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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

२१२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
देखकर अनेक टिटिहरी पक्षी जो उससे बलवान भी थे, वे दौड़ कर उसके पास आये। वे अब जोर जबरदस्ती से
मुझसे वह टुकड़ा छीन लेंगे यह जानकर वह भागने लगा। वह दौड़ रहा है यह देख कर सबने उसे घेर लिया।
माँस के उस टुकड़े की लालच में वहाँ बहुत बड़ा झगड़ा शुरू हो गया। कोई पंख से प्रहार करने लगे तो कोई
नाखून गड़ाने लगे तो कोई मुँह से काटने लगे। इससे उसे अत्यन्त दुःख हुआ। मुँह में माँस का टुकड़ा होने के
कारण वह चिल्ला भी नहीं सकता था। वे लोग कितनी ही धक्का-मुक्की कर रहे थे लेकिन उसका मुँह बन्द
था। वह मन में विचार करने लगा कि ये मेरे सजातीय बाँधव होते हुए मुझे क्यों पीड़ा दे रहे हैं ? उसने कहा कि
मेरे पास का यह माँस का टुकड़ा ही मेरे दुःख का मूल कारण है और यह कहकर उसने तत्काल वह टुकड़ा
फेंक दिया और सुखपूर्वक, शान्त होकर बैठ गया। लेकिन जहाँ माँस का वह टुकड़ा गिरा था वहाँ झगड़े के
कारण विचित्र सा कोलाहल मच गया। लोग एक-दूसरे का सिर फोड़ने लगे और मुँह नोचने लगे। वह टिटिहरी
उस झगड़े को बड़े मजे में देख रही थी। सारांश जहाँ मूल परिग्रह विद्यमान है, वहाँ दुःख रहता है और उसका
त्याग करने पर अपार सुख की प्राप्ति होती है। अट्टालिकायें, गोपुर, बाडे, धन, धान्य, वस्त्रालंकार, रत्न, पत्नी,
बच्चे आदि जो समुदाय है, वही परिग्रह है। इस सारे परिग्रह का मूल यदि खोजा जाय तो केवल देहबुद्धि, अर्थात्
'देह ही मैं हूँ' यह भावना है। वह भी अभिमान में सनी हुई, अर्थात् सबका मूल कारण अभिमान है। उस
अभिमान का ही जब त्याग करेंगे, तभी प्रपंच की जड़ नष्ट होती है। जब जड़ ही टूट जाती है तब वृक्ष भी गिर
पड़ता है। अभिमान देहबुद्धि के लिये जीवन की तरह है और देहबुद्धि भी संग से दृढ़तर होती है। इन दोनों की
संगति का निवास स्थान परिग्रह है। इस प्रकार ये दोनों परस्पर चिपके रहते हैं। इनका त्याग करने से अपार सुख
प्राप्त होता है और उसका संग्रह करने से वह दुःख का कारण बनता है। पहले अभिमान का त्याग करना चाहिये।
अभिमान के साथ सब कुछ छोड़ देने से सुख की बिछावन पड़ेगी। उस सुख का वर्णन करने में शब्द लजाकर
पीछे हट जाते हैं। हे राजा! अब तुम यदि पूछोगे कि अभिमान छोड़ कर कैसे रहा जाय तो उसके लिये बालक
को गुरु बनाने का वृत्तांत सुनाता हूँ।
न मे मानावमानौ स्तो, न चिन्ता गेहपुत्रिणाम्।
आत्मक्रीड आत्मरतिर्विचरामीह बालवत् ॥ ३॥
बालक कभी नहीं कहता कि यह मेरा है या यह तेरा है। उसकी समझ में ऊँच-नीच नहीं आता। इसलिये
वह सुखपूर्वक मान-अपमान को सहकर रहता है। तीन महीने के बालक को मान-अपमान की समझ नहीं होती,
वह अपने ही आनन्द में प्रसन्न रहता है। दूजेपन को वह स्पर्श ही नहीं करता, अपनी ही लीला में मस्त होकर
वह खेलता रहता है स्वयं ही अपना मनोरंजन करता है। बच्चे को घरबार की चिन्ता कभी स्पर्श नहीं करती। वह
स्वभाव से ही चिन्तामुक्त रहता है। उसे चिन्ता की बात मालूम ही नहीं रहती इसलिये वह स्वयं से ही प्रेम करता
है। अपने में ही रममाण रहता है। वही स्थिति योगी की है। उसे प्रपंच का भान नहीं रहता इसलिये उसके लिये
मान और अपमान एक समान रहते हैं। चित्र में बने सर्प का दंश किया हुआ जिस प्रकार चित्त के ही अमृत से
बच जाता है, उसी प्रकार योगी जन्म-मरण की झंझट से छूट कर द्वंद्व से मुक्त होकर निश्चल बना रहता है।
घरबार, पत्नी तथा बच्चों की चिन्ता उसके लिये मिथ्या है, क्योंकि जब उसे अपना देह ही सच्चा मालूम नहीं
होता तो पत्नी और बच्चों की चिन्ता क्यों होगी? यदि संसार का मूल खोजा जाय तो वह है कल्पना। वह कल्पना
मन के अधीन रहती है। जब वह मन ही स्वस्वरूप में लीन हो जाता है तो सब कुछ चिद्धन बन जाता है। उस

नवाँ अध्याय २१३
स्वरूप की प्राप्ति के कारण वह चिद्घन स्वरूप में क्रीड़ा करता रहता है। वह क्रीड़ा अभिमान रहित तथा दैवयोग
से चलती रहती है। जब आत्मसुख की प्राप्ति होकर मन के साथ सारे इन्द्रिय शान्त हो जाते हैं, वृत्तियों में जब
अणुमात्र का भी स्फुरण नहीं होता तो उस स्थिति को 'समाधि' कहते हैं। उसी स्वरूप में मन लगाकर जब बाह्य
स्फूर्ति का स्फुरण होता है तो उस स्थिति को साधुजन 'व्युत्थान' कहते हैं। ड्योढ़ी पर दीपक रखने से जिस
प्रकार दोनों ही ओर की चीजें दिखायी पड़ती हैं, उसी प्रकार व्युत्थान दशा को जीवभावना तथा शिवस्वरूप दोनों
का ही ज्ञान रहता है। नमक और पानी जिस प्रकार मिल कर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार आत्मस्वरूप में जब
मन घुल मिल जाता है तो उसका आत्मस्वरूप से तादात्म्य हो जाता है और वह 'समाधि' तथा 'व्युत्थान' दोनों
को लात से झटक देता है। फिर उसे न किसी का मान ही रहता है और न अपमान ही रहता है। फिर घरबार और
स्त्री, पुत्रों की चिन्ता कौन करेगा? मन स्वस्वरूप में खो जाने के कारण वह उसे आत्मसंतोष प्राप्त होता है। मन
विरहित शरीर व्यापार किसी बच्चे की तरह होते हैं। दैवयोग से ही जो हलचल हो जाय वही पर्याप्त है अर्थात्
सदा शून्यवृत्ति से व्यवहार करना।
द्वावेव चिन्तया मुक्तौ परमानन्द अप्लुतौ।
योविमुग्धा जडो बालो यो गुणेभ्यः परं गतः ॥४॥
चिन्ता की भँवर बहुत बलवान है। उसमें ब्रह्मदेव सरीखे देवतागण भी डूब जाते हैं। लेकिन हे यदुवीर!
उसमें से केवल दो ही बच पाते हैं, योगी और बालक ! उन दोनों को ही द्वैत का भान नहीं होता, दोनों को ही
मान अपमान का ज्ञान नहीं होता, दोनों ही सुख में सुखी रहते हैं और दोनों ही मन विरहित व्यवहार करते हैं।
लेकिन एक को बाद में दुःख प्राप्त होता है और दूसरा सुख और दुःख पर विजय प्राप्त कर चुका होता है। एक
को मुग्धता का अर्थात् अज्ञान का सुख रहता है तो दूसरा आत्मज्ञान के कारण सुखी रहता है। बालक के मन में
सुप्त वासना रहती है, उसी में बाद में अंकुर फूटते हैं जो उसे चक्कर में डाल देते हैं लेकिन योगी की यह बात
नहीं होती। वह गुणातीत रहता है। संसार में उसका सुख-दुःख के साथ कोई सम्पर्क नहीं होता। जब देह में जीव
विद्यमान रहता है तो वह गुणातीत कैसे रहता है? तो उसका रहस्य भी बताता हूँ। साधक साधुजनों की सेवा
करके अपना सत्त्वगुण बढ़ाता रहता है। इस प्रकार सत्त्वगुण बढ़ जाने पर ज्ञान का साधन सिद्ध हो जाता है। उस
सिद्ध ज्ञानसाधना के योग से वे मृत्युलोक में मोह ममता का भोग भोगने की समस्या को नष्ट कर देते हैं। सारांश
यही कि शुद्ध सत्त्व की वृद्धि से रज और तम का संहार हाता है और सत्त्व एकमेव रह जाता है जो धीरे-धीरे
स्वयं ही शान्त हो जाता है। जब तक लकड़ी के बोझ आग में पड़ते रहते हैं तब तक वह बड़े उल्लास से उसे
जलाती रहती है लेकिन जब लकड़ी का एक भी टुकड़ा शेष नहीं रहता तब वही अग्नि अपने मूल तेज में
विलीन हो जाता है। इसी प्रकार गुणावस्था को जीत कर योगी गुणातीत अवस्था तक पहुँच जाता है। इसलिये
कल्पांत होने पर भी उसे संसार की व्यथा नहीं सताती। जो सुख अनन्त है, उसकी प्राप्ति उन्हें आत्मस्वरूप के
रूप में ही प्राप्त हुई रहती है। देह में विचरण करते हुए भी वे देहातीत रहते हैं इसलिये चिन्ता का भँवर उनके
लिये नहीं है। सचमुच, एक हुए बिना यह अवस्था नहीं प्राप्त होती। इसीलिये, हे राजेश्वर ! मैंने कुमारी को गुरु
बनाया था, उसकी कथा सुनाता हूँ।
क्वचित् कुमारी त्वात्मानं वृणानान् गृहमागतान्।
स्वयं तानर्हयामास क्वापि यातेषु बन्धुषु ॥ ५ ॥

२१४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
एक कुमारिका थी। उसे घर में छोड़कर उसके माँ-बाप अपने इष्ट मित्रों के साथ कुलस्वामी की यात्रा पर
गये। उन्होंने उस कन्या के विवाह का विचार पहले से ही कर रखा था। वही सम्बन्ध निश्चित करने के लिये
वरपक्ष की ओर से श्रेष्ठ ब्राह्मण उनके घर आये। उन्होंने पूछा, "घर में कौन है?" लेकिन भावी वधू ने लज्जा
के कारण मौन रखा लेकिन उनके स्वागत की पूरी तैयारी की। खिड़की में से ही सबको बैठने के लिये आसन
दिये। गंधाक्षत, फूल, पान आदि सामग्री बिना माँगे ही लाकर धर दी। पूजा की सारी सामग्री सामने देखकर
ब्राह्मण समझ गये कि वधू घर में अकेली है और उसकी ही यह चातुरी है। उसे उनके मेहमाननवाजी की चिन्ता
पड़ गयी। वह मन ही मन बोली, "मेरी माँ को आने में विलम्ब होगा और घर में तो चावल भी कूटे हुए नहीं
हैं। चावल कूटने में तो भोजन में विलम्ब हो जायेगा।"
तेषामभ्यवहारार्थं, शालीन रहसि पार्थिव।
अवघ्नन्त्याः प्रकोष्ठस्थाश्चक्रुः शङ्खाः स्वनं महत्॥ ६॥
ऐसा विचार मन में करते हुए वह चावल कूटने लगी

