय अध्याय २३
घर भी आपका आना-जाना था और कृष्ण की सभा में तो उसके सम्बन्धी आप ही थे। देवताओं का नाम कोई न
ले इसका बीड़ा हिरण्यकश्यपु ने उठाया था, लेकिन उसे आपका कीर्तन बहुत अच्छा लगता था। इससे ज्ञात होता
है कि आपमें भेदभाव नहीं है। देवताओं के मन में लालच है लेकिन आप साधुओं में वह नहीं है। वह कैसे इसे
भी यथार्थ ढंग से बताता हूँ।
भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान्।
छायेव कर्मसचिवाः साधवो दीनवत्सलाः॥६॥
वे जैसे यज्ञों से देवताओं को संतुष्ट करते हैं, वैसे ही फल देवता उन्हें देते हैं और जो उन्हें नहीं भजते उन
पर विपदाएँ लाते हैं ऐसी देवताओं की चाल है। पुरुष जिस प्रकार घूमता है उसी प्रकार उसकी छाया भी घूमती
है। उसी प्रकार देवताओं का भजन करने से वे बहुत प्रसन्न होते हैं, नहीं तो उलटे उनके मार्ग में विघ्न लाते हैं।
प्रातःकाल सूर्य जिस प्रकार ऊपर चढ़ता जाता है वैसे-वैसे छाया भी निकट आने लगती है। उसी प्रकार हमारे
कर्म के अनुसार भगवान भी निकट आने लगते हैं, अर्थात् प्रसन्न होते हैं। सूर्यास्त होते ही छाया विलुप्त हो जाती
है, उसी प्रकार भजन न करने से देवता क्षुब्ध हो जाते हैं। उसी प्रकार देवता स्वार्थी हैं यह आप भी जानते हैं।
अन्य देवताओं की बात क्या करें ? लेकिन जो सबसे बड़ा देवता है वह भी पक्का घूसखोर है, वह भी प्राण लिये
बिना भेंट नहीं करता और गर्भवास हमें सहना पड़ता है। उसका प्रेमपूर्वक भजन करने से वह अपना निजांग
देकर भी प्रसन्न होता है लेकिन जो उसे नहीं भजता उसके घर भूल कर भी नहीं जाता। लेकिन संतों की बुद्धि
वैसी नहीं है। आप तो सचमुच ही दीनों पर दया करने वाले हैं। कृपा की निधि हैं। वह कैसे यह बताता हूँ।
आपने व्यासजी को सज्ञान जानकर ब्रह्मज्ञान का उपदेश किया लेकिन ध्रुव को अज्ञान बालक जानकर उसकी
उपेक्षा नहीं की। आपने जब प्रह्लाद को उपदेश दिया उस समय वह दैत्य का पुत्र है यह विचार भी आपके मन में
नहीं आया। आपकी कृपा की लहर यही दीन जनों का विश्रामस्थल है। वाल्या धीवर राह में लूटपाट करता था,
न भजन जानता था न पूजन करता था उसे आपने रामनाम का उपदेश देकर महाकवि वाल्मीकि बनाया। उसका
वन्दन देवता भी करते हैं। उसके ग्रन्थ को देखकर सदाशिव भी आनन्द से विभोर हो उठते हैं। ऐसे आप कृपालु
और अनाथ के लिए आश्रयस्थल हैं। तुम बाह्य रूप से कुपित होते हो, लेकिन फिर उसका पाप दूर करते हो और
अंततः, हे दयालु ! एकत्व का दीप जला कर सद्रूप दिखलाते हो। आप सचमुच ही अच्युतात्मा हैं, इसलिए
भगवान भी आपकी आज्ञा का पालन करते हैं। आप उससे जिसका उद्धार करने के लिए कहते हैं, उसी का वे
उद्धार करते हैं। अन्यथा उसका हाथ भी नहीं पकड़ते। इस प्रकार आप दीनों को परमार्थ की दीक्षा देने वाले गुरु
हैं और ब्रह्मज्ञान से अत्यन्त उदार हैं। इसलिए अब जो बात मैं पूछूँगा उसे ठीक तरह से बताइये।
ब्रह्मांस्तथापि पृच्छामो धर्मान् भागवतांस्तव।
यान्श्रुत्वा श्रद्धया मर्त्यो मुच्यते विश्वतो भयात् ॥ ७ ॥
उसने पुनः आदरपूर्वक कहा, "हे देवर्षि ! आज मेरे सारे कर्म फलीभूत हुए। क्योंकि आत्मसुख देने वाले
आप हमारे घर आये। पहले आपने जिस प्रकार शिष्यों पर कृपा की थी उसी प्रकार मुझ पर भी कृपा कर मुझे
संसार पाश से छुड़वाइये। आप पर मेरा पूर्ण विश्वास है। आपने अपने दर्शन से मुझे सचमुच ही कृतकृत्य कर
दिया। तो अब वैसी ही कृपा से मुझे यथार्थ ढंग से भागवत कथा का निरूपण करें। भागवतधर्म इस प्रकार बताएँ
जिससे समस्त कर्मों का विलय हो जाए और उसका श्रद्धापूर्वक श्रवण करने से जन्ममरण से मुक्ति प्राप्त हो

२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जाए। संसार का भय अत्यन्त विदारक है और उसका मूल कारण माया है। वह माया जिस धर्म से समूल नष्ट हो
जा, ऐसे धर्म के बारे में मुझे कृपापूर्वक बताइए। यदि आप यह कहें कि उसे सुनने का मुझे अधिकार नहीं है तो
उसके सम्बन्ध में मैं बताता हूँ उसे सुनें।''
अहं किल पुराऽनन्तं प्रजार्थी भुवि मुक्तिदम्।
अपूजयं न मोक्षाय मोहितो देवमायया ॥८॥
मुझे पूर्ण अधिकार नहीं है यह मैं स्वयं भी जानता हूँ। लेकिन मैंने भगवद्भजन किया हुआ है, उसे तुम
श्रवण करो। मैंने भी पूर्व में देवाधिदेवों की आराधना की थी लेकिन ममता के कारण वह भजन व्यर्थ गया।
पुत्रलोभ के कारण मैं देवताओं की माया में फँस गया था। देवता ने संतुष्ट होकर मुझसे कहा कि जो माँगोगे वही
तुम्हें दूँगा। उस समय माया ने मुझे धोखे में डाल दिया। इसलिए मैंने माँगा, 'मुझे पुत्र हो।' वही यह मेरा पुत्र
श्रीकृष्ण है। लेकिन वह मुझे ब्रह्मज्ञान नहीं बताता। वह मेरे चरणों पर मस्तक रखता है और कहता है, मैं तुम्हारा
बालक हूँ। इस कारण से हमें श्रीकृष्ण से ज्ञानप्राप्ति नहीं होती। हृषीकेशी श्रीकृष्ण सचमुच परमात्मा है यह मैं
जानता हूँ। मैंने उसे जन्म दिया इसीलिए मुझे श्रद्धा है और इसीलिए तुम भी संतुष्ट हुए हो। तो अब उसी प्रकार
अपनी कृपा से मेरा उद्धार करो। जिस माया के भुलावे में हम फँसे हुए हैं, वह समूल किस प्रकार नष्ट होगी,
इसका प्रत्यक्ष ज्ञान हमें दीजिये। इससे अधिक कुछ कहने से क्या लाभ है ?
