सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 32

१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
घटना सम्भव नहीं है, वह इनके वचनों से भी कैसे घटेगा ? यह कहकर यादव वंश के लड़कों ने बड़े-बड़े
ऋषियों के सामने एक कपट प्रस्तुत किया।
ते वेषयित्वा स्त्रीवेषैः साम्बं जाम्बवतीसुतम्।
एषा पृच्छति वो विप्रा अंतर्वत्न्यसितेक्षणा ॥ १४ ॥
पहले से ही लक्ष्मी के मद में लीन, तिस पर कपट की योजना बनायी। उन्होंने जांबवती के पुत्र 'सांब'
को स्त्री के वेष में सजाया। वह साँवला और सुन्दर था। उसकी आँखें पानीदार थी। उस पर वह स्त्रीवेष
बहुत ही फबने लगा और वह अभिनय पटु होने के कारण स्त्रियोचित लज्जा, नेत्रकटाक्षादि हावभाव आदि का
उत्तम ढंग से प्रदर्शन कर सका। उसने आँखों में काजल लगाया था। वह इस प्रकार नेत्रकटाक्ष करने लगा
जिससे उस पर नजर टिक नहीं पाती थी। वह स्वाभाविक रूप से ही सुन्दर और नाजुक था। तिस पर वह
हंस की गति से धीरे-धीरे चलने लगा। कुछ शैतान बच्चों ने उसके पेट पर कपड़े के टुकड़े बाँध कर पेट को
बड़ा कर दिया था, जिससे वह कोई गर्भवती स्त्री मालूम होती थी। सखियों के कन्धे पर हाथ रख कर वह
धीमे कदमों से इस प्रकार चल रही थी ताकि पेट न हिलने पाये। इस प्रकार पग-पग पर सुस्ताते हुए चलने
वाली उस युवती को ऋषियों ने देखा। स्त्रियोचित मर्यादा का पालन करते हुए वह ऋषियों से थोड़े से अन्तर
पर खड़ी हो गयी। उसके साथ के लड़के ऋषियों के पास पहुँच आए उन्होंने उन्हें साष्टांग दण्डवत किया।
छल करने के उद्देश्य से आये उन यदुकुमारों ने उन ऋषियों की प्रदक्षिणा की, अत्यन्त आदर के साथ उनका
चरणस्पर्श किया और बोले, हम आपके दर्शन के लिए आये हैं। इस प्रकार वे सभी राजकुमार भीतर से अनम्र
होते हुए भी ऊपर से विनम्र होने का दंभ भरते हुए हाथ जोड़कर खड़े हो गये और अत्यन्त लीनता से उन
ऋषियों से इस प्रकार निवेदन किया, "महाराज ! उस तरफ वह जो स्त्री खड़ी है, उसे आपके वचनों पर
अत्यधिक विश्वास है। वह गर्भवती है और उसका समय पूरा हो चला है। उस सुन्दरी को आप से स्वयं
पूछने में लज्जा का अनुभव हो रहा है।"
प्रष्टु विलज्जती साक्षात् प्रभूतामोघदर्शनाः ।
प्रसोष्यन्ती पुत्रकामा किं स्वित्सजनयिष्यति ॥ १५ ॥
उसे स्वयं आपके पास आकर पूछने का साहस नहीं होता, इसलिये उसने हमारे माध्यम से आपसे विनती
की है। आप सचमुच ही सत्यदर्शी हैं, आपका वचन कभी भी असत्य नहीं होता। साक्षात हरिहर भी आपकी
वन्दना करते हैं। आप सभी प्रकार का ज्ञान प्रदान करने में उदार हैं। इसलिये यह गर्भवती स्त्री आपसे यह
सविनय पूछ रही है कि वह किसे जन्म देगी ? उसे तो पुत्र की इच्छा है। इस प्रकार वे कपट भक्ति से हाथ जोड़
कर खड़े हो गये। उन्हें कपट ही प्रिय होने के कारण उन्हें फल भी उनकी भावना के अनुरूप ही मिले। उनका
यह झूठा कर्म पहचान कर नारद तो ऋषियों के आगे नाचने लगे। उन्होंने मन ही मन कहा, यादवों की मृत्यु अब
अत्यन्त निकट आ गयी है। चूँटी को जब पर निकलने लगते हैं तो उसकी मृत्यु निश्चित हो जाती है। इस प्रकार
ब्राह्मणों का छल होने पर कुल का विनाश निश्चित ही है। ब्राह्मण भले ही गाली या शाप दे लेकिन उसे
भक्तिपूर्वक प्रणाम करना चाहिए। ब्राह्मण यदि मारने के लिए आये तो उसके सामने मस्तक झुकाना चाहिये। उन
ब्राह्मणों का छल करना विषभक्षण करने की तरह है। विष में तो केवल खाने वाले के प्राण चले जाते हैं किन्तु
ब्राह्मणों का छल करने से सारे कुल का नाश होता है। विद्वान अथवा अविद्वान का मन में विचार लाये बिना,