नवाँ अध्याय २१५
तक मैंने 'अरिमर्दन' किया यह कहना उचित नहीं होगा। काम आदि जो षड्रिपु हैं उन्हें इस उपदेशरूपी शस्त्र से
जब तक हतवीर्य नहीं कर देते तब तक संसार में मेरा कोई शत्रु नहीं है यह नहीं कह सकते। अस्तु ! अब तुम
यदि पूछोगे कि तुम अवधूत लोकविरहित होकर रहते हो और वह कन्या तो घर के भीतर रहने वाली, तो तुम्हें
उसका एकान्त का वृत्तांत कैसे मालूम हुआ ? तो सुनो, मैंने निर्जन अरण्य में रहकर, गुरुवचन पर विश्वास कर,
आसन पर अटल बैठ कर ध्यान से निजत्त्व का आकलन किया है। उस तत्व निश्चय के लिये मैं इस पृथ्वी पर
विचरण करता फिरता हूँ और भले ही मैं जन में रहूँ या वन में, लेकिन मैं निजात्मभाव दृढ़ करके ही देखता रहता
हूँ। भले ही दृश्य पदार्थ से भेंट हो जाय लेकिन दृश्य दृश्यत्व से नहीं दिखायी देता। इतना ही नहीं, अपितु
द्रष्टापन भी नष्ट हो जाता है। ऐसी दृष्टि से मैं भटकता रहता हूँ। इस प्रकार गुरुत्व के गुण स्वीकार कर जब मैं
संसार की ओर देख रहा था, तभी मुझमें चैतन्य भाव का स्मरण हुआ। इस आत्मदृष्टि से चराचर सृष्टि में
विचरण करते समय मैं एकाएक उसी समय उस लड़की के घर पहुँच गया। हे चतुरा ! अपना हेतु सिद्ध करने के
लिये उस लड़की ने कंगन की युक्ति का कैसे विचार किया, उसका विचार कर मैंने उससे किस प्रकार का बोध
लिया उसे श्रवण करो।
वासे बहूनां कलहो भवेद् वार्ता द्वयोरपि ।
एक एव चरेत् तस्मात् कुमार्या इव कङ्कणः ॥ १० ॥
जिस स्थान पर अनेक लोग निवास करते हैं, वहाँ सदा कोलाहल मचा रहता है। इतना ही नहीं, केवल
दो ही व्यक्ति जब एकान्त में बैठते हैं तो भी वे अनेक प्रकार की बातें करने लगते हैं। जहाँ बातें करने में ही
समय व्यतीत हो जाता है वहाँ अपना कोई स्वार्थ नहीं सध पाता। इसीलिये मैं अकेला ही घूमता रहता हूँ।
अकेले होते हुए एकाग्रता सधी तो बहुत बड़ा लाभ होता है और इसीलिये मैंने सचमुच ही बाण बनाने वाले
को अपना गुरु बनाया।
मन एकत्र संयुञ्ज्याज्जितश्वासो जितासनः ।
बैराग्याभ्यासयोगेन ध्रियमाणमतन्द्रितः ॥ ११ ॥
वैराग्य के बिना अभ्यास शुरू करने से विषयरूपी चोर उठ खड़े होते हैं, काम डाका डालता है और
मूलधनरूपी आत्मज्ञान ही नष्ट हो जाता है। इसलिये सबसे पहले विवेकरूपी दीपक से अज्ञानरूपी अन्धकार को
पहले नष्ट करना चाहिये और महामुद्रा (भूचरी, खेचरी, अगोचरी तथा अलक्ष्य) के योग से वैराग्य की भी पूरी
सहायता लेनी चाहिये। प्राण और अपान की बहुत दिनों से भेंट नहीं हुई थी वह अभ्यास के योग से हो गयी। वह
भेंट होते ही पुराने परिचय के चिह्न स्मरण हो आये। तब उन दोनों ने एक-दूसरे को आलिंगन दिया और समसाम्य
से दोनों का समाधान हुआ। इस प्रकार आसन पर स्थिर बैठकर प्राण और अपान में ऐक्य उत्पन्न किया और
ब्रह्मस्थान में प्रवेश करने के लिये बाँहें सरकायीं। ब्रह्म-गिरी के किले को शमदम से घेर कर इन्द्रियों के अंतर्मुख
से प्रहार किया। प्राणापान की सुरंग में पूर्व परिचय होते हुए भी मन को एकाग्र रखकर उनमें ऐक्य स्थापित किया।
एकाग्रता के हमले से आगे बढ़ने वाले प्राण और आगे बढ़े और उन्होंने कुण्डलिनी शक्ति के द्वारा षट्चक्रों का
भेदन किया। उन वीरों ने वैराग्य का कवच पहन लिया और पूरी एकाग्रता से उनके हाथ में ध्यानरूपी खड्ग
चमकने लगे। उन खड्गों के चमत्कार का वर्णन किन शब्दों में किया जाय ? उन्होंने छोटे-बड़े सभी को साफ कर
दिया। उसके सामने कोई सन्देह भी आ जाता तो उसके टुकड़े-टुकड़े हो जाते। उसने आलस को रसातल में भेज

२१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
दिया और निद्रा को अपने वश में कर लिया। इस प्रकार दिन-रात सावधान रहकर योगरूपी किले को जीतने के
लिये वे तत्पर रहते हैं। समरांगण के वीर बड़े रणधुरंधर थे। वे अपने ही बल पर आगे कूच करने लगे और
सत्रहवीं जीवन कला अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र के अमृत संग्रह (तालाब) को उन्होंने हस्तगत कर लिया। वहाँ प्रचण्ड युद्ध
हुआ। युद्ध में कामादिक छह शत्रुओं का संहार हुआ और वह अमोघ तथा दिव्य खड्ग चमकता रहा। इस प्रकार
रणांगण में शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर सत्रहवीं का जल अर्थात् अमृत प्राशन किया। तभी उस किले में से
एकाएक अनुहत का ध्वनि सुनायी देने लगा। यहाँ सोहंवीरों की एकाग्रता होते ही भीतर का सारा भेद हाथ में आ
गया। किले की रक्षा करने वाली अहंता मरने-मरने को हो आयी।
यस्मिन् मनो लब्धपदं यदेतच्छनैः शनैर्मुञ्चति कर्मरेणून्।
सत्त्वेन वृद्धेन रजस्तमश्च विधूय निर्वाणमुपैत्यनिन्धनम्॥ १२॥
कामक्रोधादि वीर पुत्र युद्ध में मारे गये इस दुःख से विह्वल होकर अहंता और ममता मृत्यु की प्रतीक्षा
करने लगे। किले की यह वार्त्ता सुनकर उन शमदमादि वीरों में और भी अधिक स्फूर्ति का संचार हुआ और
उन्होंने पुनः उस किले को जीतने के लिये आह्वान किया। उन वीरों का धैर्य विलक्षण था। पराक्रम करने में तो
वे प्रसिद्ध थे ही। उन्होंने आगे का मार्ग देखा तो उन्हें उसमें विकट संकट दिखायी दिया। वहाँ वासनाओं के
दुर्धर घाट थे जिसमें चलना अत्यन्त कठिन था। लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे उस घाट पर चढ़कर उसे समतल बना
दिया। उसके आगे रजतम की भीषण खाई दिखायी दी। वह अपार गहरी खाई थी लेकिन उसमें निवृत्ति के
पत्थर डालकर उसे बन्द कर दिया। फिर किसी को भी आहट न लगने देकर 'मनकर्णिका वोवरी' नामक
आज्ञाचक्र हस्तगत कर ब्रह्मगिरी पर चढ़ने के लिये रस्सी की बनी सीढ़ी लगायी और ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश किया।
तब चारों ओर दिग्विजय की जयजयकार सुनायी देने लगी। देखा तो वहाँ कोई भी शत्रु नहीं था, चारों ओर
अपना ही राज्य था। तब रजतम की राहें अपने आप समतल होकर वहाँ रामराज्य की मुनादी की गयी। वहाँ
कोई भी पराया नहीं दिखा। तब ध्यानरूप खड्ग को मुट्ठी में पकड़ लिया, समदृष्टि से वैराग्य कवच की गाँठ
भी कुछ ढीली की। देखने पर ध्येय, ध्यान और ध्याता ही दिखायी नहीं दिये इसलिये ध्यान खड्ग की
आवश्यकता ही नहीं रही। सत्त्व ने युद्ध की प्रचण्ड सामग्री एकत्र की थी लेकिन सामने कोई शत्रु नहीं दीख
रहा था इसलिए उसे दूर फेंक दिया। तब तन्मयतारूपी छत्र धारण कर वह योगी जीवभाव को त्याग कर सहज
समाधान से समसाम्य के सिंहासन पर आरूढ़ हुआ। फिर शुद्ध सत्त्वगुण बढ़ा और उसने सर्वस्व को त्याग कर
तथा प्रणाम कर वह स्वयं आत्मस्वरूप में लीन हो गया। जिस प्रकार मंथन कर उत्पन्न किया हुआ अग्नि उन
काष्ठों की होली जलाता है और स्वयं शान्त होता जाता है उसी प्रकार रजतम रहित सत्त्व निकाल लेने पर रज
और तम का अपने आप ही विनाश हो जाता है और फिर सत्त्व के संभ्रम का अपने आप विलय हो जाता है।
तब जीव का जीवत्व नष्ट हो जाता है, ज्ञातृत्व के साथ ज्ञान का लय हो जाता है, प्रपंच का भी ध्यान नहीं
रहता और पूरी तरह चिन्मात्र स्वरूप भर जाता है।
तदैवमात्मन्यवरुद्धचित्तो न वेद किंचिद् बहिरन्तरं वा।
यथेषुकारो नृपतिं व्रजन्तमिषौ गतात्मा न ददर्श पार्श्वे॥ १३॥
इस प्रकार परिपूर्ण भरे हुए चिन्मात्र स्वरूप में चित्त को संयत कर लाने से हे राजेन्द्र ! उस चित्त को भी
वहाँ चैतन्यस्वरूप ही प्राप्त होता है, इसे ध्यान में रखो। तब हृदय में भी चैतन्य धन और बाहर भी परिपूर्ण शुद्ध

नवाँ अध्याय २१७
चैतन्य भर जाता है, वहाँ दूसरा कुछ भी नहीं दिखायी देता। वृत्ति पूर्णतयः समर्पित रहती है। ध्येय, ध्याता और
ध्यान इन तीनों को एक साथ देखकर मन उल्हास से भर जाता है। इसी को 'सविकल्प समाधि' कहते हैं।
उसका निर्गुण रूप में ही उपभोग करते हैं। वहाँ मन पूरी तरह समरस होकर रहता है और वह सुखरूप
चिद्घनस्वरूप होकर ही रहता है। ज्ञानीजन ऐसी समाधि को अत्यन्त श्रेष्ठ मानते हैं। ब्रह्म इन्द्रियों के लिये गोचर
नहीं है, गुण नष्ट होने पर ही वह आँखों को दिखाई देता है। जो अनुभव लेता है उसी को वह प्रतीत होता है।
उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उस पर विवाद करते-करते शास्त्र भी एक दूसरे के विरुद्ध हो गये हैं। वेदों
में तो उसे 'नेति', 'नेति' कहा गया है। योगियों के समुदाय तो हाथ टेक कर शान्त बैठ जाते हैं। अनुभवी लोग
उसे आत्मज्ञान से जानते हैं। वहाँ हेतु-मात्र दृष्टांत समूल डूब जाते हैं और अद्वैतवाद ने भी मात कर दी।
अंतर्बाह्य समदृष्टि होना यही अनुभव का निश्चित लक्षण है। इसी बात को ध्यान में रख कर मैंने शरकर्ता को गुरु
बनाया। बाण की नोक को तपा कर उसे सीधा करते समय उसकी दृष्टि एकाग्र होकर वहीं लग गयी थी। केवल
उतने से ही उसका बाह्य प्रपंच की ओर से ध्यान हट गया। फिर राजा की सवारी पूरी शान शौकत के साथ उसके
द्वार पर से गयी लेकिन सारा ध्यान.शर तैयार करने में लगा होने के कारण उसे उसका भान ही नहीं रहा। इतने
में, पीछे से राजा का नौकर आया और उसने पूछा, "क्या राजा की सवारी इधर से गयी है?'' लेकिन उसने उत्तर
दिया, "देखा तो नहीं।" (अवधूत कहते हैं) उस शरकर्ता को मैंने अपनी आँखों से देखा और उसकी बात
सुनकर मैंने यह बोध ग्रहण किया कि संसार में एकाग्रता ही श्रेष्ठ वस्तु है। वह प्रपंच को आँखों के सामने नहीं
आने देती। यही सिद्ध करने के लिए मैंने सर्प से यही शिक्षा ली कि घरबार किये बिना अकेले ही रहना उचित है
और मैंने सर्प को गुरु बना लिया।
एकचार्यनिकेतः स्यादप्रमत्तो गुहाशयः।
अलक्ष्यमाण आचारैर्मुनिरेकोऽपभाषणः ॥ १४॥
सर्प को किसी का भी संग अच्छा नहीं लगता। वह अकेला ही सुखपूर्वक विचरण करता रहता है। वह
निरन्तर सावधान रहता है और एक भी साँस व्यर्थ नहीं जाने देता। योगी की स्थिति भी ऐसी ही रहती है। उसे भी
दूसरे का उपसर्ग अच्छा नहीं लगता। जहाँ लोगों की दृष्टि न पड़े ऐसे एकान्त स्थल में वह रहता है। वह खराब
आदमी की संगत नहीं करता लेकिन अच्छे का भी साथ नहीं निभाता। जिस प्रकार साँप अपनी केंचुल उतार
फेंकता है, उसी प्रकार योगी भी अपने देहसंग से बाहर निकल पड़ता है। निरन्तर सावधान रहकर वह एक भी
क्षण व्यर्थ नहीं जाने देता। सचमुच वह अपना स्वरूपानुसंधान टूटने नहीं देता। सर्प स्वयमेव बिल में घुस जाता है
क्योंकि जिस मार्ग से वह गया है उसे सब लोग देखते हैं। लेकिन उसने खाया है या नहीं इसे कोई नहीं देखता।
उसी प्रकार योगी भी योगसामर्थ्य से लोगों के सम्पर्क में न रहकर गुफा में पड़ा रहता है और स्वयं से ही क्रीड़ा
करता रहता है। योगी का आचार छोटे-बड़े सभी देखते हैं लेकिन वह वास्तव में सविकल्प है या निर्विकल्प है
यह किसी की समझ में नहीं आता। कोई कहता है कि वह कर्मनिष्ठ है तो कोई उसे कर्मभ्रष्ट कहता है। लेकिन
उसके सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से किसी को कुछ भी मालूम नहीं होता। सर्प को तो बोलना नहीं आता वह केवल
किसी शब्द का उच्चार मात्र करता है। उसी प्रकार योगी भी किसी प्रकार के वाद-विवाद में नहीं फँसता।
अंतःकरण की कृपा के बल से थोड़ा सा ही किन्तु मृदु, मंजुल और कोमल कुछ तो बोलता है। इसलिये उसे एक
ही बार सुन लेने पर भी कान तृप्त हो जाते हैं देखा जाय तो उसका बोलना अत्यन्त संक्षिप्त होता है, लेकिन वह