यथा विचित्रव्यसनाद्भवद्विश्वतोभयात्।
मुच्येमह्यञ्जसैवाद्धा तथा नः शाधि सुव्रत ॥ ९ ॥
मायारूपी जल से यह संसार-सागर बिलकुल लबालब भरा हुआ है। उसे पार करना अत्यन्त कठिन हो
गया है। तो हे मुनिवर! उसे पार करने के लिए आप नौका बनें। इस सागर का जल बिलकुल खारा है और
प्रचण्ड जलचरों की भरमार हो गयी है। वे इतने उन्मत्त हो गये हैं कि उन्होंने अपने सामर्थ्य से सारे चराचर
को निगल लिया है। अविवेक रूपी तट पर मोह की दुर्धर लहरें चल रही हैं और धैर्य के तट को उध्वस्त कर
रही हैं। अहंकार का तूफान 'रों रों रों रों' की आवाज करता रहता है जिससे सम्पूर्ण सागर क्षुब्ध हो उठता है
और बड़े कर्कश स्वर में 'मैं और मेरा' यह गर्जना करता रहता है। उसी प्रकार अनेक प्रकार की वासनाओं के
भँवर देखो कैसे घूम रहे हैं। इसलिए देवताओं को भी इस सागर को पार करने का साहस नहीं होता। ईर्ष्या
की खाड़ियों में क्रोध का ज्वार भरता रहता है और ईर्ष्या तिरस्कार के काँटे राह में बिखेर देती है। कामरूप
पर्वतों के असंख्य ऊँचे-नीचे शिखर दिखायी देते हैं और उन पर वासनाओं के बड़े-बड़े वृक्ष विषयांकुर से
बढ़ते रहते हैं। इस समुद्र में संकल्प-विकल्प रूपी मछलियाँ तथा निंदारूपी भयानक मगरमच्छ हैं और
ब्रह्मद्वेष रूपी मगर मत्त होकर समुद्र में विचरण करते रहते हैं। संसारसागर इतना प्रचण्ड है, फिर भी उसको
सोखने वाले तुम अगस्ति हो। इसलिए तुम्हारी सहायता से इस समुद्र को पार करने का हमें पूर्ण विश्वास है।
इसकी लहरों का भय सारे ब्रह्माण्ड को है लकिन तुम्हारी कृपा से वे हमें बाधक नहीं होंगी। तो हे नारददेव !
हे दयानिधान ! आप इस जन्म-मरण रूपी संसार सागर से मेरा उद्धार करें। यह संसार समुद्र केवल पैर से
चलकर उस पार जा सकूँ ऐसा भागवत धर्म का विचारं मुझे बताइये। वसुदेव का यह भाषण सुनकर नारद के
मन को परम संतोष हुआ। उसकी उसी आनन्दमय स्थिति का वर्णन शुक्राचार्य अपने मुँह से राजा परीक्षित को
सुनाते हैं।

द्वितीय अध्याय २५
श्रीशुक उवाच
राजन्नेवं कृतप्रश्नो वसुदेवेन धीमता।
प्रीतस्तमाह देवर्षिर्हरेः संस्मारितो गुणैः ॥ १० ॥
वसुदेव के इस प्रश्न का उत्तर देते समय शुक्राचार्यजी आनन्दमग्न हो गये। चैतन्यरूपी मेघरूपी नारद मुमुक्षु
लोगों पर चित्सुख की वर्षा करने लगे। श्रीशुक्राचार्य ने कहा, “हे राजा यह अपनी रुचि का प्रश्न सुनकर मन से
मन मिल जाने के कारण नारद ने कहा, “हे वसुदेव! तुम्हारी वाणी धन्य है। तुम्हारा यह प्रश्न सुनकर चिदानंद
स्वरूप से नारायण प्रकट हुए हैं।” यह कहते समय नारद आत्मानंद से अभिभूत हो उठा। उसके शरीर पर रोमांच
हो आये, शरीर पसीने-पसीने हो गया, आँखों से आनंदाश्रु बहने लगे और वे स्वानंद के रंग में डोलने लगे। भक्त
श्रोता मिलने पर जिस वक्ता को पूर्ण आनन्द नहीं प्राप्त होता, उसे कथासारामृत का स्वाद ही मालूम नहीं है, वह
बिल्कुल शुष्क है। वसुदेव का प्रश्न सुनकर नारद को अत्यन्त आनन्द हुआ और फिर उस आनन्दयुक्त वाणी से
गर्जना करते हुए वसुदेव से क्या कहा, सुनो।
