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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 869 में से

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पृष्ठ 241

नवाँ अध्याय २२५
सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयाऽऽत्मशक्त्या वृक्षान् सरीसृपपशून् खगदंशमत्स्यान्।
तैस्तैरतुष्टहृदयः पुरुषं विधाय ब्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देवः॥ २८॥
अपने इसी स्वरूप को लोग जान सकें इसलिये श्रीअनंत ने सृष्टि के प्रारम्भ में अपनी माया के हाथों अनेक
प्रकार के शरीरों का निर्माण किया। जमीन पर चलने वाले कुछ लोग तैयार किये, कुछ आकाश में विचरण करने
वाले तैयार किये, कुछ पानी में तैरनेवाले तैयार किये तो कुछ स्थावर तथा कुछ जंगम शरीर तैयार किये। वृक्ष,
सर्प, पशु, दंश करने वाले प्राणी, राक्षस, पिशाच, बगुले, हंस, मछली, कछुए आदि समस्त योनियाँ उसी ने
बनायीं। ऐसी चौरासी लाख योनियाँ तैयार कर लेने के बाद जब उसने उनकी ओर आँख उठाकर देखा तो उसमें
उसे आत्मप्राप्ति कर लेने वाला कोई अधिकारी नहीं दिखायी दिया। ऐसी सृष्टि देखकर भगवान को समाधान
नहीं हुआ इसलिये उसने बड़ी आस्था से मानव देह की रचना की और उस मनुष्य में उसने अपना बहुत सा ज्ञान
भर दिया। इसी ज्ञान से वे इस देह में रहकर विदेहास्थिति तक पहुँचते हैं। आहार, निद्रा, भय और मैथुन ये सारी
योनियों के लिये एक जैसे हैं। किन्तु मनुष्य देह में का ज्ञान उन सबमें विशेष है। ऐसे उस मनुष्य देह को देखकर
भगवान को सन्तोष हुआ क्योंकि इसी देह को ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने का अधिकार है और इसी देह से मेरी प्राप्ति
होने लायक है ऐसा उसे लगा। मनुष्य योनि में जन्म लेकर भी जो ब्रह्मज्ञान नहीं प्राप्त करेगा वह दाढ़ीरहित भेड़
की तरह है। मनुष्य देह के ज्ञान से सच्चिदानंद पद की प्राप्ति की जा सकती है, इतना अधिकार नारायण ने
कृपापूर्वक हमें दिया है। मनुष्य देह में ही यदि ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना है तो वह मैं अगले जन्म में प्राप्त करूँगा,
ऐसा जो कहता है वह डूब गया ऐसा समझना चाहिये। उसका असली अज्ञान यही है।
लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः।
तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु यावन्निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात्॥ २९॥
चौरासी लाख योनि के जब कोटि-कोटि फेरे होते हैं तब सौभाग्यवश अकस्मात इस नरदेह की प्राप्ति होती
है। जो मनुष्यदेह में जन्म लेता है वह परमार्थ को आलिंगन देता है। ऐसा अलभ्य लाभ हुआ देख उसके पितर
भी बहुत बड़ा उत्सव मनाने लगते हैं। यदि यह कहें कि मनुष्यदेह प्राप्त करने के बाद पहले सारे भोग भोग लें
और फिर आराम से परमार्थ के बारे में विचार करें तो यहाँ इस बात का विश्वास नहीं है क्योंकि मृत्यु निश्चित
और अनिवार्य है। मृत्यु न किसी के गुणों का विचार करती है न दोषों का, देश और परदेश की चिन्ता नहीं
करती, दिन या रात का विचार नहीं करती, सीधी विनाश ही करती है। मेंढक को पकड़ने के बाद जिस प्रकार
साँप उसे निगलने लगता है उसी प्रकार जब से देह उत्पन्न होता है तब से मृत्यु उसका पीछा करती ही रहती है।
साँप मेंढक को निगलता रहता है और मेंढक मक्खियाँ पकड़ता रहता है। उसी प्रकार मृत्यु के मुख में पड़े हुए
लोग विषय के भुलावे में पड़े ही रहते हैं। इसमें जो आलस करता है वह पूरी तरह डूब ही जाता है। उसके हाथ
आया परमार्थ छूट कर वह संसार चक्र के भँवर में गोता खाता रहता है। हे यदुराजा इन सारी बातों का विचार
कर इसी देह से शीघ्रता से परमार्थ का लक्ष्य साधने के लिये तत्पर रहना चाहिये। आलस झटकार कर, नींद को
दूर हटा कर रात दिन आत्मचिंतन करते रहना चाहिये। वीर क्षत्रिय जिस प्रकार शत्रु पर विजय प्राप्त करने से
पहले विश्राम नहीं करते, उसी प्रकार, उसी तेजी से परमार्थ के पीछे लगना चाहिये। अधिक उम्र बीत जाने पर
वर का मन जितना सावधान रहता है उसी प्रकार हमें सायुज्य लग्न होने तक सावधान रहना चाहिये। राजा का
एकमेव लड़का खो जाने पर जिस प्रकार राजा उसे अपने सारे राज्य में खोजता है, उसी प्रकार हमें अपना