२१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
संकल्प विकल्प का विनाश कर देता है। जो सत्यसंकल्पी होते हैं वही उसके शब्दों के स्वरूप को पहचानते हैं।
जो अकेला और उदासीन है, जिसका मन परमार्थ की ही ओर लगा हुआ है उसे घरबार करने की इच्छा कर
व्यर्थ का परिश्रम नहीं करना चाहिये।
गृहारम्भोऽतिदुःखाय विफलश्चध्रुवात्मनः।
सर्पः परकृतं वेश्म प्रविश्य सुखमेधते ॥ १५ ॥
घरबार करना यही मूलतः दुःख का कारण है। जी जान से परिश्रम कर तथा कष्ट सह कर तीन मंजिल का
मकान बनाइये लेकिन वह सर्वथा अशाश्वत ही रहता है। जहाँ संसार ही नाशवान है, शरीर का प्रत्यक्ष आकार ही
मिथ्या है वहाँ केवल घर ही किस तरह शाश्वत हो सकता है ? लेकिन मूर्ख लोग इसी को सत्य मान कर चलते
हैं जो गर्भ में ही मृत हो गया उसका जन्म से ही जातक करते और मृत के ही जन्म पर उसका नामकरण करते
हैं, उसी प्रकार अशाश्वत घर की स्थापना करना है। ऐसे गृह का प्रारम्भ भी मिथ्या है क्योंकि उसमें मिट्टी के
लिये झगड़ा होता है, पत्थर और लकड़ी के लिये भी सम्बन्धी को दूर रखकर टंटा होता है। दीपक बड़े प्रयास से
घर बनाती है और उसमें घुस कर सर्प बड़े मजे में रहता है। बिना किसी प्रकार का कष्ट किये दूसरे के घर में
मौज करता है। उसी प्रकार योगी भी घर या देह का अभिमान नहीं करता। बिना, किसी अभिमान के, दूसरे के
घर में रहकर आनन्द करता है। मैंने घर न बनाने का निश्चय किया। किन्तु ईश्वर ने जब इतनी बड़ी सृष्टि
बनायी है उससे उसे बाधा क्यों नहीं होती ? तो सृष्टि की रचना किस प्रकार हुई ? वह किससे उत्पन्न हुई ? यही
जानने के लिये मैंने मकड़ी को अपना गुरु बनाया।
एको नारायणो देवः पूर्वसृष्टं स्वमायया।
संहृत्य कालकलया कल्पान्त इदमीश्वरः ॥ १६ ॥
नर का आश्रयस्थल है इसलिये उसे 'नारायण' कहते हैं। समस्त जीवों का जो जीवन है वही नारायण
सबका स्वामी है। ऐसा जो नारायण है उसने इस संसार को पहले उत्पन्न किया। कोई भी बाह्य सामग्री लिये बिना
उसने इस विश्व की उत्पत्ति की। अकेले और वह भी बिना किसी सामग्री के यह कैसे सम्भव हुआ ? तो उसने
अपनी ही माया का क्षोभन कर यह संसार बनाया। उस निज माया के उदर में जीवसमुदाय असंख्य भरा हुआ है।
उस माया का उसने दृष्टि से अवलोकन किया। इसी को निजकाल कहते हैं। इस प्रकार उसने अपनी माया की
ओर देखा और उसे अपने शरीर पर खेलने दिया लेकिन अपने शरीर का स्पर्श नहीं होने दिया। ऐसी अलिप्तता
का खेल वही जानता है। आकाश में धुआँ फैलता है लेकिन आकाश धुएँ को स्पर्श नहीं करता। उसी प्रकार वह
अपने शरीर पर माया का पोषण करता है लेकिन उससे अलिप्त रहता है। जल से ही कमलिनी का पोषण होता
है लेकिन उसी जल को वह अपने पत्ते में ढँक देती है। उसी प्रकार माया सत्-चित्-आनन्द में से आनन्द पर
'आवरण' डालती है, किन्तु सत-अंश के साथ चित् स्वतंत्र ही रहती है। स्वमाया का जो अधिष्ठान है वही माया
का निवास स्थान है। उसी प्रकार वास्तव में माया का नियंता नारायण ही है। रजोगुण सृष्टि को उत्पन्न करता है,
सत्वगुण उसका पालन करता है और तमोगुण कल्पांत के समय क्षुब्ध होकर काल के रूप में उसका संहार करता
है। किन्तु माया की यह क्षोभक शक्ति नारायण के हाथ में रहती है, इसी दृष्टि से अन्त में संहार करने वाला
ईश्वर ही रहता है।

नवाँ अध्याय २१९
एक एवाद्वितीयोऽभूदात्माधारोऽखिलाश्रयः।
कालेनात्मानुभावेन साम्यं नीतासु शक्तिषु।
सत्त्वादिष्वादिपुरुषः प्रधानपूरुषेश्वरः॥ १७॥
परावराणां परम आस्ते कैवल्यसंज्ञितः।
केवलानुभवानन्दसंदोहो निरुपाधिकः॥ १८॥
इस प्रकार कार्यकारण नष्ट करने के बाद एक अकेला परिपूर्ण नारायण ही शेष रहता है। लेकिन यहाँ पर
अकेला नारायण रहता है यह कहने वाला भी कौन है? यह लक्षण तो अद्वितीय है, इसी को भेद शून्य अवस्था
कहते हैं। वहाँ न 'सजातीय भेद' है, न 'विजातीय' भेद है और 'स्वगत' भेद भी वहाँ नहीं है। इस प्रकार वह
भेदरहित ही रहता है। ऐसा जो भेदरहित है वही प्रकृति पुरुषों का ईश्वर है। वही सबका श्रेष्ठ नियंता तथा 'पर'
और 'अवर' है। उसके सम्बन्ध में भी निर्णय सुन लो। मनरहित संकल्प से जिसने प्रकृति और पुरुष को उत्पन्न
किया वही वास्तव में ईश्वर है। उसी के सामर्थ्य से वे व्यवहार करते हैं। प्रकृति को चेताती सत्ता ही उसका
पुरुषत्त्व है। इसीलिये प्रकृति का पति सभी दृष्टि से यही है। ब्रह्मदेवादि देवता 'पर' है तथा मनु से लेकर स्थावर
तक सभी जीव 'अवर' हैं। इनका नियंता और चालक वही है। उसकी आज्ञा के बिना वायु भी नहीं हिलता, समुद्र
अपनी मर्यादा में रहता है और सूर्य दिनमान नियंत्रित करता है। जिसकी आज्ञा को नमन कर प्राण भी (नाक में)
बारह अंगुल तक ही घूमता रहता है। आज्ञा के भय से उसके आगे नहीं जा सकता। कठोर आज्ञा को ध्यान में
रखकर मेरु भी अपना स्थान नहीं छोड़ता। चेतनशक्ति को आज्ञा मिलते ही वह अचेतन देह को सचेतन कर
डालती है। वह स्वयं निराधार होते हुए भी सारे विश्व के लिये आधार बन गया है उसी प्रकार जैसे सर्पाभास के
लिये रस्सी का ही आश्रय रहता है। सत्त्व आदि जो गुणशक्ति है वह आत्मकाल गति को नियंत्रित कर उसे
समस्थिति में ला कर रखती है। वही प्रकृति अदृश्य रूप में निर्गुण स्थान में रहती है। जिस प्रकार वटवृक्ष अपने
बीज में समा कर रहता है उसी प्रकार समस्त उपाधियों को निगल कर ब्रह्म केवल निरुपाधिक स्वरूप में रहता है।
जिस प्रकार मंदराचल न होने पर क्षीरसागर निश्चल रहता है, अथवा विभिन्न आकार के अलंकारों को भट्टी में
डालने पर वह मूल सुवर्ण की तरह हो जाता है अथवा जिस प्रकार सूर्य अपने तेज से आकाश के समस्त नक्षत्रों
को तेजहीन कर देता है उसी प्रकार माया के कारण आकार लेने वाली सारी सृष्टि लुप्त होकर केवल निरुपाधिक
परमात्मा ही शेष रह जाता है अथवा ग्रीष्म ऋतु के अन्त में जिस प्रकार सभी प्रकार के बीज पृथ्वी में लीन हो
जाते हैं उसी प्रकार प्रकृति उसमें लीन होकर वह केवल सुखस्वरूप में शेष रहता है। ऐसा केवल निरुपाधिक,
सुखस्वरूपानंद का कल्लोल, चिन्मात्र तेज से तेजयुक्त तथा सद्-अंश के कारण निरन्तर निर्मल उस ज्ञानस्वरूप
अनन्त ने उत्पत्ति काल में सृष्टि की रचना कैसे की उसे भी ध्यानपूर्वक श्रवण करो।
केवलात्मानुभावेन स्वमायां त्रिगुणात्मिकाम्।
संक्षोभयान् सृजत्यादौ तय सूत्रमरिंदम॥ १९॥
तामाहुस्त्रिगुणव्यक्तिं सृजन्तीं विश्वतोमुखम्।
यस्मिन् प्रोतमिदं विश्वं येन संसरते पुमान्॥ २०॥
उसने अपनी कालसत्ता से अपनी माया की ओर देखा तो वह क्षुब्ध हो गयी और उसने निजसूत्र अर्थात्