नारद उवाच
सम्यगेतद् व्यवसितं भवता सात्वतर्षभ।
यत् पृच्छसे भागवतान्धर्मांस्त्वं विश्वभावनानू ॥ ११ ॥
नारद ने कहा, हे यादवश्रेष्ठ! हे परमार्थनिष्ठ वसुदेव ! तुम्हारी उत्कंठा सचमुच ही धन्य है। भागवतधर्म पर
तुम्हारी बहुत अधिक भक्ति है इसमें सन्देह नहीं है। हे श्रीकृष्ण जनक ! जिस धर्म के प्रश्नोत्तर से इस सारे विश्व
का उद्धार होगा, उसी धर्म के बारे में तुमने पूछा यह बहुत अच्छा हुआ। तुम्हारे प्रश्नोत्तर से साधकों का उद्धार
होगा इसमें आश्चर्य कैसा ? इसके योग से महापापी भी पावन हो जाएंगे।
श्रुतोऽनुपठितो ध्यात आदृतो वाऽनुमोदितः।
सद्यः पुनाति सद्धर्मो देवविश्वद्रुहोऽपि हि॥ १२ ॥
भागवत धर्म का गुण ही ऐसा है कि उसके श्रवण से ही कितनों का उद्धार होता है, कुछ उसके पठन से
तर जाते हैं। कुछ उसके चिन्तन से, संसार पाश से मुक्त हो जाते हैं। कुछ श्रोता को और वक्ता को देखकर मन में
आनन्द का अनुभव करते हैं, सद्भाव से उनकी प्रशंसा करते हैं वे इस भागवत धर्म से तर जाते हैं। इसमें भी
कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि जो देवताओं का द्रोही है या दुरात्मा है अथवा सारे विश्व का द्रोह करने
वाला दुष्ट चाण्डाल होता है, वह भी इस भागवत धर्म से तर जाता है, ऐसी इसकी महिमा है। यदि भागवत धर्म
हृदय में धारण किया जाय तो वह अकर्मी के कर्मों का विनाश करता है और अधर्मी के अधर्मों को रसातल तक
ले जाकर उन्हें उत्तम से उत्तम पद पर आरूढ़ कराता है। भागवतधर्म जहाँ पहुँचता है वहाँ वह कर्माकर्म का
विलय कर निंदा, द्वेष, क्रोध, अविद्या आदि का नाम भी शेष नहीं रहने देता। अब उस भागवत धर्म के सम्बन्ध
में ही तुमने अत्यन्त आदर से और भक्ति से गूढ़ प्रश्न किया है। इसलिए हे वसुदेव, तुम अत्यन्त पवित्र और
अत्यन्त उदार भाग्य के हो। तुम्हारी पवित्रता का कितना वर्णन किया जाय ? जिसके सुनाम से हम पावन और
जगतवंध्य हुए, वह श्रीकृष्ण तुम्हारा पुत्र है। वह श्रीकृष्ण तुम्हारे घर में नित्य रहता है। इसलिए तुम्हारे जैसा
भाग्यवान तो मुझे इस संसार में कोई और नहीं दिखाई देता। हे वसुदेव! तुम्हारे ही नाम से इस अनन्त को
'वासुदेव' कहते हैं। उस वासुदेव का नामस्मरण करने से प्राणी अति पावन हो जाता है।

२६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
त्वया परमकल्याणपुण्यश्रवणकीर्तनः ।
स्मारितो भगवानद्य देवो नारायणो मम ॥ १३ ॥
जिसके गुणानुवाद से पुण्य की वृद्धि होती है और जिसके नामस्मरण से संसार का बन्धन कटता है उस
नारायण का आज तुमने स्मरण कराया, इसलिए तुम्हारी इस वाणी का कल्याण हो। आज तुम्हारा यह प्रश्न
सुनकर हृदय में मानों नारायण ही पूर्णरूप से प्रकट हो गया है। तुमने मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है।
इसलिए हे वसुदेव, तुम्हारा पूर्ण कल्याण हो। नारद का यह भाषण सुनकर शायद किसी के मन में यह विचार
आये कि नारद को पहले नारायण का विस्मरण हुआ था और अब वसुदेव के प्रश्न से उसे स्मरण हुआ है।
