श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 27, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम अध्याय ११
स्वमूर्त्या लोकलावण्यनिर्मुुक्त्या लोचनं नृणाम्।
गीर्भिस्ताः स्मरतां चित्तं पदैस्तानीक्षतां क्रियाः ॥ ६ ॥
समस्त मंगलों से पूर्ण मंगल तथा गोकुल की स्त्रियों को रिझाने वाला वह श्रीकृष्ण स्वयं मोक्ष की नौका ही
था। उसका सौन्दर्य अलौकिक था। जो भक्तकामकलद्रुम, मेघ की तरह नीली कांतिवाला मनोहर दीखने वाला,
जिसका नाम त्रैलोक्य में प्रसिद्ध है, ऐसे वह पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण स्वभाव से ही इस नाम के अनुरूप है। श्रीकृष्ण
के सौन्दर्य पर जहाँ लक्ष्मी पागल हो उठी, बेचारा मदन जन्म लेने को विवश था वहाँ दण्डचंद्र की क्या दशा है ?
जिसका नाम त्रैलोक्य को पवित्र करने वाला है, जो राक्षसों को. भस्म करने वाला है, जिसे 'पूर्णकाम' कहा जाता
है, वह भक्तों के लिए सदा सुगम है। त्रैलोक्य में जितना भी कुछ सौन्दर्य है, वह सब भूल कर श्रीकृष्ण के पास
आ गया था या यों कहिए कि कृष्ण के सौन्दर्य से ही त्रैलोक्य का सौन्दर्य सुशोभित होता है। जो सारे सौन्दर्य की
शोभा है, लावण्य की राशि है, जिसके अंग की प्रभा से संसार को शोभा प्राप्त हुई है। जो हर्ष में भी परम हर्ष,
अथवा सुख को ही अत्यन्त सुख देने वाला परमसुख है, जिसके कारण विश्राम को भी आराम मिलता है, वह
निराकार ही मानों साकार हुआ अथवा त्रैलोक्य के सम्पूर्ण लावण्य से युक्त सुन्दर श्रीकृष्ण, शोभा को भी सुशोभित
करने वाला था। जमा हुआ घृत पिघलने पर भी उसका घृतपना नष्ट नहीं होता, उसी प्रकार निराकार स्वरूप
साकार होने पर भी वह पूर्ण परब्रह्म ही था। उसे देखते ही देखने की इच्छा पूरी होती है, देखते-देखते ही देखना
पूरा हो जाता है, दृष्टा के साथ दर्शनक्रिया भी लज्जित होकर अपने स्वरूप में लौट जाती है। दृष्टि संतृप्त होकर
ढकार लेती है और व्यक्ति अपना पड़ोसी बनकर कृष्ण स्वरूप का आनन्द अनुभव करता है। एक बार श्रीकृष्ण
के माधुर्य का आस्वाद लेने पर जिह्वा रसस्वाद को भूल जाती है क्योंकि फिर स्वाद ही अच्छा नहीं लगता।
उसकी माधुरी विचित्र है। उस माधुरी ने अमृत का स्वाद भी फीका कर दिया है। इस प्रकार जिह्वा हरिरस में पूर्ण
रूप से सुख का अनुभव करती है। श्रीकृष्ण की हवा से ही सारा संसार नीरस हो जाता है। श्रीकृष्ण की
सुगन्धवायु के सिवा अन्य कोई गन्ध नाक को अच्छी ही नहीं लगती। वास, सुवास, पुष्प, ज्ञेय, घ्राता और घ्राण
ये सब कृष्ण के मकरंद से स्वयं ही एकत्र होकर उनके यहाँ विश्राम के लिये आते हैं। उनके शरीर के स्पर्श से
देह, देही और देहपन यह भाव नष्ट हो जाता है। देह ही अपनी देहबुद्धि किस तरह भूल जाता है? कठिन की
कठिनता नष्ट हो जाती है, मृदु की मृदुता लुप्त हो जाती है, इस प्रकार स्पर्श का स्पर्शत्व नष्ट हो जाता है, ऐसी
अवस्था श्रीकृष्ण ने कर डाली है। उसके पठन से वाच्य-वाचक का स्थान जो वाणी है उसने 'नेति' शब्द को
मिटा कर उसे निःशब्द कर दिया है। वाक वाचा में ही समा गयी, वाक्शक्ति अवाक हो गयी। कृष्णनाम ने
वाच्य-वाचक का भेद नष्ट कर दिया। उन चरणों का चिन्तन करते ही चित्त सहज ही विस्मृत हो जाता है और
फिर निश्चिंत होकर कृष्ण चरणों में विश्राम करता है। चित्त, चिन्ता और चिन्तन इन तीनों का स्मरण ही नहीं
रहता। श्रीकृष्ण चरणों का चिन्तन करते ही चित्त परिपूर्ण ब्रह्म ही हो जाता है। भूमि पर पड़े उसके पदचिन्ह
आश्चर्यजनक है। उसे देखते ही कर्माकर्म का लय हो जाता है और फिर कर्म, कर्त्ता और क्रिया यह भ्रम उसके
पदरज से निर्भ्रम हो जाता है। उसके चरणों की छाप देखते ही कर्माकर्म के बन्धन टूट जाते हैं क्योंकि कर्म का
मुख्य अंग है माया जिसका अल्पांश भी शेष नहीं रह पाता। गौ के पीछे अंकित पद-चिह देखने पर कर्त्ता के
साथ कर्म का विलय हो जाता है। 'अकर्म' यह कहना भी शेष नहीं रहता। इस प्रकार कर्म का निष्कर्म हो जाता
है। उसकी कीर्ति सुनने से श्रोता का श्रोतापन ही नहीं रह जाता, वक्ता का वक्तापन शेष नहीं रह जाता, वक्ता का
वक्तापन नहीं बच पाता, केवल श्रवणमात्र से ही परब्रह्म स्वरूप की प्राप्ति होती है।