२२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
वायुरूप सूत्रात्मा को उत्पन्न किया। इसी को क्रिया शक्ति कहते हैं। उसी क्रियाशक्ति ने तीन गुण व्यक्त किये और
अहंकार के द्वारा जगत की उत्पत्ति का मूल निर्माण किया। तप गुणादिक्रम से देवता, मनुष्य तथा नाग उत्पन्न
होकर 'अध' अर्थात् पाताल लोक, 'ऊर्ध्व' अर्थात् 'स्वर्गलोक' और मध्य अर्थात् मृत्युलोक, इस प्रकार त्रिभुवन
की रचना हुई। ब्रह्माण्ड का वही वायुरूप सूत्र प्राणरूप से पिण्ड को सँभालने लगा। जान लो कि पिण्ड और
ब्रह्माण्ड की रचना करने वाली वही 'क्रियाशक्ति' है। जीव को संसारी बनाने के लिये ही उसने शरीर में
षड्विकारों का संचार किया। उसी प्रकार छह उर्मि अर्थात् जन्म, मरण, क्षुधा, तृष्णा, शोक, मोह उत्पन्न किये।
इस प्रकार संसार की वृद्धि करने का ही इसका सारा प्रयास है। इसीलिये सांख्यशास्त्र में इसका उल्लेख
'क्रियाशक्ति' के नाम से किया जाता है। 'क्रियाशक्ति' के इस युग में ही मानों सारा संसार उड़ेला हुआ है। वह
टेढ़ा-मेढ़ा जैसा भी हो अपने ही स्थान पर बढ़ता रहता है। वही क्रियाशक्ति देहाभिमान की गाँठ कसकर बाँधकर
जन-जन को संसारी बनाकर छोड़ती है। प्रचण्ड वासना उत्पन्न कर अनेक प्रकार की योनियों में जन्म धारण
कराती है। पिता के वीर्य में माता के रुधिर का मिश्रण बनकर वह मिश्रण काफी समय तक जठराग्नि के ज्वाला
में उबलता रहता है। वहाँ उसमें अवयवरूपी अंकुर निकलते हैं और हस्तपादादि अवयव तैयार होते हैं। फिर देह
को आकार प्राप्त होता है। फिर भी यातनायें नहीं टलतीं। वे अपार रहती हैं। पेट में गर्भ का गोला उबलता रहता
है तभी अनेक प्रकार के दुःख उपस्थित हो जाते हैं। नाक में और मुँह में विष्ठा, जंतु, आदि का प्रवेश होता रहने
के कारण वह मस्तक झाड़ने लगता है। गर्भ की वेदना अत्यंत भयंकर होती है। उसका स्मरण होते ही मन भय
से काँपने लगता है। योनि द्वार से जन्म होता है, उस समय भी जीव को अनेक यातनायें होती हैं। इस प्रकार माया
जन्म देकर कभी तो स्वर्ग के कारागार में डालती है या फिर देहाभिमान से नरक में ही तड़पता छोड़ती है। इस
प्रकार सुख-दुःख की कड़ियों से बनी बेड़ी ठोंक कर दुःख की राशि भोगने के लिये बाध्य करती है। फिर भी
अविद्या से छुटकारा नहीं मिल पाता। माया का यह जाल महाभयंकर है। लेकिन हे राजा! तुम्हें उससे भयभीत
नहीं होना चाहिये क्योंकि तुमने दृढ़ अनुताप किया है तथा अभिमान और दर्प का विनाश कर दिया है। तुम्हारी
पूरी स्थिति ही बदली हुई लग रही है। तुम्हारे हृदय में चिच्छक्ति प्रकट होकर, अविद्या की रात्रि समाप्त होकर
ज्ञानरूप सूर्य का उदय हुआ है। जहाँ अभिमान ही नष्ट कर दिया जाता है वहाँ कामादिक शत्रु भी नष्ट हो जाते
हैं, उसी प्रकार जैसे शिरच्छेद करने पर हाथ-पैर अपने आप ही नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार मैंने तुम्हें 'अरिमर्दन'
कहा था, वह बिलकुल सत्य है। अवधूत का यह भाषण सुनकर राजा को बहुत संतोष हुआ। अवधूत भी प्रेम से
विह्वल हो गया और उसने राजा के मस्तक पर हाथ रखकर उसे आलिंगन दिया। तब राजा को अत्यन्त धन्यता
मालूम हुई। निजआत्मबोध से दोनों का मिलन हुआ। उनकी प्रसन्नता मानों आकाश में भी नहीं समा रही थी जो
वास्तव में भाग्यवान है उसे ही इस प्रकार सद्गुरु की भेंट होती है। बालक का कौतुक करने से जिस प्रकार माँ
को प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार शिष्य को आत्मबोध होते ही सद्गुरु को भी अत्यन्त आनन्द होता है। इस प्रकार
परस्पर संवाद चल रहा था, तभी परमानन्द बहने लगा। उसी आनन्द के आवेग में अवधूत आगे की कथा का
संवाद और भी स्पष्ट करके बतलाने लगा।
यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णां संतत्य वक्त्रतः।
तया विहृत्य भूयस्तां ग्रसत्येवं महेश्वरः ॥ २१॥
'ऊर्णनाभि' का अर्थ है 'मकड़ी'। मकड़ी अपने पेट में के तन्तु मुँह से बाहर निकालकर उसका जाल
तैयार करती है। फिर उन फैले हुए तन्तुओं पर स्वयं ही अपनी इच्छानुसार क्रीड़ा करती है। उन तन्तुओं के जाल

नवाँ अध्याय २२१
से खेलते-खेलते वह देखते-देखते सारे तन्तु निगल लेती है और अद्वैतकला का प्रदर्शन करती है। इसी प्रकार
सर्वेश्वर भी स्वयं ही संसार की रचना कर, अन्त में उन सबका संहार कर निर्विकार आत्मस्वरूप में शेष रहता
है। इसी लक्षण को ध्यान में रखकर मैंने उस ऊर्णनाभी को गुरु बनाया। अब सारूप्यता का विचार कर मैंने भ्रमरी
को अपना गुरु माना।
यत्र यत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया।
स्नेहाद्द्वेषाद् भयाद् वापियाति तत्तत्स्वरूपताम्॥२२॥
पुरुष काया, वाचा तथा मन को एकाग्र कर जिस वस्तु का ध्यान करता है उस वस्तु का स्वरूप उसे प्राप्त
होता रहता है। स्नेह, द्वेष अथवा भय से जिस भी किसी वस्तु की उत्कंठा बनी रहती है, उससे उसे तद्रूपता प्राप्त
होती है। देह नष्ट होने के बाद तद्रूपता आयेगी यह कहना व्यर्थ है। उसी देह से यहाँ रहने पर ही तद्रूपता प्राप्त
होती है।
कीटः पेशस्कृतं ध्यायन् कुड्यां तेन प्रवेशितः।
यातितत्सात्मतां राजन् पूर्वरूपमसंत्यजन्॥२३॥
भिंगुरटी एक कीट पकड़ कर लाती है और उसे दीवार से सटे नीड में बन्द करके रखती है। इसलिये उसे
रातदिन उसके मरने की चिन्ता लगी रहती है। उस की उस तीव्र चिन्ता से ही वह क्रीडा स्वयं भिंगुरटी बन जाती
है और तत्काल आकाश में उड़ जाती है यह हम अपनी आँखों से स्वयं देखते हैं। भिंगुरटी एक क्षुद्र कीट है,
उसका ध्यान करने वाली कीट भी जड़मूढ़ है लेकिन उसे भी तीव्र ध्यान करने से भिंगुरटी का रूप प्राप्त होता है।
वह अजड़ है, विद्रूप है, सौख्यदाता है, उसका ध्यान करने वाला भी ज्ञाता और अधिकारी है। ऐसा व्यक्ति यदि
ध्यान करे तो वहाँ तद्रूप होने में जरा भी विलम्ब नहीं होगा। कीट को भिंगुरटी का रूप प्राप्त होता है, अर्थात्
केवल तीव्र ध्यान करने से न हो सकने वाली बात हो जाती है। विचार करने पर मालूम होता है कि वे दोनों ही
जड़ हैं, अर्थात् जड़ ही जड़ को जकड़ता है। लेकिन भगवान के ध्यान की बात ऐसी नहीं है क्योंकि ध्यान करने
वाला मूलतः भगवद्रूप ही होता है, ध्यान करने से केवल उसका यह भ्रम कि 'मैं देही' हूँ नष्ट हो जाता है।
इसलिये वह अनायास ही तद्रूप हो जाता है। इसी देह में और इसी वृत्ति में से अपनी मुक्ति जिसकी समझ में नहीं
आती और जो भगवत्प्राप्ति नहीं कर लेता तो फिर नरदेह की विद्वता व्यर्थ है। यदि वह चैतन्य धन नहीं होगा, तो
उसका ज्ञान, ध्यान, भजन, याजन और धर्माचरण आदि सब व्यर्थ है।
एवं गुरुभ्य एतेभ्य एषा मे शिक्षिति मतिः।
स्वात्मोपशिक्षितां बुद्धिं शृणु मे वदतः प्रभो॥२४॥
अवधूत यदु से कहता है—इतने गुरुओं से मैंने स्वबुद्धि से जो कुछ सीखा, वह सब तुम्हें बताया। मैंने
अपनी ही बुद्धि से और युक्ति से और भी कितने ही गुण सीखे हैं वह भी तुम्हें अनन्य प्रीति के कारण बताऊँगा।
चौबीस गुरुओं का गुरु जो समर्थ वैराग्य विचार है, वह इस नरदेह में ही प्राप्त होता रहता है, इसलिये नरदेह ही
मुख्य गुरु है।
देहो गुरुर्मम विरक्तिविवेकहेतुर्विभ्रत् स्म सत्त्वनिधनं सततार्त्युदर्कम्।
तत्त्वान्यनेन विमृशामि यथा तथापि पारक्यमित्यवसितो विचराम्यसङ्गः॥२५॥

२२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
हे चतुरश्रेष्ठ! देह को जो गुरुत्व प्राप्त हुआ है, वह दो प्रकार से है। परमार्थ की रक्षा करने के लक्षण भी
तुम्हें बताता हूँ। देह जैसी खराब वस्तु पृथ्वी पर कहीं भी नहीं है लेकिन उसी प्रकार देह जैसी अच्छी चीज भी
त्रिभुवन में अन्यत्र नहीं प्राप्त होगी। यदि खराब कह कर उसका त्याग करें तो मोक्षसुख से वंचित हो जाते हैं
और अच्छा कह कर उसका उपभोग करें तो तत्काल नरक में जाना पड़ता है। इसलिये न उसका त्याग ही करना
चाहिये और न भोग ही करना चाहिये। उसे दोनों अवस्थाओं के बीच ही नियंत्रित करके रखना चाहिये। अर्थात्
उसे अपने हित के लिये आत्मसाधन में ही रखना चाहिये। जिस प्रकार गंतव्य स्थान तक पहुँचने के लिये
किराये के घोड़े को वहाँ तक ले जाना पड़ता है और इसके बाद हमें उसकी चिन्ता नहीं रहती, उसी प्रकार
परमार्थ को ध्यान में रखकर घर संसार में किसी उदासीन राही की तरह बस्ती करनी चाहिये। देह के प्रति
आसक्ति का विचार बुद्धि तक नहीं पहुँचना चाहिये। देह की स्थिति नश्वर है और नश्वरत्व के कारण ही विराग
उत्पन्न होता है। जो मुमुक्षु हैं वे किसी भी प्रकार के नाशवान वस्तु पर आसक्ति नहीं रखते और जिससे विरक्ति
उत्पन्न होती है वही वास्तव में विवेक है। सारांश, विवेक और वैराग्य की प्राप्ति अपने ही विचारों से नरदेह में
होती है। अन्य देहों में इस प्रकार का विचार ही नहीं होता क्योंकि अन्य देहधारी प्राणी केवल शिश्नोदर का ही
व्यवसाय करते हैं। इसीलिये नरदेह एक अमूल्य निधि है। उसके योग से ब्रह्मसायुज्य में जाया जा सकता है।
इसलिये देवता भी नरदेह का वर्णन कर मनुष्य होने की कामना करते हैं। इससे यदि तुम यह विचार करोगे कि
नरदेह अत्यन्त पवित्र है, तो ऐसी बात नहीं है। उसे अत्यन्त निन्दनीय समझो क्योंकि उसका जन्म योनी द्वार से
होकर मृत्यु उसका पीछा करती रहती है। प्राणी ने पूरी तरह जन्म लिया भी नहीं होता तभी मृत्यु उसके पीछे
लग जाती है। गर्भ में भी मृत्यु का भय लगा रहता है। सारांश, इस देह के साथ मृत्यु चिपका हुआ है। वह
बाल्यावस्था में भी रहता है और यौवन में भी सट कर बैठता है। ऐसा होते हुए भी मनुष्य अपनी मृत्यु के बारे में
भूलकर अपने यौवन का अभिमान करता है। चतुर, बुद्धिमान, ज्ञाता, बलवान सब कुछ मैं ही हूँ यही कहता
रहता है। तभी काल उस यौवन के ताजा फल को बिना डंठल तोड़े ही निगल लेता है। फिर वृद्धावस्था से जर्जर
होकर मृत्यु को प्राप्त करता है। सफेद बालों के साथ वृद्धावस्था का आगमन होता है और मृत्यु प्रतीक्षा करती
रहती है। जब सारा शरीर काँपने लगे तभी मृत्यु की आहट समझ लेनी चाहिये और जब गर्दन काँपने लगे तो
समझना चाहिये कि मृत्यु की सवारी आ रही है। शत्रु की सेना सुगमता से भीतर प्रवेश कर सके इसलिये काल
सारे दाँत गिरा कर मार्ग प्रशस्त कर देता है। कमर टेढ़ी हो जाती है उसे मृत्यु की ही निशानी समझना चाहिये।
दोनों कानों में कील ठुक जाती है। मृत्यु आने वाली है इसलिये नेत्रों की ज्योति उसकी अगवानी करने जाती है,
फिर आप उसमें अंजन डालिये या और कुछ कीजिये लेकिन अक्षर भी नहीं दिखायी देते। रातभर खाँसते रहने
से पड़ोसियों को भी कष्ट होता है और वे कहने लगते हैं यह बुड्ढा मरता भी नहीं है, व्यर्थ ही हमारे बच्चों की
नींद खराब करता है। मृत्यु की बाढ़ आते ही पैर लड़खड़ाने लगते हैं, जीभ लड़खड़ाने लगती है और शरीर की
नाड़ियाँ टूटने लगती हैं। यदि मृत्यु शीघ्र नहीं आयी तो वृद्धावस्था की विडम्बना अत्यन्त खराब रहती है। पत्नी,
बच्चे तथा अन्य लोग भी पास नहीं आते। उस समय जीना अत्यन्त दयनीय हो उठता है। जब देह को वृद्धावस्था
जकड़ लेती है तो जीवनभर जिनका परिश्रमपूर्वक पोषण किया है वही पास आने से कतराते हैं। उसकी बात भी
कोई नहीं सुनता, सब उसका तिरस्कार करते हैं और कुत्ते उसके पीछे भौंकते हैं। जानकार लोग बच्चों को उसे
भूत कह कर डराते हैं। खाँसी तो क्षणभर के लिये भी शान्त नहीं बैठने देती और जी व्याकुल होने लगता है।
जिसने बचपन में उसे 'वृद्ध होने' का आशीर्वाद दिया था वह वास्तव में शाप ही था। वृद्धावस्था की तरह अन्य

