श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमेरा 'मैं' पन है वह भी गुरु ही स्वयं हो गया है और 'तुम' कह कर बोलने वाला जो तुम्हारा 'तू' पन है वह भी
स्वयं सद्गुरु ही है। हे यदुराजा ! इस प्रकार देखने पर मेरा गुरु अकेला एक ही है। उसमें दूजेपन का प्रश्न ही
नहीं है। ऐसी यह सद्गुरु की कथा तुम्हें परमार्थ लाभ की दृष्टि से सुनायी यह कहकर अवधूत ने अत्यन्त
आनन्द से राजा को आलिंगन दिया। निजबोध के योग से वे दोनों एकरूप हो गये। अंतरंग से अंतरंग मिल गया।
सृष्टि में आनन्द प्रवाहित होने लगा। इससे वाणी स्तब्ध रह गयी। प्रश्नोत्तर करना वह भूल गयी। वह हर्ष हृदय
मन्दिर में न रह सकने के कारण स्वेद के रूप में शरीर से बाहर निकल पड़ा और आनन्दरूपी मेघ आँखों में
समाकर प्रेमाश्रु की वर्षा करने लगे। अहंकार की बेड़ियाँ टूटीं, संसार सागर के किनारे पर पहुँचे और अभेद्य
अविद्या को जीतने के कारण शरीर रोमांचित हो गया। देहभान समूल नष्ट होने के कारण शरीर थरथर काँपने
लगा, संकल्प विकल्प का लय हो गया और मन के साथ मनोरथ डूब गया। यदु ने सारा जीवभाव गुरुनाथ को
समर्पित कर दिया। वह चिह्न उसके शरीर पर बाहर भी दिखायी देने लगा। वह अवधूत साक्षात दत्तात्रेय थे,
उन्होंने यदुराजा को आलिंगन किया और उसे आत्मस्वरूप ज्ञान का अनुभव कराया। दत्तात्रेय की शिष्य परम्परा
में पहला था सहस्रार्जुन और दूसरा था यदु और तीसरा शिष्य 'जनार्दन' उन्होंने कलियुग में बनाया। गुरुप्राप्ति के
लिये जनार्दन अत्यन्त चिंतित था। उस सद्गुरु की चिन्ता में उसे तीनों अवस्थाओं का विस्मरण हो गया। किन्तु
देवता भाव का भूखा होने के कारण उसने भक्त की वह छटपटाहट जान ली और श्रीदत्त उसके पास आये और
उन्होंने उसके मस्तक पर हाथ रखा। हाथ रखते ही जनार्दन को तत्काल आत्मबोध का अनुभव हुआ और उससे
प्रपंच का मूल ही व्यर्थ हो गया। कर्म करने पर भी अकर्त्ता बने रहने का बोध श्रीदत्तात्रेय ने उन्हें कराया। देह में
रहकर भी विदेह रहने का बोध भी उसने अनुभव किया। गृहस्थाश्रम छोड़े बिना, कर्ममर्यादा का उल्लंघन किये
बिना आचरण करने से भी आत्मबोध कभी मलिन नहीं होता। ऐसा बोध मन द्वारा ग्रहण किये जाने के कारण मन
का स्वभाव ही नष्ट हो गया। जनार्दन उस अवस्था को न सँभाल सका और मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। उसे
तत्काल होश में लाकर दत्तात्रेय जी बोले, यह सत्त्वगुण की अवस्था है, इसलिये उसे भूल कर निजबोध में ही
विचरते रहो। जनार्दन पूजाविधि कर चरणों पर मस्तक रखने जा रहे हैं तभी योगमाया के योग से दत्तात्रेय अदृश्य
हो गये। (एकनाथ श्रोताओं से कहते हैं) आख्यान के बीच में यह उपाख्यान आ गया, इसके लिये श्रोतागण रुष्ट
न हों। प्रसंग के अनुसार गुरु की बात निकली इसलिये मैंने गुरु की ही कथा सुनायी। मुझसे बड़ी गलती हो
गयी। लेकिन इसे व्यर्थ की बकवास न समझें। जो गुरु का भक्त होगा वही उसका भाव समझेगा और निरन्तर गुरु
का स्मरण करता होगा वही उसका मर्म जान पायेगा। जिसकी गुरुचरणों पर दृढ़ निष्ठा होगी, जिन्हें गुरुभजनों की
चाह होगी, जिन्होंने गुरुप्रेम प्राप्त किया होगा, वही उसका माधुर्य जान पायेगा। सद्गुरु का नाम लेते ही चारों
मुक्ति मस्तक झुकाती हैं। किन्तु गुरुभक्तों को मुक्ति बिलकुल अच्छी नहीं लगती। क्योंकि गुरुचरणों में निजमुक्तता
सहज ही विद्यमान रहती है। जिनके चरणों का तीर्थ लेने से चारों ही मुक्ति पवित्र हो उठती हैं और सारे पुरुषार्थ
चरणों पर आ गिरते हैं, वे गुरुभक्त तीनों लोकों में धन्य हैं। नित्य, निराधार, निधर्म एवं निर्विकार ऐसे चैतन्य का
वास्तव में सद्गुरु ने ही जीर्णोद्धार किया इसलिये सद्गुरु ही सत्स्वरूप हैं। यदि सद्गुरु की कृपा न होती तो कोई
देवताओं का भी कुशल-क्षेम न पूछता। देवता को देवत्त्व प्रदान करने वाला सचमुच सद्गुरु ही है। वास्तव में,
सद्गुरु की कृपा के बिना भगवान होते हुए भी नहीं के बराबर हो गया था। उसे देवता के उचित स्थान पर बिठा
कर उसका भजन करने के लिये प्रेरित करने वाला एक गुरुराज ही है। उस सद्गुरु की कथा सुनाकर मैंने गलती
की। मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया। श्रोतागण इसके लिये क्षमा करें। लेकिन मैंने यह व्यर्थ ही नहीं कहा।