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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 869 में से

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पृष्ठ 26

१० श्रीमद् एकनाथी भागवत
का भार अभी कम नहीं हुआ है। इसका कारण यह था कि जिन यादवों ने शक्तिशाली होकर असंख्य दुष्टों का
संहार किया था, वही यादव अब विद्रोही हो गये थे यह बात श्रीकृष्ण को अच्छी नहीं लगी। इसलिए यादवों का
नाश हुए बिना पृथ्वी का पूरा भार कम नहीं होगा और यह यादवकुल कैसे नष्ट होगा इसके बारे में वे विचार
करने लगे। कपूर खाने से अग्नि बढ़ती है लेकिन कपूर समाप्त होने पर अग्नि भी बुझ जाती है। उसी प्रकार
यादवों द्वारा सबका संहार होने के बाद अन्त में उनके ही संहार की बारी आयी। जब तक केले के पेड़ में फल
नहीं आते तब तक वह बढ़ता रहता है लेकिन केले पुष्ट होते ही माली वह पेड़ काट डालता है। उसी प्रकार
यादव वंश की इतनी अधिक वृद्धि हुई कि वह अब भविष्य में संहार के ही लिए थी। फल पकने के बाद जब
उसकी गन्ध फैलने लगती है तो माली उसे तोड़ कर ले जाता है उसी प्रकार अपने ही कुल के फलों को तोड़कर
ले जाने का विचार श्रीकृष्ण के मन में आया। श्रीकृष्ण की कृपा से यादव अपने बाहुबल से पराक्रम कर बढ़े हुए
थे लेकिन वही श्रीकृष्ण उनके नाश का संकल्प कर मन ही मन क्षुब्ध हुआ था। यादवों का कुल अत्यन्त
प्रबल हुआ। उन पर शासन करने वाला कोई नहीं रहा। ऐसे इन उन्मत्त वीरों की अवस्था श्रीकृष्ण के लिए असह्य
हो उठी।
नैवान्यतः परिभवोऽस्य भवेत् कथञ्चिन्मत्संश्रयस्य विभवोन्नहनस्य नित्यम्।
अन्तःकलिं यदुकुलस्य विधाय वेणुस्तम्बस्य वह्निमिव शान्तमुपैमि धाम ॥ ४॥
यदि मैं निजधाम को चला गया तो यही लोग अधर्म के लिए प्रवृत्त होंगे। क्योंकि कुकर्म के लिए प्रवृत्त
होने में सम्पत्ति का मद और अहंकार का अतिरेक यहीं बाते मुख्य रूप से कारणीभूत होती हैं। मेरे ही बल से
बलशाली होकर ये सारे अजिरथि बन बैठे हैं। इनका सामना करने के लिए भूमण्डल पर कोई नहीं बचा है।
इनका गर्व मैं ही उतार सकता हूँ। इंद्रादि देवतागण, दैत्य, राक्षस या दानवों के वश में भी ये नहीं हो सकेंगे और
अगर ये इसी प्रकार पीछे पड़े रहें तो इन यादवों का संहार करने के लिए पुनः मुझे ही अवतार लेना पड़ेगा। इस
प्रकार अब अपनी ही आँखों के सामने अपने कुल को काल के मुँह में झोंकने का विचार कर श्रीकृष्ण ने वही
निश्चय पक्का किया। यदुवंश रूपी वंशबेल श्रीकृष्ण के कृपा जप से बढ़ी हुई थी। वहाँ अब कपट के बहाने
ऋषियों के शाप की चिनगारी गिरी। वास्तव में वह श्रीकृष्ण के संकल्प और ब्रह्मशाप से भड़क उठी। वह अब
स्वजनों के विरोध के रूप में तथा कालाग्नि के कोप से सबके विनाश का कारण बनेगी। इस प्रकार यादवों के
कुल का निर्दलन कर फिर अपनी लीला से अपने निजधाम जाने की श्रीकृष्ण ने योजना बनायी।
एवं व्यवसितो राजन् सत्यसङ्कल्प ईश्वरः।
शापव्याजेन विप्राणां संजह्रे स्वकुलं विभुः ॥ ५ ॥
इस प्रकार अपने कुल को स्वयं ही नष्ट करने का विचार उनके मन में आया और उन्होंने समूलकुलक्षय
का निश्चय किया। अब यह कार्य हो कैसे ? इस पर जगदीश ने यह विचार किया कि ब्राह्मण के शाप के बहाने
कुल का अपने आप ही विनाश हो जाएगा। बस इतना सिद्ध हो जाए तो अवतार की इतिकर्तव्यता समाप्त हो
जाएगी और फिर स्वलीला से निजधाम चलें ऐसा यदुवीर ने विचार किया। श्रीकृष्ण 'लीलाविग्रह' अर्थात् स्वेच्छा
से देह धारण करने (जीवों की तरह कर्म के अनुसार देह धारण करनेवालों की तरह नहीं) वाले तथा नितान्त
सुन्दर थे। उनकी गुणकर्मक्रिया अत्यन्त पवित्र थी। वह परिपूर्ण ब्रह्म, पूर्णावतारी तथा संसार का उद्धार करने
वाला था।