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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 869 में से

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पृष्ठ 31

प्रथम अध्याय १५
करते थे वे सारे बड़े-बड़े ऋषि पिंडारक जाने के लिए निकल पड़े। गायत्री मंत्र से प्रति सृष्टि निर्माण करने में
समर्थ महा हठी विश्वामित्र भी शीघ्र ही चल पड़े। जहाँ शीत और ऊष्मा की बाधा नहीं होती ऐसे आश्रम में रहने
वाला और जिसके नाम से द्वंद्व भागने लगते हैं, ऐसा असित मुनि भी तत्काल निकल पड़ा। जिसने सूर्य की शरण
में जाकर उसके घोड़े के कान में बैठकर सम्पूर्ण वेदपाठ किया, वह कण्व ऋषि भी निकल पड़ा। जो अत्याहारी
होते हुए भी निराहारी के नाम से प्रसिद्ध थे वे दुर्वासा ऋषि भी तेजी से द्वारका के बाहर चल पड़े। जिस भृगु ने
मारी हुई लात को श्रीकृष्ण हृदय पर धारण कर वह 'श्रीवत्स' भूषण कह कर विचरण करता है, वह भृगु ऋषि
भी चल पड़ा। अंगिरांऋषि तो स्वयं सृष्टि में बुद्धिमान, जिसका पुत्र देवगुरु बृहस्पति था वह भी जाने के लिए
निकला। कश्यप की बात तो विचित्र ही थी। उसने सुर, नर, किन्नर आदि को जन्म दिया और जिस लिए इस
सृष्टि को 'काश्यपसृष्टि' भी कहते हैं, वह भी जाने के लिए निकल पड़ा। सभी युक्तों में जो योग्यता में श्रेष्ठ है,
जिनका वर्णन वेदों में भी है वे वामदेवऋषि भी जाने के लिए निकल पड़े। अत्रि का भी चमत्कार ही है। उन्होंने
तीन देवताओं को जन्म दिया। उस श्रीदत्त महाराज को बड़े-बड़े योगी भी वन्दन करते हैं। अनुसूया का यह कैसा
अहोभाग्य है। वे अत्रि मुनि सभी ऋषियों में श्रेष्ठ होते हुए भी श्रीकृष्ण की आज्ञा मानने के लिए सदैव तत्पर
रहते थे। इसलिए उन्होंने पिंडारक जाने में बड़ी जल्दी की। जो श्रीराम के सद्गुरु, ब्रह्मज्ञान के कारण नितांत
उदार, जिसकी कफ़नी की ऐसी महिमा थी कि उसने तेजस्विता में सूर्य को भी पीछे छोड़ दिया। ऐसा वह
वसिष्ठ ऋषि भी कृष्ण की सूचना स्वीकार कर तुरन्त द्वारका छोड़ कर पिंडारक जाने के लिए निकल पड़े। उसी
प्रकार देवर्षि नारद जिसका ज्ञान भी अगाध था जो सदैव परमानन्द में लीन रहते थे और जिनकी उत्सुकता
हरिकीर्तन में ही रहती थी वे भी कन्धे पर वीणा रखकर ब्रह्मपद गाते-गाते ब्रह्मानन्द से नाचते-गाते पिंडारक की
ओर चल पड़े। ऐसे सारे मुनिश्रेष्ठ और बड़े-बड़े ऋषि सपरिवार शिष्य समुदाय के साथ पिंडारक में एकत्र हुए।
इस प्रकार पिंडारक में शाप देने और अनुग्रह करने में भी समर्थ सभी ऋषि एकत्र हुए और कृष्ण के वैभव का
वर्णन करने लगे। कपटी-नाटकी श्रीकृष्ण ने इधर तुरन्त कुलक्षय करने की इच्छा से अपने ही लड़कों का कपट-
मेला आयोजित कराकर बड़े-बड़े ऋषियों की हँसी उड़वायी। निंदा, अपमान तथा दिल्लगी करने से ब्राह्मणों का
छल होता है और यदि ब्राह्मणों का पूरी तरह द्वेष हुआ तो फिर कुलक्षय हो गया ऐसा निश्चय ही समझिये !
ब्राह्मणों के गुस्से के सामने कुल की क्या बिसात है। महादेव का लिंग गल गया और इन्द्र की सारी सम्पत्ति समुद्र
में डूब गयी। सारा समुद्र भी खारा कर डाला।'ऐसा भयानक कोप था ब्राह्मणों का। ऐसा चरित्र जिन ऋषियों का
था 'वे सब वहाँ एकत्र थे। पृथ्वी पर ब्राह्मण ही ब्रह्म का रूप है और उसका वचन परमप्रमाण है यह सच कर
दिखाने के लिए ही श्रीकृष्ण ने कुल का संहार कर दिखलाया।
क्रीडन्तस्तनुपव्रज्य कुमारा यदुनन्दनाः।
उपसंगृह्य पप्रच्छुरविनीता विनीतवत्॥ १३॥
सभी यादवपुत्र गेंद खेलने लगे। वे गेंद को ऊपर ही ऊपर लोक लेते थे और एक-दूसरे को मारते हुए
शरीर को बचाते हुए भागते जाते थे। इस प्रकार विविध प्रकार से मजे लेते हुए वे यादवों के लड़के पिंडारक
पहुँचे। उनमें अपनी अमीरी का जबरदस्त अहंकार भरा हुआ था। वे सभी मदोन्मत्त होकर बड़े उद्धत हो गये थे।
उन्होंने अपने मन में विचार किया कि यहाँ भूत भविष्य जानने वाले अनेक महर्षि एकत्र हुए हैं। सुना है कि
उनकी बातें बिल्कुल सच सिद्ध होती हैं। लेकिन हम लोग उन्हें अवश्य चकमा दे सकेंगे। क्योंकि जो कभी भी