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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 869 में से

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पृष्ठ 30

'लीलाविग्रही' अर्थात स्वेच्छा से देहधारण करने वाला (अन्य जीवों की तरह कर्म से कर्मपरावलंबी-देह
धारण करने वालों की तरह नहीं) तथा शुद्ध चैतन्य सागर पर एक लहर के समान उसका देह था। उसके सारे
कर्म पवित्र करने वाले थे। उनका श्रवण और कथन करने से ही सबका उद्धार होता है। कृष्ण के कर्मों का जो
स्मरण करता है, उसका वही कर्म जीव को कर्मबन्धन से मुक्त करता है। दोनों का उद्धार करने के लिए ही
श्रीकृष्ण ने ऐसा उत्कृष्ट कर्माचरण किया था। यदि यह कहें कि श्रीकृष्ण सकाम होंगे इसीलिए उन्होंने
कर्माचरण किया तो फिर जिसका नाम दूसरे को निष्काम कर सकता है वह स्वयं सकाम कैसे हो सकता है?
श्रीकृष्ण की विषय भोग लीलाओं का स्मरण करने से संन्यासी भी अपने आप निष्काम हो जाते हैं। विषयी
लोगों की भी विषयेच्छा नष्ट हो सके ऐसा ही उदार कर्माचरण उसने किया सभी दृष्टियों से पूर्णकाम होते हुए
उसने असाधारण कार्य किये। केवल स्मरण मात्र से लोग भवसागर पार कर सकें इसलिए उसने अपनी कीर्ति
का विस्तार किया और वह कर्म भी कितना मंगलदायक था। किंचित श्रवण मात्र से ही कर्म का फल तत्काल
नष्ट हो जाता है। श्रवण से मन में सद्भाव उत्पन्न होता है, सद्भाव से देवत्व प्रकट होता है और उससे
अहंकार नष्ट होता है। श्रीकृष्ण की कीर्ति का स्मरण, श्रवण अथवा पठन करने से अनेक लोगों का उद्धार हुआ
है और आगे भी होगा। पूर्वजन्म में पुण्य कमाया है तभी हरिकथा में मन लगता है, अन्यथा अनेक लोगों को
अनायास ही गहरी निद्रा आ जाती है। जो हरिकथा में तत्पर रहते हैं उनके पुण्य की कोई सीमा नहीं है। कीर्तन
से दीनों का उद्धार हो इसलिए श्रीकृष्ण ने इस सरल उपाय की योजना की है। हरिकीर्तन की कथाओं को जोर
से कहने से प्रायश्चित लज्जा से नत हो जाते हैं और तीर्थों का बड़प्पन भी कम हो जाता है। नाममात्र से ही
मुक्ति प्राप्त होती है। इस प्रकार अपनी कीर्ति से उदार, पूर्णब्रह्म शार्ङ्गधर, लीलाविग्रही सर्वेश्वर ने यदुवंश में
पूर्णावतार धारण किया था। उसे नहीं लगता था कि पृथ्वी का भार कम हुआ है क्योंकि जो अत्यन्त प्रबल
यादव बचे हुए हैं उनका भी निर्दलन हो जाना चाहिए ऐसा उनका विचार था। श्रीकृष्ण ने कहा, अब इस
अवतार में मेरे लिए इतना ही कार्य बच रहा है—अपने वंश को समाप्त करना। उसे पूरा कर फिर निजधाम को
चलूँ। यादवों के कालस्वरूप देवाधिदेव ने भविष्य को ध्यान में रखते हुए जो चमत्कार किया उसे सुनिए।
नारदादि मुनियों को स्वयं श्रीकृष्ण ने बुलाकर आग्रहपूर्वक बताया कि अब आप लोग यहाँ से चले जाएँ क्योंकि
संतजन जिस स्थान को छोड़ कर चले जाते हैं वहाँ अनर्थ की लीला शुरु हो जाती है। इसलिए यादवों के
विनाश के लिए पहले यही आवश्यक है यह जानकर उन्होंने यह युक्ति रची। भक्त, संत और साधु जिसके
निकट हों वहाँ अनर्थ की भीड़ नहीं रहती। यह रहस्य केवल श्रीकृष्ण को ही मालूम था। जहाँ संतों का
समुदाय रहता है वहाँ जन्म और मृत्यु का भी अभाव रहता है। यह बात केवल श्रीकृष्ण को ही मालूम होने के
कारण उसने ब्रह्मपाश के लिये इसी उपाय की योजना की। जिस स्थान को छोड़ कर संत दूर चले जाते हैं वहाँ
अनर्थ तत्काल मस्तक पर प्रहार करता है। इसे ध्यान में रखकर ही श्रीकृष्ण ने समस्त ऋषियों को द्वारका के
बाहर भेज दिया। ऋषिगण अपने-अपने आश्रम की ओर जाने वाले थे किन्तु इस नाटकीय श्रीकृष्ण ने तीर्थ का
बहाना बनाकर उन्हें 'पिंडारका' भेज दिया। जिनका स्मरण करते ही कलिकाल भी भय से काँपने लगता है,
ऐसे किन-किन ऋषियों को श्रीकृष्ण ने पिंडारका भेजा, जरा सुनो।
विश्वामित्रोऽसितः कण्वो दुर्वासा भृगुरंगिराः।
कश्यपो वामदेवोऽत्रिर्वशिष्ठो नारदादयः ॥ १२ ॥
जो तपस्या के तेज से देदीप्यमान, जो पूर्ण ज्ञान में योग से चैतन्यधन हैं जिनका श्रीकृष्ण निरन्तर वन्दन