कोई दुःख नहीं है। युवावस्था में वृद्धावस्था का दुःख देखकर यह जान लेना चाहिये कि यह दुःख कल मेरा भी
हाथ पकड़ लेगा। देह षड्विकारों से भरा हुआ है। उसके प्रत्येक विकार में अनेक अनर्थ हैं। इसके अतिरिक्त
जिस प्रकार अग्नि में घी डाला जाय उसी प्रकार उनमें छह ऊर्मी लगी हुई हैं। इस दुःख का जो मूल है वह इस
देह के बहुत लाड़ करता है। इसलिये उस देह का पोषण करने से दुःख बढ़ता है और महादुःख की फल प्राप्ति
होती है। सारांश, देह की संगति निरन्तर दुःखदायी है यह जानकर उसकी आसक्ति छोड़ देनी चाहिये। विरक्ति
मन में प्रतिपादित करने के लिये देह गुरु का काम करता है। इस देह की सहायता से ही अविनाश पद की प्राप्ति
होती है। इस गुण के कारण भी देह को गुरु कहना चाहिये। देह उपकार भी करता है और अपकार भी। उसमें
दोनों ओर से गुरुता है। इसका विचार कर जो चतुर पुरुष अपना हित साध लेता है, वह धन्य है। तात्त्विक दृष्टि
से विचार करने पर ज्ञात होता है कि अज्ञान ही इस देह का मूल है और आत्मस्वरूप का न दिखायी देना ही
प्रकृति का आभास होना है। प्रकृति के कारण ही त्रिसूत्र की उत्पत्ति होती है, तीन गुणों से तीन प्रकार के
अहंकार उत्पन्न होते हैं और वहीं से महद्भूतों का विकार उत्पन्न होकर देह के साथ इन्द्रियों के व्यापार चलते हैं।
अर्थात्, रस्सी के कारण सर्प तो हुआ ही नहीं केवल भ्रम के कारण उसे सर्प कहते हैं। उसी प्रकार ब्रह्मवस्तु पर
पिण्ड-ब्रह्माण्ड का आरोप किया जाता है। देह का मूल यदि देखा जाय तो वह मृगजल की तरह लगता है,
सर्वत्र भ्रम का ही जाल फैला हुआ है। परब्रह्म के प्रति यह केवल आरोप है। देह न होते हुए भी उसका आभास
होता है, इसे आरोप कहते हैं। अब 'अपवाद' किसे कहते हैं यह भी बताता हूँ। मन को एकाग्र करके श्रवण
करो। देह के पंचभूतात्मक होने की बात प्रसिद्ध है। उसे 'मैं' कहना बुद्धिसंगत नहीं है क्योंकि देह मलिन है
और मैं शुद्ध हूँ। देह और मैं परस्पर अत्यन्त विपरीत हैं। मैं पृथ्वी नहीं हूँ क्योंकि वह जड़ होती है। मैं जल नहीं
हूँ क्योंकि वह द्रव रूप होता है। मैं तेज नहीं, क्योंकि उसमें दाहकता होती है। उसी प्रकार मैं वायु भी नहीं हूँ
क्योंकि उसमें चंचलता होती है। मैं आकाश नहीं क्योंकि वह शून्य होता है। 'अहं' भी मैं नहीं हूँ क्योंकि वह
दृश्य है। मैं जीव नहीं हूँ क्योंकि वह एकदेशी है। उसी प्रकार मैं माया भी नहीं हूँ, क्योंकि वह मिथ्या है। नश्वर
होने के कारण मैं देह नहीं हूँ बाधकत्व के लिये मैं विष नहीं हूँ। सारांश, इन तत्त्वों का और मेरा यहाँ सम्बन्ध
नहीं है। 'मैं ब्रह्म हूँ' यह अभिमान हंस और परमहंसों को भी रहता है। लेकिन वह भी सत्त्वावस्था का साधन
है। वह अभिमान भी मैं नहीं। जिन तत्त्वों का ऊपर वर्णन किया है उन सबका मुझमें 'अपवाद' अर्थात् अभाव
है। हे यदु ! इस प्रकार मेरी बुद्धि को जो बोध हुआ है वह मैंने तुम्हें बतलाया तुम्हारी अनन्य भक्ति और भाव
देखकर मैंने यह सारा गूढ़ ज्ञान तुम्हें बतलाया अन्यथा यह सब बतलाने की मुझे कोई आवश्यकता नहीं थी।
किन्तु हे भाग्यवान राजा ! तुम्हारी यह आस्था ही मुझे तुम्हारे पास बुलाती है। इस प्रकार संवादसुख की
एकतानता में ही उन्होंने अद्वैत बोध से सानंद ताली बजायी और आनन्द के अतिरेक के कारण दोनों ब्रह्मस्वरूप
में लीन हो गये। अवधूत ने कहा, इस देह जैसा उपकारी मित्र कोई नहीं है इसलिये उसे जतन करके रखना
चाहिये। लेकिन वह तो मूलरूप में पराया ही है। उसका अच्छी तरह जतन करने से उसका अन्त भयंकर होता
है। वह श्वान, शृगाल का भोजन बन जाता है अथवा अग्नि की आहुति बन जाता है। यदि इन दोनों अवस्था से
बच निकला तो वह कृमि कीटकों का शिकार हो जाता है। इन तीन के अतिरिक्त देह की कोई चौथी अवस्था
नहीं है। इसलिये हे राजा ! मैं देह के प्रति आसक्ति ही नहीं करता। आत्मस्वरूप के ज्ञान से मैं निःसंग होकर
पृथ्वी पर घूमता हूँ। देह के उपभोग के जितने साधन हैं वे सब बन्धन ही हैं इसे ध्यान में रखो। उसके योग से
वासना प्रबल होकर असीमित रूप से बढ़ जाती है।

२२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जायात्मजार्थपशुभृत्यगृहाप्तवर्गान् पुष्णाति यत्प्रियचिकीर्षया वितन्वन्।
स्वान्ते सकृच्छ्रमवरुद्धधनः स देहः सृष्ट्वास्य बीजमवसीदति वृक्षधर्मा ॥ २६॥
देहभाग का प्रमुख आकर्षण है स्त्रीभोग ! सब कुछ खर्च कर अपने साथी के रूप में पत्नी ले आते हैं।
लेकिन स्त्री से पाणिग्रहण करते ही प्रपंच का दुःख बढ़ने लगता है। उस स्त्री के उपभोग के लिये घर बनाना
आवश्यक हो जाता है। घर ठीक तरह से चले इसके लिये धन-धान्य आदि समृद्धि की आवश्यकता होती है।
फिर बाल बच्चे पैदा होने पर प्रपंच बढ़ते ही अपार चिन्ता उत्पन्न होती है। उन बाल बच्चों के प्रति वात्सल्य
उत्पन्न होता है। उनके लिये नौकर-चाकर, दास-दासी, जानवर आदि रखने पड़ते हैं। इसके लिये कठिन कष्ट
सहने पड़ते हैं। सुख का एक क्षण भी नहीं मिलता। समधी और दामाद का आकर्षण उत्पन्न होता है, सगे-
सम्बन्धियों के झुण्ड एकत्र होते हैं। उनका उचित स्वागत-सत्कार करने में अनेक संकट आते हैं और वह सब
सहते-सहते देह चूर-चूर हो जाता है। आश्रित परिवार का पोषण करने के लिये अनेक उपाय करता है, देश-
परदेश में भटकने लगता है और रात-दिन परिश्रम करके हैरान हो जाता है। शरीर को सुख देने के लिये कई
गुना दुःख बढ़ाता रहता है। मूर्ख लोगों का यह ढंग ही है कि वे देह के अहंकार के कारण व्यर्थ की
अभिलाषा बढ़ाते हैं। देहसुख की इच्छा से जमीन, जायदाद आदि की बेड़ी पैरों में पड़ती है। घर-बार, स्त्री-
पुत्रों का प्रेम उसे पागल कर देता है जिससे वह अपना स्वार्थ नहीं जान पाता। घरबार, बच्चे, सम्पत्ति आदि
का लोभ शरीर ने बढ़ाया रहता है। वही वासना देह के अन्त समय में दूसरे जन्म की प्राप्ति का बीजारोपण
करती है। ज्वार का दाना बाली पर चढ़ता है और फिर बाली से अलग होकर धरती पर गिर पड़ता है, पेड़
टूट जाता है किन्तु बीज धरती के भीतर शेष रहता है। उस बीज को जल और धरती मिलते ही तत्काल दूसरा
पेड़ बढ़ने लगता है। उसी प्रकार दूसरा जन्म लेने के लिये यह वासना शेष रहती है। उस पेड़ की ही तरह
बीज लिंगदेह में शेष रहता है और योनि के द्वार से पुनः जन्म दिलाता है और स्वर्ग या संसार का भ्रमण
कराता है। देह में वासना किस प्रकार बढ़ती है यह भी तुम्हें बताऊँगा। आसक्तिपूर्वक विषयों का सेवन करने
से वासना असीमित बढ़ जाती है।
जिह्वैकतोऽमुमपकर्षति कर्हि तर्षा शिश्नोऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवणं कुतश्चित् ।
घ्राणोऽन्यतश्चपलदृक् क्व च कर्मशक्तिर्बह्वयः सपत्न्य इव गेहपतिं लुनन्ति ॥ २७ ॥
जिह्वा रस की ओर आकर्षित होती है, तृष्णा प्राशन करने के लिये लालायित रहती है, शिश्न को रतिसुख
की चाह होने के कारण वह उसमें रममाण होने के लिये छटपटाता रहता है। त्वचा मृदुता चाहती है, उदर भरपेट
अन्न मिलने की इच्छा करता रहता है। कान गान, मंजुल, ध्वनि, आलाप आदि की आकांक्षा करते रहते हैं। नाक
सुगन्ध के लिये उद्यत रहते हैं। अच्छा रूप देखने के लिए आँखें लालायित रहती हैं। अनेक प्रकार की क्रीड़ाएँ
करने के लिये हाथ बेचैन रहते हैं। पैर भ्रमण करना चाहते हैं। जिस प्रकार घर में एक पति को अनेक पत्नियाँ
रहने पर सौतें आपस में खींचतान करती रहती हैं उसी प्रकार इन्द्रियों को विषय की आसक्ति होने के कारण वे
उसे अपनी ओर खींचती रहती हैं। इस प्रकार इन्द्रियों को विषय की आसक्ति होने के कारण वासना भी प्रबल
होती रहती है। वास्तव में ये वासनायें ही पुरुष को इस देह से उस देह में ले जाती रहती है। इसलिये विषय का
त्याग करने के लिये देहसंग बिलकुल छोड़ देना चाहिये। ऐसा करने के लिये मनुष्य देह ही उत्तम है क्योंकि
ज्ञानप्राप्ति इसी देह में है।

