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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 869 में से

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पृष्ठ 29

प्रथम अध्याय १३
कृपया संक्षेप में बतायें। यादव तो सभी भाई बंद हैं, एक दूसरे के चहेते और उनका पालनकर्ता स्वयं श्रीकृष्ण !
ऐसा उनमें ऐक्य भाव और समस्त एक परिवार होते हुए उनमें की परस्पर एकता टूट कर मारपीट तक की
नौबत कैसे आ पहुँची ? 'आत्मा वै पुत्रनामासि' (आत्मा ही पुत्र है) यह श्रुति सबके लिए प्रमाण है। ऐसा होते
हुए भी श्रीकृष्ण के ही लड़के शाप से कैसे बाधित हुए ? वह शाप सच कैसे हुआ ? 'कुल का विनाश करने
का संकल्प कृष्ण का ही था, वही ब्राह्मणों के शाप के लिए कारणीभूत हुआ और इसीलिए वह सभी यादवों
के लिए बाधक हुआ इसे ध्यान में रखो। कृष्ण संकल्पमात्र से ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार करता
है। उसने ही यादवकुल का संहार करने का निश्चय किया' यह कहकर, शुक उसके अवतार की महत्ता का
वर्णन करते हैं।
श्रीशुक उवाच
बिभ्रद्वपुः सकलसुन्दरसन्निवेशं कर्माचरन्भुवि सुमङ्गलमाप्तकामः।
आस्थाय धाम रममाण उदारकीर्तिः संहर्तुमैच्छत् कुलं स्थितकृत्यशेषः ॥ १०॥
कर्माणि पुण्यनिवहानि सुमङ्गलानि, गायज्जगत्कलिमलापहराणि कृत्वा।
कालात्मना निवसता यदुदेवगेहे पिण्डारकं समगमन्मुनयो निसृष्टाः ॥ ११ ॥
परीक्षित राजा से शुक्राचार्य ने कहा, "कर्ता तथा कराने वाला वह एक श्रीकृष्ण है। उसने ही अपने
लड़कों को शाप मिले इसलिए उनके मन में अविचार उत्पन्न किया। श्रीकृष्ण के मन में निजधाम जाने की
उत्कंठा लगी हुई थी इसलिए शेष बचा हुआ कार्य भी पूरा करने की उसे जल्दी हो रही थी। अब मेरा कुलक्षय
कब होता है यही चिन्ता भगवान के मन में लगी हुई थी। भगवान का यही उद्देश्य शाप के लिए कारणीभूत
हुआ ऐसा समझ लो। जिस कृष्ण ने कुलक्षय का विचार मन में लाया था, उस कृष्ण की सुन्दर मूर्ति का वर्णन
उल्लसित मन से शुक परीक्षित से करने लगे। समस्त सौन्दर्य का अधिष्ठान, ऐसा मनोहर सुशोभित वेष उसने
धारण किया था। उस जगदीश ने अपने शरीर में मानों सभी प्रकार के लावण्य का संग्रह किया था। कैसा
चमत्कार कहा जाए। उसके सौन्दर्य पर ऐसा तेज चढ़ गया था कि उसके प्रत्येक अंग पर लोगों की दृष्टि जम
सी गयी थी। कृष्ण का स्वरूप इतना आकर्षक था कि लोगों की दृष्टि भय से काँप रही थी। जिस प्रकार गुड़
पर मक्खियाँ आकर बैठती हैं उसी प्रकार कृष्ण के स्वरूप पर लोगों की दृष्टि जम सी गयी थी और उसने
उनके शरीर को चारों ओर से बाँध दिया था। आँखें दर्शन लोभ के कारण ललचायी हुई थीं। आँखों में मानों
जिह्वा निकल आयी थीं। इस प्रकार श्रीकृष्ण मूर्ति की शोभा मानों स्वानंद का साकार भण्डार ही था। उस
श्रीकृष्ण को जिस दृष्टि ने देखा वह मानों लौटने के लिए तैयार ही नहीं थी। वे उसका अधिक से अधिक
आलिंगन कर रही थीं। इसलिए सारी सृष्टि उन्हें कृष्णरूप ही दिखायी देती थी। आँखों को उसकी ऐसी चाह
थी कि कामिनियाँ उस पर टूट पड़ती थीं और इसीलिए गोपियों के मन में उस गोविन्द के लिए मीठी चाह
उत्पन्न हो गयी थी। कृष्ण इस प्रकार अत्यन्त सुन्दर था इसलिए उसमें विषय की अभिलाषा हो ऐसी बात नहीं
है क्योंकि वह पूर्णकाम अर्थात निरिच्छ और केवल आत्मस्वरूप में ही रमण करते थे। कृष्ण यदि पूर्णकाम थे
तो वे द्वारका में घर बसाकर स्त्रीपुत्रों के साथ राजसी ठाठ से रहकर विषयों का उपभोग क्यों करते थे ? तो
इसका कारण यह है कि श्रीकृष्ण चारों आश्रमों के प्रकाशक हैं तथा त्रैलोक्य में सच्चे गृहस्थ एक अकेले
श्रीकृष्ण ही हैं, सच्ची निष्ठा से वही ब्रह्मचारी हैं। कृष्णदेह में 'दैव' अर्थात 'भाग्य' की प्रधानता नहीं थी। वह