श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवाँ अध्याय २२१
से खेलते-खेलते वह देखते-देखते सारे तन्तु निगल लेती है और अद्वैतकला का प्रदर्शन करती है। इसी प्रकार
सर्वेश्वर भी स्वयं ही संसार की रचना कर, अन्त में उन सबका संहार कर निर्विकार आत्मस्वरूप में शेष रहता
है। इसी लक्षण को ध्यान में रखकर मैंने उस ऊर्णनाभी को गुरु बनाया। अब सारूप्यता का विचार कर मैंने भ्रमरी
को अपना गुरु माना।
यत्र यत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया।
स्नेहाद्द्वेषाद् भयाद् वापियाति तत्तत्स्वरूपताम्॥२२॥
पुरुष काया, वाचा तथा मन को एकाग्र कर जिस वस्तु का ध्यान करता है उस वस्तु का स्वरूप उसे प्राप्त
होता रहता है। स्नेह, द्वेष अथवा भय से जिस भी किसी वस्तु की उत्कंठा बनी रहती है, उससे उसे तद्रूपता प्राप्त
होती है। देह नष्ट होने के बाद तद्रूपता आयेगी यह कहना व्यर्थ है। उसी देह से यहाँ रहने पर ही तद्रूपता प्राप्त
होती है।
कीटः पेशस्कृतं ध्यायन् कुड्यां तेन प्रवेशितः।
यातितत्सात्मतां राजन् पूर्वरूपमसंत्यजन्॥२३॥
भिंगुरटी एक कीट पकड़ कर लाती है और उसे दीवार से सटे नीड में बन्द करके रखती है। इसलिये उसे
रातदिन उसके मरने की चिन्ता लगी रहती है। उस की उस तीव्र चिन्ता से ही वह क्रीडा स्वयं भिंगुरटी बन जाती
है और तत्काल आकाश में उड़ जाती है यह हम अपनी आँखों से स्वयं देखते हैं। भिंगुरटी एक क्षुद्र कीट है,
उसका ध्यान करने वाली कीट भी जड़मूढ़ है लेकिन उसे भी तीव्र ध्यान करने से भिंगुरटी का रूप प्राप्त होता है।
वह अजड़ है, विद्रूप है, सौख्यदाता है, उसका ध्यान करने वाला भी ज्ञाता और अधिकारी है। ऐसा व्यक्ति यदि
ध्यान करे तो वहाँ तद्रूप होने में जरा भी विलम्ब नहीं होगा। कीट को भिंगुरटी का रूप प्राप्त होता है, अर्थात्
केवल तीव्र ध्यान करने से न हो सकने वाली बात हो जाती है। विचार करने पर मालूम होता है कि वे दोनों ही
जड़ हैं, अर्थात् जड़ ही जड़ को जकड़ता है। लेकिन भगवान के ध्यान की बात ऐसी नहीं है क्योंकि ध्यान करने
वाला मूलतः भगवद्रूप ही होता है, ध्यान करने से केवल उसका यह भ्रम कि 'मैं देही' हूँ नष्ट हो जाता है।
इसलिये वह अनायास ही तद्रूप हो जाता है। इसी देह में और इसी वृत्ति में से अपनी मुक्ति जिसकी समझ में नहीं
आती और जो भगवत्प्राप्ति नहीं कर लेता तो फिर नरदेह की विद्वता व्यर्थ है। यदि वह चैतन्य धन नहीं होगा, तो
उसका ज्ञान, ध्यान, भजन, याजन और धर्माचरण आदि सब व्यर्थ है।
एवं गुरुभ्य एतेभ्य एषा मे शिक्षिति मतिः।
स्वात्मोपशिक्षितां बुद्धिं शृणु मे वदतः प्रभो॥२४॥
अवधूत यदु से कहता है—इतने गुरुओं से मैंने स्वबुद्धि से जो कुछ सीखा, वह सब तुम्हें बताया। मैंने
अपनी ही बुद्धि से और युक्ति से और भी कितने ही गुण सीखे हैं वह भी तुम्हें अनन्य प्रीति के कारण बताऊँगा।
चौबीस गुरुओं का गुरु जो समर्थ वैराग्य विचार है, वह इस नरदेह में ही प्राप्त होता रहता है, इसलिये नरदेह ही
मुख्य गुरु है।
देहो गुरुर्मम विरक्तिविवेकहेतुर्विभ्रत् स्म सत्त्वनिधनं सततार्त्युदर्कम्।
तत्त्वान्यनेन विमृशामि यथा तथापि पारक्यमित्यवसितो विचराम्यसङ्गः॥२५॥