नवाँ अध्याय २२५
सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयाऽऽत्मशक्त्या वृक्षान् सरीसृपपशून् खगदंशमत्स्यान्।
तैस्तैरतुष्टहृदयः पुरुषं विधाय ब्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देवः॥ २८॥
अपने इसी स्वरूप को लोग जान सकें इसलिये श्रीअनंत ने सृष्टि के प्रारम्भ में अपनी माया के हाथों अनेक
प्रकार के शरीरों का निर्माण किया। जमीन पर चलने वाले कुछ लोग तैयार किये, कुछ आकाश में विचरण करने
वाले तैयार किये, कुछ पानी में तैरनेवाले तैयार किये तो कुछ स्थावर तथा कुछ जंगम शरीर तैयार किये। वृक्ष,
सर्प, पशु, दंश करने वाले प्राणी, राक्षस, पिशाच, बगुले, हंस, मछली, कछुए आदि समस्त योनियाँ उसी ने
बनायीं। ऐसी चौरासी लाख योनियाँ तैयार कर लेने के बाद जब उसने उनकी ओर आँख उठाकर देखा तो उसमें
उसे आत्मप्राप्ति कर लेने वाला कोई अधिकारी नहीं दिखायी दिया। ऐसी सृष्टि देखकर भगवान को समाधान
नहीं हुआ इसलिये उसने बड़ी आस्था से मानव देह की रचना की और उस मनुष्य में उसने अपना बहुत सा ज्ञान
भर दिया। इसी ज्ञान से वे इस देह में रहकर विदेहास्थिति तक पहुँचते हैं। आहार, निद्रा, भय और मैथुन ये सारी
योनियों के लिये एक जैसे हैं। किन्तु मनुष्य देह में का ज्ञान उन सबमें विशेष है। ऐसे उस मनुष्य देह को देखकर
भगवान को सन्तोष हुआ क्योंकि इसी देह को ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने का अधिकार है और इसी देह से मेरी प्राप्ति
होने लायक है ऐसा उसे लगा। मनुष्य योनि में जन्म लेकर भी जो ब्रह्मज्ञान नहीं प्राप्त करेगा वह दाढ़ीरहित भेड़
की तरह है। मनुष्य देह के ज्ञान से सच्चिदानंद पद की प्राप्ति की जा सकती है, इतना अधिकार नारायण ने
कृपापूर्वक हमें दिया है। मनुष्य देह में ही यदि ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना है तो वह मैं अगले जन्म में प्राप्त करूँगा,
ऐसा जो कहता है वह डूब गया ऐसा समझना चाहिये। उसका असली अज्ञान यही है।
लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः।
तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु यावन्निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात्॥ २९॥
चौरासी लाख योनि के जब कोटि-कोटि फेरे होते हैं तब सौभाग्यवश अकस्मात इस नरदेह की प्राप्ति होती
है। जो मनुष्यदेह में जन्म लेता है वह परमार्थ को आलिंगन देता है। ऐसा अलभ्य लाभ हुआ देख उसके पितर
भी बहुत बड़ा उत्सव मनाने लगते हैं। यदि यह कहें कि मनुष्यदेह प्राप्त करने के बाद पहले सारे भोग भोग लें
और फिर आराम से परमार्थ के बारे में विचार करें तो यहाँ इस बात का विश्वास नहीं है क्योंकि मृत्यु निश्चित
और अनिवार्य है। मृत्यु न किसी के गुणों का विचार करती है न दोषों का, देश और परदेश की चिन्ता नहीं
करती, दिन या रात का विचार नहीं करती, सीधी विनाश ही करती है। मेंढक को पकड़ने के बाद जिस प्रकार
साँप उसे निगलने लगता है उसी प्रकार जब से देह उत्पन्न होता है तब से मृत्यु उसका पीछा करती ही रहती है।
साँप मेंढक को निगलता रहता है और मेंढक मक्खियाँ पकड़ता रहता है। उसी प्रकार मृत्यु के मुख में पड़े हुए
लोग विषय के भुलावे में पड़े ही रहते हैं। इसमें जो आलस करता है वह पूरी तरह डूब ही जाता है। उसके हाथ
आया परमार्थ छूट कर वह संसार चक्र के भँवर में गोता खाता रहता है। हे यदुराजा इन सारी बातों का विचार
कर इसी देह से शीघ्रता से परमार्थ का लक्ष्य साधने के लिये तत्पर रहना चाहिये। आलस झटकार कर, नींद को
दूर हटा कर रात दिन आत्मचिंतन करते रहना चाहिये। वीर क्षत्रिय जिस प्रकार शत्रु पर विजय प्राप्त करने से
पहले विश्राम नहीं करते, उसी प्रकार, उसी तेजी से परमार्थ के पीछे लगना चाहिये। अधिक उम्र बीत जाने पर
वर का मन जितना सावधान रहता है उसी प्रकार हमें सायुज्य लग्न होने तक सावधान रहना चाहिये। राजा का
एकमेव लड़का खो जाने पर जिस प्रकार राजा उसे अपने सारे राज्य में खोजता है, उसी प्रकार हमें अपना

[२२६] श्रीमद् एकनाथी भागवत

निजसुख साधने का प्रयत्न करना चाहिये। काल का प्रहार होने से पहले ही परमार्थ साधने में सारा जीवन खर्च
कर देना चाहिये। समय व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिये। किन्तु नरदेह के अनमोल जीवन में, गृहस्थी की आशा में,
विषय की लालसा में लोग भोग में लिप्त हो गये हैं। पशु आदि योनियों में विषय के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं
है। यदि उसी विषय को नरदेह में भी पुष्ट करें तो इससे क्या लाभ होगा? यदि विवेकपूर्वक विचार करें तो
विषय तो भाग्य से ही मिलते रहते हैं। उसके लिये व्यर्थ परिश्रम करने से मूल नरदेह का ही नाश होता है। नरदेह
अत्यन्त पवित्र है। वह प्राप्त होने पर भी जो ब्रह्मज्ञान साध्य नहीं करता उसे पुच्छ विहीन पशु ही समझना
चाहिये। अपरोक्ष ज्ञान के अतिरिक्त केवल पेट के लिये ढोंगी ज्ञान के लिये प्रयास करना वैसा ही है जैसे मर्कट
दारू पीकर उछलता रहता है। ब्रह्मज्ञान प्राप्त किये बिना जो शास्त्र ज्ञानी हो गये उन्हें अँधेरे में चमकने वाले
जुगनू की तरह समझना चाहिये। अज्ञानरूपी अँधेरे में वे खूब चमकते हैं लेकिन सूर्योदय हो जाने के बाद उन्हें
कौन पूछता है? ब्रह्मज्ञान के बिना संन्यासी नाटक के संन्यासी की तरह है जो मिष्ठान्न की भिक्षा के लिये
लालायित रहते हैं। मन में विषय की अभिलाषा रखकर जो वेदाध्ययन करते हैं उन्हें बरसाती मेढ़क के समान
समझना चाहिये। मेंढ़क कीचड़ खा कर 'टर्राँव टर्राँव' करते रहते हैं वैसी ही उनकी अवस्था रहती है। विषय
प्राप्ति के लिये रखा हुआ मौन बगुले के ध्यान की तरह है और विषयबुद्धि से किया हुआ गायन उसी प्रकार है,
जैसे गधी को देखकर गधा चिल्लाता है। विषय के लिये प्रवचन आदि करना उसी प्रकार है जैसे भात की हाँडी
देखकर कौए कोलाहल करते हैं। जिस प्रकार भाँड पेट के लिये जो मन में आये वह बकते रहते हैं, उसी प्रकार
विषय प्राप्ति के लिये शास्त्रों का उल्टा-सीधा अर्थ बताकर वितंडावाद बढ़ाते हैं। मन में विषय की दृढ़ भावना
रखकर ऊपर से सदाचार का स्वांग भरते हैं। यह कुछ वैसा है जैसे कौआ बाहर से शुद्धता का ढोंग करता है और
भीतर विष्ठा चिन्तन करता है। वेश्या जिस प्रकार अपना देह विक्रय कर अपनी गृहस्थी चलाती है उसी प्रकार वे
अपनी उपजीविका के लिये अग्निहोत्र, यज्ञयाग आदि करते हैं। लेकिन चौथा पुरुषार्थ सिद्ध करना यही तो नरदेह
का सच्चा स्वार्थ है। उसे न साधकर कुछ दूसरा ही अर्थ साधना महा अनर्थ है यह समझना चाहिये। नरदेह प्राप्त
कर जो ब्रह्मज्ञान नहीं साध पाते उसे श्वान अथवा शृगाल अथवा उससे भी नीच स्तर का समझना चाहिये। उस
सम्बन्ध में विचार सुनो। पशु को लात मारिये तो भी वह उसका द्वेष नहीं करता। लेकिन मनुष्य को यदि 'तू'
कहो तो वह प्राण लेने के लिये उद्यत हो जाता है। पशु में संग्रह करने की लालसा नहीं होती। जितनां खाना है
खाता है और बाकी छोड़कर चला जाता है। लेकिन मनुष्य इतना लोभी है कि करोड़ों रुपया जेब में होने पर भी
पेटभर खा नहीं पाता। फिर कहीं किसी को देने की बात आ जाए तो प्राण ही चला जाएगा। पशुओं को सुबह या
सायंकाल के भोजन की चिन्ता नहीं रहती लेकिन मनुष्य की चिन्ता पूरे जन्म में भी नहीं छूटती। अपरिमित द्रव्य
साथ में हो तो भी अनिवार चिन्ता होती ही है। नरदेही प्राणी को सारे संसार में अविश्वास ही दिखायी देता है।
शरीर भले ही मरणासन्न हो गया हो लेकिन जमीन जायदाद लेता ही रहता है और नाती, पोतों के लिये मकान
बनवाता रहता है। ऐसी दुर्धर चिन्ता पशुओं को नहीं होती। अब तुम्हें मैथुन की वास्तविक स्थिति बताता हूँ। पशु
ऋतुकाल में ही मैथुन करते हैं और फिर स्त्री का स्पर्श नहीं करते लेकिन पुरुष प्रतिदिन स्त्रीसंग करते हैं,
गर्भावस्था में भी नहीं छोड़ते। काम, क्रोध, लोभ, निन्दा और अहंकार ये सब मनुष्य के ही भाग्य में हैं। इसलिये
आत्मज्ञान साध्य न कर केवल विषयी हो जाते हैं। वे श्वान और शृगाल से भी नीच है। उनमें मनुष्यता नाम की
वस्तु ही नहीं है। विषय में जो सुख है वह स्वर्ग और नरक दोनों में समान है। इस मृत्युलोक में जो विषयसुख
श्वान भोगता है वही सुख स्वर्ग में इन्द्र भोगता है। मनुष्य देह के अलावा जो पशु-पक्षी आदि अन्य योनियाँ हैं वे

