श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
वायुरूप सूत्रात्मा को उत्पन्न किया। इसी को क्रिया शक्ति कहते हैं। उसी क्रियाशक्ति ने तीन गुण व्यक्त किये और
अहंकार के द्वारा जगत की उत्पत्ति का मूल निर्माण किया। तप गुणादिक्रम से देवता, मनुष्य तथा नाग उत्पन्न
होकर 'अध' अर्थात् पाताल लोक, 'ऊर्ध्व' अर्थात् 'स्वर्गलोक' और मध्य अर्थात् मृत्युलोक, इस प्रकार त्रिभुवन
की रचना हुई। ब्रह्माण्ड का वही वायुरूप सूत्र प्राणरूप से पिण्ड को सँभालने लगा। जान लो कि पिण्ड और
ब्रह्माण्ड की रचना करने वाली वही 'क्रियाशक्ति' है। जीव को संसारी बनाने के लिये ही उसने शरीर में
षड्विकारों का संचार किया। उसी प्रकार छह उर्मि अर्थात् जन्म, मरण, क्षुधा, तृष्णा, शोक, मोह उत्पन्न किये।
इस प्रकार संसार की वृद्धि करने का ही इसका सारा प्रयास है। इसीलिये सांख्यशास्त्र में इसका उल्लेख
'क्रियाशक्ति' के नाम से किया जाता है। 'क्रियाशक्ति' के इस युग में ही मानों सारा संसार उड़ेला हुआ है। वह
टेढ़ा-मेढ़ा जैसा भी हो अपने ही स्थान पर बढ़ता रहता है। वही क्रियाशक्ति देहाभिमान की गाँठ कसकर बाँधकर
जन-जन को संसारी बनाकर छोड़ती है। प्रचण्ड वासना उत्पन्न कर अनेक प्रकार की योनियों में जन्म धारण
कराती है। पिता के वीर्य में माता के रुधिर का मिश्रण बनकर वह मिश्रण काफी समय तक जठराग्नि के ज्वाला
में उबलता रहता है। वहाँ उसमें अवयवरूपी अंकुर निकलते हैं और हस्तपादादि अवयव तैयार होते हैं। फिर देह
को आकार प्राप्त होता है। फिर भी यातनायें नहीं टलतीं। वे अपार रहती हैं। पेट में गर्भ का गोला उबलता रहता
है तभी अनेक प्रकार के दुःख उपस्थित हो जाते हैं। नाक में और मुँह में विष्ठा, जंतु, आदि का प्रवेश होता रहने
के कारण वह मस्तक झाड़ने लगता है। गर्भ की वेदना अत्यंत भयंकर होती है। उसका स्मरण होते ही मन भय
से काँपने लगता है। योनि द्वार से जन्म होता है, उस समय भी जीव को अनेक यातनायें होती हैं। इस प्रकार माया
जन्म देकर कभी तो स्वर्ग के कारागार में डालती है या फिर देहाभिमान से नरक में ही तड़पता छोड़ती है। इस
प्रकार सुख-दुःख की कड़ियों से बनी बेड़ी ठोंक कर दुःख की राशि भोगने के लिये बाध्य करती है। फिर भी
अविद्या से छुटकारा नहीं मिल पाता। माया का यह जाल महाभयंकर है। लेकिन हे राजा! तुम्हें उससे भयभीत
नहीं होना चाहिये क्योंकि तुमने दृढ़ अनुताप किया है तथा अभिमान और दर्प का विनाश कर दिया है। तुम्हारी
पूरी स्थिति ही बदली हुई लग रही है। तुम्हारे हृदय में चिच्छक्ति प्रकट होकर, अविद्या की रात्रि समाप्त होकर
ज्ञानरूप सूर्य का उदय हुआ है। जहाँ अभिमान ही नष्ट कर दिया जाता है वहाँ कामादिक शत्रु भी नष्ट हो जाते
हैं, उसी प्रकार जैसे शिरच्छेद करने पर हाथ-पैर अपने आप ही नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार मैंने तुम्हें 'अरिमर्दन'
कहा था, वह बिलकुल सत्य है। अवधूत का यह भाषण सुनकर राजा को बहुत संतोष हुआ। अवधूत भी प्रेम से
विह्वल हो गया और उसने राजा के मस्तक पर हाथ रखकर उसे आलिंगन दिया। तब राजा को अत्यन्त धन्यता
मालूम हुई। निजआत्मबोध से दोनों का मिलन हुआ। उनकी प्रसन्नता मानों आकाश में भी नहीं समा रही थी जो
वास्तव में भाग्यवान है उसे ही इस प्रकार सद्गुरु की भेंट होती है। बालक का कौतुक करने से जिस प्रकार माँ
को प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार शिष्य को आत्मबोध होते ही सद्गुरु को भी अत्यन्त आनन्द होता है। इस प्रकार
परस्पर संवाद चल रहा था, तभी परमानन्द बहने लगा। उसी आनन्द के आवेग में अवधूत आगे की कथा का
संवाद और भी स्पष्ट करके बतलाने लगा।
यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णां संतत्य वक्त्रतः।
तया विहृत्य भूयस्तां ग्रसत्येवं महेश्वरः ॥ २१॥
'ऊर्णनाभि' का अर्थ है 'मकड़ी'। मकड़ी अपने पेट में के तन्तु मुँह से बाहर निकालकर उसका जाल
तैयार करती है। फिर उन फैले हुए तन्तुओं पर स्वयं ही अपनी इच्छानुसार क्रीड़ा करती है। उन तन्तुओं के जाल