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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 869 में से

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पृष्ठ 34

१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ब्राह्मणों का शाप कभी व्यर्थ नहीं जाता यह जानने के कारण भय के मारे उनकी सूझबूझ समाप्त हो गयी। प्रत्यक्ष
मूसल देख कर तो उनमें खलबली मच गयी। नागरिकों में तो यही कोलाहल मच गया कि अब यादवों का कुल
बचता है या नहीं ? राजा परीक्षित ! सुनो, भविष्य की गति बड़ी कठिन है क्योंकि वह वृत्तांत उन्होंने श्रीकृष्ण को
नहीं जानने दिया। वे अपने ही मत से विचार करने लगे।
तच्चूर्णयित्वा मुसलं यदुराजः स आहुकः।
समुद्रसलिले प्रास्यल्लोहं चास्यावशेषितम् ॥ २१॥
यादवों के राजा उग्रसेन ने लोहे के हथौड़े से उस मूसल का चूर्ण बनवाकर उसे समुद्र में फिंकवा दिया।
लेकिन उस मूसल का अग्रभाग अत्यन्त दुष्कर था। किसी भी प्रकार से उसका चूर्ण नहीं हो पा रहा था। वह
निखालस वज्र की तरह कठिन था। इसलिए उसे उसी तरह समुद्र में दूर फेंक दिया।
कश्चिन्मत्स्योऽग्रसोल्लोहं चूर्णानि तरलैस्ततः।
उह्यमानानि वेलायां लग्नान्यासन्किलैरकाः ॥ २२॥
मत्स्यो गृहीतो मत्स्यघ्नैर्जालेनान्यैः सहार्णवे।
तस्योदरगतं लोहं स शल्ये लुब्धकोऽकरोत् ॥ २३ ॥
समुद्र की लहरों के ज्वार से लौह का वह सारा चूर्ण प्रभास तीर्थ के तट पर लगकर बड़ी-बड़ी घास के
रूप में प्रस्फुटित हुआ। लोहे का टुकड़ा एक मछली ने निगल लिया। उस मछली को एक मछुआरे ने जाल डाल
कर अन्य मछलियों के साथ पकड़ लिया। फिर जब मछुआरे ने उस मछली को चीरा लगाया तो उसके पेट में से
लोहे का टुकड़ा निकला। उसे देखकर मछुआरे को बड़ी प्रसन्नता हुई क्योंकि वह लोहा जिसे प्राप्त होता है वह
बड़ा भाग्यशाली होता है। कहते हैं कि मछली के पेट से निकले हुए लोहे का निशाना अचूक लगता है और
इसीलिए असाध्य शिकार भी सध जाता है। इसलिए मछुआरे ने उस लोहे का बाण बनाया।
भगवान्ज्ञातसर्वार्थ ईश्वरोऽपि तदन्यथा।
कर्तुं नैच्छद्विप्रशापं कालरूप्यन्वमोदत ॥ २४ ॥
लोहे का चूर्ण बनाने की तथा उसे समुद्र में फेंकने की वार्ता बिना किसी के कहे सर्वज्ञ श्रीकृष्ण को मालूम
हुई। लेकिन ब्राह्मणों के शाप को झुठलाने का विचार भी उसके मन में नहीं आया। कोई कह सकता है कि यह
उसके वश में ही नहीं होगा। ब्राह्मणों का शाप झुठलाना उनसे सम्भव ही नहीं था। तो देखो, जिसने गुरु के
मृतपुत्र को जीवित कर दिया वह श्रीकृष्ण कलिकाल का भी नियंता था। कलिकाल के दाँत तोड़ कर जिसने
देवकी के गर्भ वापस लाये, वह श्रीकृष्ण वास्तव में ईश्वर का भी ईश्वर है। मन में आयी हुई बात को मूर्त रूप
देने का सामर्थ्य मुझ में है यह बात वह जानता था। बिना किसी की नींद भंग किये जिसने पूरी मथुरा को द्वारका
में स्थानान्तरित कर दिया वह श्रीकृष्ण क्या नहीं कर सकता? लेकिन उसने भी अपने कुल की ममता का मोह
नहीं किया। अपने कुल के क्षय का प्रसंग आया। फिर भी उसने ब्राह्मणों का शब्द झूठा सिद्ध नहीं होने दिया।
यद्यपि ब्राह्मण ने लात मारी फिर भी उसने उसे हृदय पर धारण कर लिया। उसे ही श्रीवत्सलांछन कहते हैं। उसे
ही सर्वभूषणों में श्रेष्ठ मानकर वह हृदय पर धारण करता था। इसीलिये वह पूर्ण ब्रह्मण्यदेव है। श्रीकृष्ण ब्राह्मणों
को अपने मस्तक पर रखकर उनका वंदन करता था। वह ब्राह्मणों के वचन को कभी झूठा नहीं होने देता था।