नवाँ अध्याय २२७
विषयभोग के ही लिये हैं किन्तु नरदेह केवल विषयत्याग के लिये है। वह नरदेह कैसे प्राप्त होता है ? तो उसका
मिलना अत्यन्त कठिन है। उसका भी प्रकार तुम्हें बताता हूँ, ध्यान से सुन लो। पुण्य अधिक हो जाता है तो जीव
स्वर्ग में जाता है और पाप बढ़ जाता है तो वह नरक में जाता है। पाप और पुण्य जब पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं
तो मुक्ति प्राप्त होती है। जब पाप-पुण्य एक समान होते हैं तब मनुष्य देह प्राप्त होता है तथा कर्मभूमि में
आश्रमधर्म में बुद्धिमंत होकर जन्म लेता है। निश्चित रूप से मनुष्य देह प्राप्त करने के लिये कुछ किया नहीं जा
सकता। जिसका भाग्य उत्तम रहता है, उसे ही वह अकस्मात प्राप्त होता है। अमूल्य रत्न द्रव्य देकर क्रय किये
जा सकते हैं किन्तु चिन्तामणि हाथ नहीं आता उसी प्रकार अनेक योनियों में जन्म प्राप्त होता है लेकिन मनुष्य
देह मिलना अत्यन्त दुर्लभ है। ऐसा नरदेह प्राप्त होते हुए जो ब्रह्मसुख की साधना नहीं करता वह जन में महामूर्ख
तथा देवताओं में विश्वासघाती समझा जाता है। निजात्मप्राप्ति के लिये ही भगवान ने मनुष्ययोनि की योजना की
है। जो उसके विश्वास का घात करता है उसका पतन अवश्यंभावी है। पितरों की इच्छा यही रहती है कि हमारा
बेटा हरिभक्त हो तथा सारे कुल का उद्धार करे। लेकिन विषयासक्ति से वह सब पर पानी फेर देता है। (अवधूत
कहते हैं) मनुष्यदेह केवल सकल भाग्य का फल है, यह वचन सफल करने के लिये ही मैंने यह अटल वैराग्य
धारण किया है।
एवं संजातवैराग्यो विज्ञानालोक आत्मनि।
विचरामि महीमेतां मुक्तसङ्गोऽनहंकृतिः ॥ ३०॥
आत्मसाधना करने के लिये देह साधक है, किन्तु वही देह विषयभोग के कारण बाधक हो जाता है। यह
जानकर मैंने निश्चय करके वैराग्य धारण किया। उस वैराग्य के बल से तथा गुरुकृपा वचन की सहायता से
विषयों का इन्द्रियों से सम्बन्ध तोड़ दिया। जीव जैसे ही अविद्या को अंगीकार करता है वैसे ही वह अविद्या
कहती है, 'मैं तो विद्यमान' ही नहीं हूँ। यह मैंने अनुभव से जान लिया। इस प्रकार मिथ्यत्व से अविद्या नष्ट होने
के कारण चित्प्रकाश का पूर्ण लाभ प्राप्त हुआ और इससे देह में व्याप्त अहंता भी पूर्ण रूप से निकल गयी। ज्ञान
का साधन है अपनी देह, यदि उसके प्रति ही वैराग्य हो जाय तो देह के प्रति स्नेह कैसे उत्पन्न होगा ? इसी
अनुभव के कारण मैं निःसंग होकर पृथ्वी पर संचार करता रहता हूँ। स्वदेह में बिल्कुल ही अहंकार क्यों नहीं है
इसका उत्तर तुम्हें बताया। जब पुरुष की अहंता नष्ट हो जाती है तो देह भाग्य के अनुसार चलता है। उसी प्रकार
जैसे सूखा पत्ता वायु के धक्के से इधर-उधर लोटता रहता है। इसीलिये, हे वीर ! जब तक ब्रह्मसाक्षात्कार में वृत्ति
विलीन नहीं हो जाती तब तक जो सच्चे वैराग्य के साथ रहता है वही अव्यंग्य और परिपूर्ण पुरुषार्थी होता है।
अब शायद तुम कहोगे कि तुम्हें एक ही गुरु पर कभी विश्वास नहीं था तो उसके सम्बन्ध में सावधानीपूर्वक
सुनो। नमक और जल मिलकर जिस प्रकार समरस हो जाते हैं, उसी प्रकार गुरुवाक्य कान में पड़ते ही वृत्ति पूर्ण
रूप से लय हो जाती है। उसे साधक-बाधक से पीड़ा होती है यह कहना ही विसंगत है। जिस प्रकार मृत व्यक्ति
को औषधि या गर्भ को दूध नहीं पिलाया जा सकता उसी प्रकार उसके लिये कोई कर्त्तव्य शेष नहीं रहता है।
लेकिन ऐसी अवस्था सभी को प्राप्त नहीं होती। गुरु कान में गुरुमंत्र देता है और मन में आत्मस्वरूप का बोध
होता है लेकिन वह अधिक समय तक नहीं टिकता। बाह्य पदार्थ की ओर दृष्टि जाते ही विक्षेप उत्पन्न हो जाता
है। आसन पर बैठते ही स्वरूपस्थिति और आसन छोड़ते ही संसारस्फूर्ति। ऐसी एक देश स्थिति सच्चे योगी को
स्पर्श नहीं करती। देह आसन पर स्थिर हो या वह कर्म का आचरण कर रहा हो लेकिन जिसकी वृत्ति सर्वकाल

२२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
निश्चल होती है वही निर्मल आत्मयोगी है। समरांगण में परशुराम का सामना कर भीष्म ने उस पर निर्णायक
बाण छोड़े, उसे शर्त में जीता, फिर भी भीष्म की समवृत्ति में अन्तर नहीं पड़ा। वह अपने समाधान में स्थिर थी।
निर्णायक युद्ध में श्री समाधि न टूटे, यह साधने के लिये मैंने चौबीस गुरुओं का वन्दन किया। देह स्थिर हो तो
वृत्ति स्थिर रहती है ओर देह के चंचल होते ही वृत्ति चंचल हो जाती है, तो इसे सबल देहबुद्धि ही कहना
चाहिये। वह शुद्ध आत्मबोध नहीं है। प्रपंच देखते ही वृत्ति में विक्षेप आ जाता है। ऐसा विक्षेप दूर करने के लिये
ही मैंने बहुगुरु का साधन किया। निजगुरु ने बताये हुए परमार्थ को साधने के लिये ही मंने प्रपंच के ही अनेक
पदार्थों को गुरुपद दिया। जिससे विक्षेप उत्पन्न होता उसी को मैंने गुरुपद दिया। इस युक्ति से साधन करने के
कारण, संसार अपने आप ही परब्रह्मस्वरूप हो गया। यदि पहले गुरु ने ही बोध नहीं किया होता तो क्या पृथ्बी
आदि ने बोध कराया होता ? निजस्वार्थ साधने के लिये मैं गुरुओं के साधन में पड़ गया।
न ह्ये कस्माद् गुरोर्ज्ञानं सुस्थिरं स्यात् सुपुष्कलम्।
ब्रह्मैतदद्वितीयं वै गीयते बहुधर्षिभिः॥ ३१॥
गुरु के आत्मज्ञान देने पर हृदय में चिद्भान प्रकट होता है, लेकिन वह विद्युल्लता की तरह चंचल होता है,
उसमें स्थिरता नहीं होती। जो मूलरूप से चंचल है वह कभी दृढ़ नहीं हो सकता। वह क्षण भर के लिये भासित
होता है और क्षणभर में लुप्त हो जाता है। इससे साधक उद्विग्न रहता है। साँप के मुँह से भक्ष्य छूट जाने पर वह
जिस प्रकार छटपटाता है उसी प्रकार साधक में वेदनायें होती रहती हैं। आत्मभान का वियोग उसे जरा भी सहन
नहीं होता। वैसे ब्रह्म अद्वितीय है और नित्य है यह सभी ऋषियों को मान्य है लेकिन उनसे पूछने पर उसमें भी
अनेक विक्षेप उत्पन्न होते हैं। कोई कहता है कि ब्रह्म सगुण है तो कोई कहता है कि वह निर्गुण है। इस प्रकार
विद्वत्ता के अहंकार के कारण एक दूसरे का खण्डन कर जोर का वाद-विवाद प्रारम्भ करते हैं। कोई कहता है
ब्रह्म सप्रपंच है, कोई कहता है वह निष्प्रपंच है। इस प्रकार पाँच-पाँच जन मिलकर व्यर्थ की किचकिच बढ़ाते
हैं। प्रपंचदर्शन से विक्षेपता उत्पन्न होती है उस समय आत्मैक्य साधने के लिये सुबुद्ध साधक को नाना पदार्थों के
गुण गुरुरूप से ग्रहण करने चाहिये। विद्वान लोगों से प्रश्न पूछने से साधक के मन को समाधान नहीं होगा
इसलिये उनसे पूछने का मन नहीं करता। इसलिये जहाँ बाधा उत्पन्न होती है वहीं ऐक्य होता है इसलिये अनेक
पदार्थों को गुरुत्व देना यही उत्तम साधन मैंने नियोजित किया। गुरु के जो लक्षण मैंने बतलाये हैं वे आत्मबुद्धि के
भी साधन हैं। उसी की तेज धार से सारी बाधायें काट डाली। उसी चंचलता से आत्मज्ञान का निश्चल मूल प्राप्त
हुआ। दृष्य-पदार्थ देखने पर भी चित्स्वरूप का आभास होने लगा। पहले मेरे गुरुओं ने मुझे जो ज्ञान दिया था
वही अब अनेक गुरू कर बाधा का विनाश करने से अधिक दृढ़ हुआ। मोक्षदायी गुरु एक ही होता है लेकिन
अन्य गुरु उसका ही ज्ञान दृढ़तर करने में साधन बनते हैं। उसका यथा-तथ्य स्वरूप मैंने तुम्हें पहले बता ही दिया
है। अब कर्म करने पर भी प्रपंच का भान नहीं होता। निजबोध की पहचान हो जाने के कारण सदासर्वदा
समदृष्टि हो गयी है। अब दृश्य पदार्थ को आँखों से देखने पर भी वह दृश्य रूप में नहीं दिखायी देता। कर्म की
त्रिपुटी पूरी तरह नष्ट हो गयी। ज्ञान का प्रभाव इतना अपूर्व है। यथेच्छ भोजन करने पर भी निराहार का लक्षण
नहीं मिटता। उसी प्रकार संसार से सम्बन्ध रखने पर भी एकाकीपन नहीं टूटता। समुद्र में लहरें मचलती रहती हैं
लेकिन उसे पानी का ऐक्य नहीं टूटता। उसी प्रकार संसार में विचरण करते हुए भी मुझे दूजेपन का आभास नहीं
होता। सद्गुरु का चमत्कार अपूर्व है। सर्वत्र वही भरा हुआ है। गुरु के सिवाय रिक्त कोई वस्तु नहीं है। अब जो

मेरा 'मैं' पन है वह भी गुरु ही स्वयं हो गया है और 'तुम' कह कर बोलने वाला जो तुम्हारा 'तू' पन है वह भी
स्वयं सद्गुरु ही है। हे यदुराजा ! इस प्रकार देखने पर मेरा गुरु अकेला एक ही है। उसमें दूजेपन का प्रश्न ही
नहीं है। ऐसी यह सद्गुरु की कथा तुम्हें परमार्थ लाभ की दृष्टि से सुनायी यह कहकर अवधूत ने अत्यन्त
आनन्द से राजा को आलिंगन दिया। निजबोध के योग से वे दोनों एकरूप हो गये। अंतरंग से अंतरंग मिल गया।
सृष्टि में आनन्द प्रवाहित होने लगा। इससे वाणी स्तब्ध रह गयी। प्रश्नोत्तर करना वह भूल गयी। वह हर्ष हृदय
मन्दिर में न रह सकने के कारण स्वेद के रूप में शरीर से बाहर निकल पड़ा और आनन्दरूपी मेघ आँखों में
समाकर प्रेमाश्रु की वर्षा करने लगे। अहंकार की बेड़ियाँ टूटीं, संसार सागर के किनारे पर पहुँचे और अभेद्य
अविद्या को जीतने के कारण शरीर रोमांचित हो गया। देहभान समूल नष्ट होने के कारण शरीर थरथर काँपने
लगा, संकल्प विकल्प का लय हो गया और मन के साथ मनोरथ डूब गया। यदु ने सारा जीवभाव गुरुनाथ को
समर्पित कर दिया। वह चिह्न उसके शरीर पर बाहर भी दिखायी देने लगा। वह अवधूत साक्षात दत्तात्रेय थे,
उन्होंने यदुराजा को आलिंगन किया और उसे आत्मस्वरूप ज्ञान का अनुभव कराया। दत्तात्रेय की शिष्य परम्परा
में पहला था सहस्रार्जुन और दूसरा था यदु और तीसरा शिष्य 'जनार्दन' उन्होंने कलियुग में बनाया। गुरुप्राप्ति के
लिये जनार्दन अत्यन्त चिंतित था। उस सद्गुरु की चिन्ता में उसे तीनों अवस्थाओं का विस्मरण हो गया। किन्तु
देवता भाव का भूखा होने के कारण उसने भक्त की वह छटपटाहट जान ली और श्रीदत्त उसके पास आये और
उन्होंने उसके मस्तक पर हाथ रखा। हाथ रखते ही जनार्दन को तत्काल आत्मबोध का अनुभव हुआ और उससे
प्रपंच का मूल ही व्यर्थ हो गया। कर्म करने पर भी अकर्त्ता बने रहने का बोध श्रीदत्तात्रेय ने उन्हें कराया। देह में
रहकर भी विदेह रहने का बोध भी उसने अनुभव किया। गृहस्थाश्रम छोड़े बिना, कर्ममर्यादा का उल्लंघन किये
बिना आचरण करने से भी आत्मबोध कभी मलिन नहीं होता। ऐसा बोध मन द्वारा ग्रहण किये जाने के कारण मन
का स्वभाव ही नष्ट हो गया। जनार्दन उस अवस्था को न सँभाल सका और मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। उसे
तत्काल होश में लाकर दत्तात्रेय जी बोले, यह सत्त्वगुण की अवस्था है, इसलिये उसे भूल कर निजबोध में ही
विचरते रहो। जनार्दन पूजाविधि कर चरणों पर मस्तक रखने जा रहे हैं तभी योगमाया के योग से दत्तात्रेय अदृश्य
हो गये। (एकनाथ श्रोताओं से कहते हैं) आख्यान के बीच में यह उपाख्यान आ गया, इसके लिये श्रोतागण रुष्ट
न हों। प्रसंग के अनुसार गुरु की बात निकली इसलिये मैंने गुरु की ही कथा सुनायी। मुझसे बड़ी गलती हो
गयी। लेकिन इसे व्यर्थ की बकवास न समझें। जो गुरु का भक्त होगा वही उसका भाव समझेगा और निरन्तर गुरु
का स्मरण करता होगा वही उसका मर्म जान पायेगा। जिसकी गुरुचरणों पर दृढ़ निष्ठा होगी, जिन्हें गुरुभजनों की
चाह होगी, जिन्होंने गुरुप्रेम प्राप्त किया होगा, वही उसका माधुर्य जान पायेगा। सद्गुरु का नाम लेते ही चारों
मुक्ति मस्तक झुकाती हैं। किन्तु गुरुभक्तों को मुक्ति बिलकुल अच्छी नहीं लगती। क्योंकि गुरुचरणों में निजमुक्तता
सहज ही विद्यमान रहती है। जिनके चरणों का तीर्थ लेने से चारों ही मुक्ति पवित्र हो उठती हैं और सारे पुरुषार्थ
चरणों पर आ गिरते हैं, वे गुरुभक्त तीनों लोकों में धन्य हैं। नित्य, निराधार, निधर्म एवं निर्विकार ऐसे चैतन्य का
वास्तव में सद्गुरु ने ही जीर्णोद्धार किया इसलिये सद्गुरु ही सत्स्वरूप हैं। यदि सद्गुरु की कृपा न होती तो कोई
देवताओं का भी कुशल-क्षेम न पूछता। देवता को देवत्त्व प्रदान करने वाला सचमुच सद्गुरु ही है। वास्तव में,
सद्गुरु की कृपा के बिना भगवान होते हुए भी नहीं के बराबर हो गया था। उसे देवता के उचित स्थान पर बिठा
कर उसका भजन करने के लिये प्रेरित करने वाला एक गुरुराज ही है। उस सद्गुरु की कथा सुनाकर मैंने गलती
की। मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया। श्रोतागण इसके लिये क्षमा करें। लेकिन मैंने यह व्यर्थ ही नहीं कहा।

