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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 869 में से

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पृष्ठ 28

आच्छिद्य कीर्तिं सुश्लोकां वितत्य ह्यञ्जसानु कौ।
तमोऽनया तरिष्यन्तीत्यगात्स्वं पदमीश्वरः ॥७॥
इस प्रकार उदारकीर्त्ति कृष्ण ने अपने अवतार को विख्यात बना दिया। उसके कारण जड़ जीवों का उद्धार
होता है और श्रवणमात्र से त्रैलोक्य पावन होता है। स्वयं निजधाम जाने के बाद, अपने बाद संसार सागर को पार
करने के लिए भगवान स्वयं की कृष्ण कीर्त्तिरूपी नौका छोड़ गये थे। इस नौका की स्थिति विचित्र है। कल्पांत
में भी वह डूबने नहीं देती। उसके श्रवणमात्र से आज तक कितने ही श्रद्धालु तर गये और आगे भी कितने ही तर
जायेंगे यह मालूम नहीं है। श्रीकृष्ण की कीर्त्तिरूपी नौका को भवसागर में छोड़ना ही पर्याप्त है, उसके छोड़ते ही
सागर सूख जाता है। फिर श्रवणार्थी पुरुष जो नौका से उतरता है वह सूखे कदमों से ही सागर पार करता है। जो
कृष्ण की कीर्ति का पठन करते हैं उनके जन्ममरण का संसार शून्य हो जाता है वे अत्यन्त पावन और कीर्तिमान
हो जाते हैं और सुरगण उनकी वन्दना करते हैं। श्रीकृष्ण कीर्त्ति का आदर से पालन करने पर चारों मुक्तियाँ पैरों
तले आ जाती हैं। उनके योग से त्रिभुवन पावन होता है, हरिनाम से परम निर्वृत्ति अर्थात् परमानन्द प्राप्त होता है।
श्रीकृष्ण कीर्त्ति के नामाक्षर श्रवणद्वार से भीतर प्रवेश करते ही, अंतःकरण में भरा हुआ सारा अज्ञान एकाएक
खड़बड़ा कर बाहर आ जाता है। उसी प्रकार (कृष्ण कीर्ति) के गर्जन से अज्ञान को बाहर भी कोई आसरा नहीं
मिलता। इसलिए भय के मारे उसका सपरिवार विलय हो जाता है। इस प्रकार कृष्णकीर्त्ति में परमानन्द प्राप्त होता
है। कृष्णकीर्त्ति प्रताप के प्रकाश से सारा संसार कृष्णमय ही दिखायी देने लगता है। इसलिए वह कीर्ति उसे
कीर्त्तिमंत की ही तरह सहज ही निजसुख प्रदान करती है। जिसे देखने पर देखना समाप्त हो जाता है, जिसे
चखने पर चखना पूर्ण हो जाता है, जिसका श्रवण करने से श्रवण समाप्त हो जाता है, जिसका चिन्तन करने से
चित्तवृत्ति ही जम जाती है। जिसकी भेंट हो जाने पर मिलन की कमी कभी नहीं रह जाती, जिसके साथ बात
करने से परमार्थ को ही आलिंगन हो जाता है, और जिसके आलिंगन करने से आलिंगन की इच्छा विलीन हो
जाती है और जिसका नाम लेने से महाभय का भी नाश होता है, ऐसा वह सत्य संकल्प ईश्वर, वह सर्वेश्वर
शार्ङ्गधर स्वलीला से अर्थात् स्वेच्छा से शीघ्र ही निजधाम जाने के लिए उद्यत हुए।
राजोवाच
ब्रह्मण्यानां वदान्यानां नित्यं वृद्धोपसेविनाम्।
विप्रशापः कथमभूद् वृष्णीनां कृष्णचेतसाम् ॥८॥
तब परीक्षित ने बड़े आदर के साथ पूछा कि हे शुकयोगीन्द्र ! यादव तो विप्र भक्ति में विनम्र थे। ऐसा होते
हुए भी उन्हें शाप क्यों मिला यह बतलाइए। यादव दानवीर थे, राजा होते हुए भी परम पवित्र थे, निरन्तर ब्राह्मणों
की सेवा में तत्पर रहते हुए कृष्ण के आज्ञाधारी थे। सदैव कृष्ण का सहवास होने के कारण यादवों के पास
निरन्तर साधुसंत रहते थे। नारदमुनि तो सदैव वहीं रहते थे। ऐसा होते हुए भी यादवों को शाप कैसे मिला ? दक्ष
के शाप का प्रभाव, कृष्ण के पास रहने से नहीं होगा, इसलिए नारद भी द्वारका में ही रहते थे। फिर, ऐसा वह
श्रीकृष्ण स्वयं वहाँ उपस्थित रहने पर भी यादवों को शाप कैसे मिला ?
यन्निमित्तः स वै शापो यादृशो द्विजसत्तम।
कथमेकात्मनां भेद एतत्सर्वं वदस्व मे ॥ ९ ॥
शाप के लिए मूल कारण हैं संताप। तब ब्राह्मणों को क्रोध कैसे हुआ ? और शाप भी क्या दिया ? इसे