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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 869 में से

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पृष्ठ 25

प्रथम अध्याय ९
श्रीबादरायणिरुवाच
कृत्वा दैत्यवधं कृष्णः सरामो यदुभिर्वृतः।
भुवोऽवतारयद्भारं जविष्ठं जनयन्कलिम्॥ १॥
स्वयं पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण ने लोगों का चित्त रंजन करने वाले बलवान को लेकर तथा वीर यादवों को एकत्र कर
दैत्यों का संहार किया। जिन्हें यादव नहीं मार सकते थे, उनके सम्बन्ध में श्रीकृष्ण ने निराली युक्ति की योजना की।
वह यह कि उन्होंने उनके ही मित्र, निकट सम्बन्धी, रिश्तेदार इनमें परस्पर घोर कलह उत्पन्न कर दिया और पृथ्वी
का भार कम करने के लिए पाण्डवों को भी क्षुब्ध कर कलह के बहाने कौरवों का भार हलका किया।
ये कोपिताः सुबहु पाण्डुसुताः सपत्नैर्दुद्यूतहेलनकचग्रहणादिभिस्तान्।
कृत्वा निमित्तमितरेतरतः समेतान् हत्वा नृपान्निरहरत्क्षितिभारमीशः ॥२॥
अत्यन्त अघोर कृत्य करने वाले दुष्ट, जिनकी सेना पृथ्वी के लिए भारस्वरूप थी, उनका संहार करने के
लिए उन्हें एकत्र किया जाए और भूमि का भार हलका किया जाए इस उद्देश्य से कृष्ण ने कलह का कारण
उपस्थित किया। श्रीकृष्ण के इस संकल्प के अनुसार कपट के पाँसों का निर्माण हुआ। उसी कपट से देखिए
कौरवों का समुदाय अनायास ही मारा गया। संसार में जुआ दुष्ट लोग ही खेलते हैं। तिस पर इस जुए का प्रारम्भ
कपट से हुआ। दुष्टबुद्धि कौरवों ने जानबूझ कर धर्म के सामने कपट के पाँसे फेंके। सीधे-सादे अनाड़ी लोग भी
धर्मपत्नी का छल नहीं करते और द्रौपदी तो सचमुच धर्म की पत्नी थी, उसे ये लोग बाँधकर सभा में ले आये।
इतना ही नहीं बल्कि उसकी वेणी के केश खींचे जिससे किचकिच इतनी बढ़ी। वास्तव में उसका यही कर्म
उसके लिए हानिकारक सिद्ध हुआ। जंगल में कोई किसी को लूटता है तो राजा उसकी खोज करता है लेकिन
अगर भरी सभा में राजा ही लूटने लगे तो समझ लो कि वह मृत्यु को ही निमंत्रण देता है। बिना किसी अन्याय
के यदि राजा ही लूटने लगे तो वहाँ भगवान सहायता के लिए दौड़ कर आता है। द्रौपदी वस्त्रहरण यही कौरवों
का मुख्य अन्याय था। आग लगाना, विष प्रयोग करना तथा स्त्रियों का अपहरण करना, घात लगाकर मारना,
मारने के लिए हाथ में शस्त्र लेना, अवज्ञा और उपहास, दुर्वचन, धर्म का छल इसी को श्रीकृष्ण ने निमित्त
बनाया। पतिव्रता स्त्री को अनावृत्त किया इस कारण मृत्यु तो होनी ही थी। यही कलह का कारण बना और इसी
कर्म से पूरे कुल का विनाश हो गया। ऐसा जो धर्म का विरोधी होता है उसका वध ईश्वर निश्चित रूप से करता
है। सचमुच इसीलिए उसने पाण्डवों के मन में भीषण क्रोध निर्माण किया। पृथ्वी का भार कम करने के उद्देश्य
से सगे-सम्बन्धी, इष्ट मित्र, सखा, भाई, शास्त्रज्ञ और जो अत्यन्त पवित्र थे उनमें भी विचित्र प्रकार का कलह
उत्पन्न किया। पृथ्वी का भार हलका करने के लिए श्रीकृष्ण ने सुहृद, सखा, भाईयों का भी, उनके साथ आयी हुई
राजसेना पर हमला कर समूल गोत्र का वध किया।
भूभारराजपृतना यदुभिर्निरस्य गुप्तैः स्वबाहुभिरचिन्तयदप्रमेयः।
मन्येऽवनेर्ननु गतोऽप्यगतं हि भारं। यद् यादवं कुलमहो ह्यविषह्यमास्ते॥ ३॥
ऐसे दुष्टों का साथ देने वाले और अधर्माचरण करने वाले, भूमि के लिए केवल भारभूत ऐसे अनेक राजा
और उनकी सेना का संहार किया। कलह का तो मात्र बहाना था। पृथ्वी पर अधर्म करने वाले राजा और उनकी
इतनी अधिक सेना को खोज-खोज कर मारा कि उसका कोई हिसाब नहीं। फिर भी श्रीकृष्ण को लगा कि पृथ्वी