२३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
दत्तात्रेय के शिष्यों का नाम बताते समय मुझे जनार्दन का भी स्मरण हुआ। मैं भले ही यह कहूँ कि मैं जनार्दन का
स्मरण नहीं करता लेकिन वह मुझे स्वयं का विस्मरण नहीं होने देता। वह हठपूर्वक निरन्तर, रात-दिन मुझे
अपनी याद दिलाता रहता है। मैं जहाँ भूलने का प्रयास करता हूँ, वहीं वह आकर खड़ा हो जाता है। मैं भले ही
उसकी ओर न देखूँ लेकिन मेरा वह न देखना भी वह स्वयं ही हो जाता है। घट आकाश को छोड़ना चाहता है
लेकिन आकाश घट को नहीं छोड़ता। उसी प्रकार जनार्दन हमारे पीछे लगा हुआ है। मैं उसकी बात नहीं करता
लेकिन वही मेरे मुख में वक्ता बनकर रहता है जो मुझे बोलने को बाध्य करता है। तो अब मैं करूँ तो क्या करूँ?
किसी दृश्य पदार्थ को देखने लगता हूँ तो मुझे उसके अन्दर-बाहर जनार्दन ही दिखाई देने लगता है। कान से
कुछ सुनने लगता हूँ तो उन शब्दों में जनार्दन ही घुस जाता है। अब न मैं कुछ देखूँगा, न सुनूँगा ऐसा विचार कर
शान्त बैठता हूँ तो उस शान्ति के रूप में भी जनार्दन दिखायी देने लगता है। बस, ऐसी परिस्थिति में फँस गया हूँ।
जनार्दन किसी बात का विस्मरण नहीं होने देता। हर दृष्टि से मैं अपराधी हूँ। अब श्रोतागण ही कोई उपाय
सुझाएँ। इस पर श्रोतागण बोले, "महान आश्चर्य है। इन बातों में अहंभाव तो जरा भी नहीं दिखायी देता। इसके
बोलने का भाव देखकर तो प्रेम का उफान आता है। तुम्हारे शब्दों पर विचार करें तो वे क्षीरसागर से भी गहरे
मालूम होते हैं। तुम्हारे प्रेम का आकर्षण कुछ विचित्र है।" हम स्वानन्द में डोलना चाहते हैं। तुमने गुरु सम्बन्धी
जो निरूपण किया वह प्रेमयुक्त ब्रह्मज्ञान का ही स्वरूप है। इसलिये हमें बहुत समाधान हुआ है। तुम्हारे निरूपण
में दोष देने की जगह ही नहीं है। गुरु का स्मरण नित्य करना चाहिये यह तत्त्व गुरु ने स्वयं ही बतलाया। अमृत
के सेवन से कौन तृप्त होगा ? तिस पर जनार्दन के प्रति तुम्हें असीम प्रेम है, यह बात भी हमें ज्ञात हो गयी है।
निरूपण तो अपूर्व था ही उसे रसालता भी प्राप्त हो गयी। तुम मूलकथा का आख्यान सुनाओ या उपाख्यान,
लेकिन तुम्हारा निरूपण का माधुर्य अन्य किसी बात में कैसे आयेगा ? शुद्ध निरूपण से गुरु का वर्णन करते हो
और तिस पर स्वयं को अपराधी कहते हो। इससे मालूम होता है कि तुम्हारी बुद्धि किस तरह एकरूप हो गयी
है। अपने विनय से श्रोताओं का सम्मान अधिक बढ़ाते हो। तुम्हारी जो अपराधबुद्धि है वह भगवद्चरणों में ही
विलीन हो गयी है। तो अपराध की शुद्धि तो हो ही गयी। सच्चे ज्ञानी तुम्हीं हो। जब गुरु की स्तुति करते हो तो
मूलकथा को भूल जाते हो। प्रेम का लक्षण ऐसा ही होता है। हमें अच्छी तरह मालूम हो चुका है। कुछ अन्य
श्रोताओं ने कहा, "हमारे मन को थोड़ा आश्चर्य हो रहा है। इसलिये ग्रन्थ के अगले भाग का प्रारम्भ कर मूल
कथा सुनाओ।" संतों के इस भाषण का सम्मान कर तथा उनके चरणों को प्रणाम कर आगे की कथा सुनाता हूँ,
श्रोतागण ध्यान से सुनें। इस प्रकार उस अवधूत ने यदु को परमार्थ बताया। उस भाषण से उसका बहुत समाधान
हुआ। इसके बाद वह शान्त होकर बैठा रहा।
श्रीभगवानुवाच
इत्युक्त्वा स यदुं विप्रस्तमामन्त्र्य गभीरधीः ।
वन्दितोऽभ्यर्थितो राज्ञा ययौ प्रीतो यथागतम् ॥ ३२ ॥
श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा, "इस प्रकार राजा को ब्रह्मज्ञान देकर तथा उसका समाधान हुआ देख अवधूत
उससे विदा लेकर जाने के लिये तत्पर हुआ। तब राजा ने उसके चरण पकड़ लिये। अत्यन्त प्रेम से उसकी पूजा
कर, उसे प्रदक्षिणा कर उसने पुनः उसके चरणों पर अपना मस्तक रख दिया।'" 'जाइये' वह कह नहीं सकता था
और 'रहिये' कहने से स्वामित्व का आभास होता। वियोग तो असहनीय होने लगा। इससे वाचा बन्द हो गयी।

नवाँ अध्याय २३१
उसकी वह अवस्था देखकर श्री दत्तात्रेय के मन में करुणा उत्पन्न हुई और उन्होंने उसके मस्तक पर हाथ रखकर
प्रसन्न मुद्रा से कहा कि आज से तुम्हारा और मेरा कभी वियोग नहीं होगा। राजा को इस प्रकार का आश्वासन
देकर श्रीदत्तात्रेय निकल पड़े। जितनी प्रसन्नता से वे आये थे उतनी ही प्रसन्नता से वे चले गये। राजा को अत्यन्त
समाधान हुआ और वह निजात्मबोध से निरन्तर सुखी हुआ।
अवधूतवचः श्रुत्वा पूर्वेषां नः स पूर्वजः।
सर्वसङ्गविनिर्मुक्तः समचित्तो बभूव ह॥३३॥
उद्धव को सामने देखकर श्रीकृष्ण ने कहा, "यदुराजा, यह हमारे पूर्वजों का भी पूर्वज और राजाओं का
मुकुटमणि था। तुम यदि उसका नाम नहीं जानते तो यह अपूर्व बात है। लेकिन उसके ही नाम से हम सारे वीर
अपने को 'यादव' कहते हैं।" नन्द के पुत्र श्रीकृष्ण ने आनन्दपूर्वक आगे कहा, वही यदु हमारा पूर्वज है। उसने
ही दत्तात्रेय के साथ ब्रह्मज्ञान का संवाद किया। श्रीदत्तात्रेय के भाषण के हृद्गत पर विश्वास करने के कारण ही
यदु में सर्वसंग परित्याग की पात्रता उत्पन्न हुई। जो संग छोड़कर दूर गया उसने 'संगत्याग' किया ऐसा कहना
चाहिये लेकिन जो संग में रहकर भी स्नेह छोड़ देता है उसी को 'संगमुक्त' समझना चाहिये। आकाश सर्वत्र
सभी वस्तुओं को आवृत्त करता है लेकिन वह किसी को भी स्पर्श नहीं करता। इसी का नाम है—'संगमुक्तता'।
लेकिन यदु के पास इससे भी विशेष प्रकार की संगमुक्तता आ गयी थी। उद्धव! वह कथा भी बताता हूँ, सुनो।
सचमुच, सबके संग में रहते हुए भी दत्तात्रेय के बोध से उसे संग की भनक भी नहीं लग रही थी। इसी का नाम
है विशेषमुक्तता। पहले मेरी द्वैत से संगति थी। वह जाकर अब मैं निःसंग हो गया। ये दोनों ही बातें मिथ्या हैं।
मैं सबसे 'विनिर्मुक्त' हो गया हूँ। रस्सी कभी साँप नहीं होती लेकिन उस पर साँप होने का आरोप किया जाता
है। लेकिन वह भी रस्सी से ही नष्ट होता है। यह आत्मभ्रम भ्रान्ति के कारण ही निर्मित होता है। रस्सी तो रस्सी
के ही रूप में रहती है लेकिन जिसे भ्रम है उसके मन में वह साँप के रूप में रहता है। इस प्रकार का द्वैत का
भ्रम टूटते ही राजा को धीरे-धीरे समाधि लग गयी। ऐक्यभाव से समबुद्धि होने का नाम ही 'निजसमाधि' है।
यही समाधि राजा को प्राप्त हो जाने के कारण वह ब्रह्मस्वरूप तक पहुँच गया। कृष्ण ने उद्धव से कहा, "यदि
तुम भी ऐसे के वंश में जन्म लेकर ब्रह्मज्ञान नहीं प्राप्त करोगे तो पूर्वजों की प्रतिष्ठा में कमी आ जाएगी।" इस
पर श्रीकृष्ण ने उद्धव से तिरस्कारपूर्वक बोल कर अद्वैत पर टूट पड़ने के लिये उसकी उत्कंठा पर एक और प्रहार
किया। एक तो विषैला काला सर्प, तिस पर यदि उसकी पूँछ पर पैर रख दिया जाय तो वह क्रोध से दंश करने
के लिये टूट पड़ता है, किसी के वश में नहीं आता। उसी प्रकार उद्धव पहले से ही अनुताप दग्ध था, तिस पर
श्रीकृष्ण ने उसका तिरस्कार किया तो वह परब्रह्म को निगलने के लिये मन में व्याकुल हो उठा। कृष्ण और
उद्धव के बीच जो संवाद हुआ वह अगले अध्याय में है। उसमें गुरु-शिष्य का लक्षण बताया जायगा। चतुर
श्रोताओं को उसका श्रवण करना चाहिये। एका जनार्दन कहता है, कृष्ण के मुख से निकला भाषण अत्यन्त गूढ़
है। यद्यपि मैं ठीक प्रकार से उसका वर्णन नहीं कर सकता फिर भी उसके स्वाभाविक माधुर्य से अंतःकरण तृप्त
होता है। यदि शर्करा का करैला बनाया जाय तो उसमें कडुवाहट नहीं रहती। उसी प्रकार यह ग्रन्थ भले ही
प्राकृत भाषा में लिखा गया हो लेकिन उसमें पूर्ण रूप से स्वानंद ही भरा हुआ है। यदि सोने का पिण्ड भी बनाया
जाय तो वह पत्थर के मोल नहीं बिकेगा। उसी प्रकार भागवत यदि प्राकृत में भी हो तो भी उसमें आत्मज्ञान
की कमी नहीं होगी। मोती के लिये लोग समुद्र में डुबकी लगाते हैं लेकिन यदि वही मोती घर के कुएँ में