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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 869 में से

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पृष्ठ 35

इसलिए, वेदस्तुतिपाठक उसका 'पूर्ण ब्रह्मण्यदेव' के रूप में वर्णन करते हैं। स्वयं श्रीकृष्ण भी ब्राह्मणरूप ही था
इसीलिए तो वह ब्राह्मणों का पक्ष लेता था। कुलक्षत्रय हुआ फिर भी ब्राह्मणों पर कुपित नहीं हुआ। ब्राह्मणों का
शाप सुनकर वह मोह में नहीं पड़ा, बल्कि उलटे मेरा संकल्प पूरा हुआ यह ठीक ही हुआ ऐसा उसने कहा। इस
प्रकार कालरूपी श्रीकृष्ण ने इसमें प्रसन्नता ही मानी। कुलक्षय से क्षिति अथवा दुःख से उसने जरा भी सम्बन्ध
नहीं रखा। इसके विपरीत उसे परम संतोष प्राप्त हुआ। उसकी ज्ञानमय कथा अगले अध्याय में है। वह अत्यन्त
रसाल एवं आनन्ददायक है इसलिए श्रोताओं को मेरे निरूपण पर ध्यान देना चाहिए। उसमें नारद और वसुदेव में
बहुत ही मधुर संवाद होगा। जनक और ऋषभदेव के प्रश्नोत्तर सुनकर जीव आनन्द सागर में तैरता रहेगा। यह
रसाल ब्रह्मज्ञान की कथा है, शुद्ध परमार्थ है। उसके प्रति मैं आपके मन में रुचि जगाऊँगा। इसके लिए एकनाथ
गुरु जनार्दन की तथा अर्थ की ओर ध्यान देने के लिए श्रोताओं की प्रार्थना कर रहा है।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशे स्कंधे परमहंससंहितायां
एकाकारटीकायां विप्रशापः प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु।