सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 33

प्रथम अध्याय १७
ब्राह्मण पृथ्वी पर ब्रह्म का ही अवतार है ऐसा समझना चाहिए। उसका छल करने से कुलक्षय निश्चित है ऐसा
समझना चाहिए।
एवं प्रलब्धा मुनयस्तानूचुः कुपिता नृप।
जनयिष्यति वो मन्दा मुसलं कुलनाशनम्॥ १६॥
हे राजाधिराज परीक्षित सुनो ! इस प्रकार उन यादवों के शरीर में मानों मृत्यु की वायु का संचार ही हो चुका
था इसलिए वे उन ऋषियों का छल करने गये। उनका प्रश्न कपटपूर्ण है, यह मालूम होने पर उन्हें अत्यन्त क्रोध
हुआ। फिर क्या ! उन उद्धत लड़कों पर उन्होंने अनिवार्य वाग्वज्र छोड़ा। उन्होंने कहा, अरे ! इसके गर्भ से जो
बालक उत्पन्न होगा वह तुम्हारे कुल के लिए कालस्वरूप होगा। आप सभी अभागे हैं। शुद्ध लोहे के मूसल का
वह प्रसव करेगी।
तच्छ्रुत्वातेऽतिसंत्रस्ता विमुच्य सहसोदरम्।
साम्बस्य ददृशुस्तस्मिन् मुसलं कुलनाशनम्॥ १७॥
यह शापवचन सुनकर यादवों के वे लड़के घबरा गये। उन्होंने तत्काल उस सांवा के पेट पर बाँधा हुआ
कपड़ा हटा कर देखा। तो वहीं पर लोहे का मूसल निकला हुआ दिखायी दिया। उसे देखते ही सब लोग
भयविह्वल हो गये, एकाएक चौंक गये और आश्चर्यचकित हो गये। यादवों के कुल का विनाश करने का जो
संकल्प श्रीकृष्ण ने लिया था वही उन ऋषियों के शब्द के साथ तत्काल मूसल बन गया। ब्राह्मण जिन-जिन
वचनों का उच्चार करते हैं उन्हें श्रीकृष्ण झूठा नहीं होने देते। ब्राह्मण के मुँह से निकले हुए शब्द को श्रीकृष्ण
स्वयं सच करके दिखाते हैं। उन महान ऋषियों का कोप देखकर तथा कुलक्षय का शाप सुनकर उन यदुकुमारों
को बड़ा खेद हुआ और वे भय से काँपने लगे।
किं कृतं मन्दभाग्यैर्नः किं वदिष्यन्ति नो जनाः।
इति विह्वलिता गेहानादायं मुसलं ययुः॥ १८॥
हम भाग्यहीन हैं, हमने व्यर्थ ही कपटपूर्वक उन महान ऋषियों को चिढ़ाया और अपने ही हाथ से अपना
घात कर कपट के द्वारा घर में कुलक्षय ले आये। अब नगरवासी हमें क्या कहेंगे? वे कहेंगे इन ब्राह्मणों का
छल करने की क्या आवश्यकता थी? इसलिए चिंताक्रांत हो कर, म्लान मुख से वे सब उस मूसल को लेकर घर
आ गये।
तच्चोपनीय सदसि परिम्लानमुखश्रियः।
राज्ञ आवेदयाञ्चक्रुः सर्वयादवसन्निधौ ॥ १९॥
सभा में वसुदेव, उग्रसेन, बलराम, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न आदि अनेक यादव बैठे थे, केवल श्रीकृष्ण वहाँ नहीं
था। ऐसी उस सभा में सांब आदि सभी कुमार आये और लोहे का वह मूसल सामने रखकर मुँह छोटा कर पूरा
वृत्तांत सुनाने लगे।
श्रुत्वाऽमोघं ब्रह्मशापं दृष्ट्वा च मुसलं नृप।
विस्मिता भयसंत्रस्ता बभूवुर्द्वार्रकौकसः ॥ २० ॥
श्लोक २०—ब्राह्मणों का हमारे ऊपर भयंकर कोप हुआ है यह देखकर यादव भी भय से काँपने लगे।