लेकिन जो इस प्रकार विकल्प का तर्क करेंगे उसे आत्मघाती समझना चाहिए। उस विषय की उत्पत्ति के सम्बन्ध
में शुकदेव बता रहे हैं उसे सुनिए। अग्निकुण्ड में अग्नि स्वयंभू रहती है, उसमें घी डालने से वह और अधिक
भड़क उठती है। उसी प्रकार प्रेमपूर्ण प्रश्न होने पर मुक्तजन के सुख का और भी अधिक विकास होता है। श्रोता
जब भक्तिभाव में तल्लीन हो जाता है उस समय मुक्त भी अधिक उल्लास से कथा सुनाता है। उस सुख का
आस्वाद वही ले सकता है जो जानकार है। इसलिए मुक्त, मुमुक्षु और विषयीजन भी भागवत धर्म से पूर्ण शान्ति
प्राप्त करते हैं। वही प्रश्न वसुदेव ने किया इसलिए नारद को भी परमानंद हुआ और पूर्वपरम्परागत, प्राचीन
भागवत धर्म को सप्रमाण बताने के लिए नारदमुनि ने पूर्व इतिहास बताना शुरु किया।
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
आर्षभाणां च संवादं विदेहस्य महात्मनः ॥ १४ ॥
उपर्युक्त आशय का ही प्रश्न जनकराजा का था, और उसका उत्तर नौ आर्षभों ने दिया था। नारद ने कहा,
उस भागवत धर्म का सम्पूर्ण प्राचीन इतिहास मैं तुम्हें सुनाता हूँ, सुनो। किन्तु तुम पूछोगे कि प्रथम आर्षभ कौन
था, इसलिए उनके वंश के बारे में तुम्हें बताता हूँ। उनका जन्म उत्तम कुल में हुआ था और वे सभी अचेत
ब्रह्मनिष्ठ थे।
प्रियव्रतो नाम सुतो मनोः स्वायम्भुवस्य यः।
तस्याग्नीध्रस्ततो नाभिर्ऋषभस्तत्सुतः स्मृतः ॥ १५ ॥
स्वयंभू मनु का पुत्र था। उसका नाम था 'प्रियव्रत'। उसका पुत्र 'आग्नीध्र' नाम से ख्यातिप्राप्त था।
सूर्यवंशीय उसके पुत्र का नाम 'नाभी' था। उस नाभी को ज्ञान का वैभव 'ऋषभ' नामक पुत्र हुआ। यह वासुदेव
का अंशांशावतार था और उसने संसार में मोक्षधर्म का प्रकाश किया।
तमाहुर्वासुदेवांशं मोक्षधर्मविवक्षया।
अवतीर्णं सुतशतं तस्यासीद्वेदपारगम् ॥ १६ ॥
ऋषभ वासुदेव का अंश था। संसार में मोक्षधर्म पर लोगों की श्रद्धा बढ़े इसीलिए भगवान का यह 'अंशांश'
अवतार हुआ था। पंचमस्कन्ध में उसका चरित्र सविस्तार बताया गया है। उसे वेदशास्त्र सम्पन्न सौ पुत्र थे। उनमें
भी जो सबसे बड़ा पुत्र था वह अत्यन्त पवित्र था। उसका लोकविलक्षण चरित्र बताता हूँ, सुनो।
तेषां वै भरतो ज्येष्ठो नारायणपरायणः।
विख्यातं वर्षमेतद्यन्नाम्ना भारतमद्भुतम् ॥ १७ ॥

द्वितीय अध्याय २७
इस बड़े पुत्र का नाम था 'भरत' और वह नारायण का परम भक्त था। अभी भी 'भरतखण्ड' को
'भारतवर्ष' इस नाम से जाना जाता है वह भी इसी के नाम से प्रसिद्ध है। वह मन से, वाचा से और कर्म से
नारायण को ही भजता था, राजकर्ता होने पर भी आत्मज्ञानी था। जिस प्रकार राह चलते समय गलत-सही पग
पड़ने पर और पैर में चोट लगने पर भी उसे भूमि का ही आधार रहता है, उसी प्रकार 'भरत' राज्य का प्रशासन
करते समय यथोचित कर्मों का पालन करते हुए भी वह कभी आत्मनिष्ठा से च्युत नहीं हुआ। इसी स्थिति को
'अखण्ड स्थिति' कहते हैं जो कल्पांत में भी नहीं बदलती और जिसमें मनुष्य अत्यन्त सुखी होता है। उसे
पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता। इस प्रकार भरत सदाचरण करते हुए नारायण परायण था। यह बात मैं तुम्हें विस्तार से
बताता हूँ, सुनो। नरों के बड़े समुदाय को 'नार' कहते हैं। उस 'नारा' अथवा प्राणिसमुदाय की आत्मा 'अयन'
अर्थात् अधिष्ठान होने के कारण उसे 'नारायण' कहते हैं। उसके प्रति भरत परायण अर्थात् अनन्य भाव से शरण
हुआ और अपना अहंभाव भूलकर तद्रूप हो कर रहा। ऐसा वह ऋषभ का पुत्र, जिसका नाम 'भरत' था, जिसकी
पवित्र कीर्ति सारे संसार में फैली हुई है। वह भरत इस भूमि में हुआ इसलिए इस देश को 'भारतवर्ष' कहते हैं।
समस्त वैदिक कर्मों का संकल्प प्रारम्भ करते समय उसके नाम का उच्चार करना पड़ता है। लेकिन इस प्रकार
बिल्कुल आत्मस्वरूप होने पर भी उसे विषयसंग योग्य नहीं है, यह जानने के लिए मैं उसका चरित्र सबको सुना
रहा हूँ, उसे कृपया सुनें। केवल नाम से ही वह इतना प्रसिद्ध हुआ, इसीलिए उसे 'भरतखण्ड' इस नाम से
पुकारते हैं। लेकिन इससे भी अधिक उसका प्रताप प्रचण्ड अर्थात् विचित्र है, उसे सुनें।
स भुक्तभोगां त्यक्त्वेमां निर्गतस्तपसा हरिम्।
उदासीनस्तत्पदवीं लेभे वै जन्मभिस्त्रिभिः ॥ १८ ॥
उसने समस्त दिशाओं में विजय प्राप्त कर समुद्रवलयांकित पृथ्वी पर शासन किया। बड़े-बड़े देवता भी
जिन भोगविलासों को नहीं भोग सके थे, ऐसे विविध सुखों का उसने उपभोग किया। उसे स्त्रियाँ तथा पुत्र
अनुकूल थे और पवित्र मंत्री भी अनुकूल थे। उसी प्रकार समस्त राष्ट्र अनुकूल होते हुए भी उसने उन विविध
प्रकार के दिव्य भोगों का त्याग किया। इस प्रकार के सभी भोगों का उपभोग करने के बाद, वह अपना
समुद्रवलयांकित राजपाट छोड़ कर स्वहित को ध्यान में रखते हुए हरिभजन के लिए निकल पड़ा। जो राज-वैभव
का उपभोग करते हैं उन्हें विरक्ति तो कभी होती नहीं है, किन्तु भरत ने बड़े आश्चर्यजनक बात यह की कि वह
सभी भोगों का त्याग कर लक्ष्मीपति की सेवा करने लगा। सच तो यह है कि उसे उसी जन्म में मोक्ष प्राप्त हो
जाता किन्तु उसे दूसरा जन्म लेना पड़ा। उसका भी कारणं बताता हूँ। एक हिरनी जिसका प्रसूतिकाल निकट आ
गया था, नदी में खड़ी पानी पी रही थी। इतने में उसे व्याघ्र की गर्जना सुनाई पड़ी। वह एकाएक भय से उछल
पड़ी। लेकिन उछलते समय उसके पेट का गर्भ पानी में गिर पड़ा। उस समय भरत वहाँ स्नान कर रहा था।
उसने उसे देखा और स्वभावतः मन से कोमल होने के कारण उसने उसे तुरन्त बाहर निकाला। वह हिरनी वापस
नहीं लौटी। माताहीन शिशु दीन दिखायी देने लगा। इसलिए भूतदया से प्रेरित होकर भरत उस शिशु का पालन
करने लगा। धीरे-धीरे उस मृग के प्रति उसकी ममता बहुत बढ़ गयी। इतनी अधिक कि स्नान, संध्या, अनुष्ठान
आदि करते समय भी उसे हिरनी के उस बच्चे का स्मरण होने लगा। जप अथवा ध्यान प्रारम्भ करते ही भरत की
आँखों के सामने उस हिरनी के बच्चे के सिवाए और कुछ भी नहीं दिखायी देता था। बैठने पर, खाना खाते
समय, सोते समय, हर पल उसे उस मृग का ही ध्यान हो आता था। हिरनी का वह बच्चा आँखों से ओझल होते