श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
निश्चल होती है वही निर्मल आत्मयोगी है। समरांगण में परशुराम का सामना कर भीष्म ने उस पर निर्णायक
बाण छोड़े, उसे शर्त में जीता, फिर भी भीष्म की समवृत्ति में अन्तर नहीं पड़ा। वह अपने समाधान में स्थिर थी।
निर्णायक युद्ध में श्री समाधि न टूटे, यह साधने के लिये मैंने चौबीस गुरुओं का वन्दन किया। देह स्थिर हो तो
वृत्ति स्थिर रहती है ओर देह के चंचल होते ही वृत्ति चंचल हो जाती है, तो इसे सबल देहबुद्धि ही कहना
चाहिये। वह शुद्ध आत्मबोध नहीं है। प्रपंच देखते ही वृत्ति में विक्षेप आ जाता है। ऐसा विक्षेप दूर करने के लिये
ही मैंने बहुगुरु का साधन किया। निजगुरु ने बताये हुए परमार्थ को साधने के लिये ही मंने प्रपंच के ही अनेक
पदार्थों को गुरुपद दिया। जिससे विक्षेप उत्पन्न होता उसी को मैंने गुरुपद दिया। इस युक्ति से साधन करने के
कारण, संसार अपने आप ही परब्रह्मस्वरूप हो गया। यदि पहले गुरु ने ही बोध नहीं किया होता तो क्या पृथ्बी
आदि ने बोध कराया होता ? निजस्वार्थ साधने के लिये मैं गुरुओं के साधन में पड़ गया।
न ह्ये कस्माद् गुरोर्ज्ञानं सुस्थिरं स्यात् सुपुष्कलम्।
ब्रह्मैतदद्वितीयं वै गीयते बहुधर्षिभिः॥ ३१॥
गुरु के आत्मज्ञान देने पर हृदय में चिद्भान प्रकट होता है, लेकिन वह विद्युल्लता की तरह चंचल होता है,
उसमें स्थिरता नहीं होती। जो मूलरूप से चंचल है वह कभी दृढ़ नहीं हो सकता। वह क्षण भर के लिये भासित
होता है और क्षणभर में लुप्त हो जाता है। इससे साधक उद्विग्न रहता है। साँप के मुँह से भक्ष्य छूट जाने पर वह
जिस प्रकार छटपटाता है उसी प्रकार साधक में वेदनायें होती रहती हैं। आत्मभान का वियोग उसे जरा भी सहन
नहीं होता। वैसे ब्रह्म अद्वितीय है और नित्य है यह सभी ऋषियों को मान्य है लेकिन उनसे पूछने पर उसमें भी
अनेक विक्षेप उत्पन्न होते हैं। कोई कहता है कि ब्रह्म सगुण है तो कोई कहता है कि वह निर्गुण है। इस प्रकार
विद्वत्ता के अहंकार के कारण एक दूसरे का खण्डन कर जोर का वाद-विवाद प्रारम्भ करते हैं। कोई कहता है
ब्रह्म सप्रपंच है, कोई कहता है वह निष्प्रपंच है। इस प्रकार पाँच-पाँच जन मिलकर व्यर्थ की किचकिच बढ़ाते
हैं। प्रपंचदर्शन से विक्षेपता उत्पन्न होती है उस समय आत्मैक्य साधने के लिये सुबुद्ध साधक को नाना पदार्थों के
गुण गुरुरूप से ग्रहण करने चाहिये। विद्वान लोगों से प्रश्न पूछने से साधक के मन को समाधान नहीं होगा
इसलिये उनसे पूछने का मन नहीं करता। इसलिये जहाँ बाधा उत्पन्न होती है वहीं ऐक्य होता है इसलिये अनेक
पदार्थों को गुरुत्व देना यही उत्तम साधन मैंने नियोजित किया। गुरु के जो लक्षण मैंने बतलाये हैं वे आत्मबुद्धि के
भी साधन हैं। उसी की तेज धार से सारी बाधायें काट डाली। उसी चंचलता से आत्मज्ञान का निश्चल मूल प्राप्त
हुआ। दृष्य-पदार्थ देखने पर भी चित्स्वरूप का आभास होने लगा। पहले मेरे गुरुओं ने मुझे जो ज्ञान दिया था
वही अब अनेक गुरू कर बाधा का विनाश करने से अधिक दृढ़ हुआ। मोक्षदायी गुरु एक ही होता है लेकिन
अन्य गुरु उसका ही ज्ञान दृढ़तर करने में साधन बनते हैं। उसका यथा-तथ्य स्वरूप मैंने तुम्हें पहले बता ही दिया
है। अब कर्म करने पर भी प्रपंच का भान नहीं होता। निजबोध की पहचान हो जाने के कारण सदासर्वदा
समदृष्टि हो गयी है। अब दृश्य पदार्थ को आँखों से देखने पर भी वह दृश्य रूप में नहीं दिखायी देता। कर्म की
त्रिपुटी पूरी तरह नष्ट हो गयी। ज्ञान का प्रभाव इतना अपूर्व है। यथेच्छ भोजन करने पर भी निराहार का लक्षण
नहीं मिटता। उसी प्रकार संसार से सम्बन्ध रखने पर भी एकाकीपन नहीं टूटता। समुद्र में लहरें मचलती रहती हैं
लेकिन उसे पानी का ऐक्य नहीं टूटता। उसी प्रकार संसार में विचरण करते हुए भी मुझे दूजेपन का आभास नहीं
होता। सद्गुरु का चमत्कार अपूर्व है। सर्वत्र वही भरा हुआ है। गुरु के सिवाय रिक्त कोई वस्तु नहीं है। अब जो