श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जायात्मजार्थपशुभृत्यगृहाप्तवर्गान् पुष्णाति यत्प्रियचिकीर्षया वितन्वन्।
स्वान्ते सकृच्छ्रमवरुद्धधनः स देहः सृष्ट्वास्य बीजमवसीदति वृक्षधर्मा ॥ २६॥
देहभाग का प्रमुख आकर्षण है स्त्रीभोग ! सब कुछ खर्च कर अपने साथी के रूप में पत्नी ले आते हैं।
लेकिन स्त्री से पाणिग्रहण करते ही प्रपंच का दुःख बढ़ने लगता है। उस स्त्री के उपभोग के लिये घर बनाना
आवश्यक हो जाता है। घर ठीक तरह से चले इसके लिये धन-धान्य आदि समृद्धि की आवश्यकता होती है।
फिर बाल बच्चे पैदा होने पर प्रपंच बढ़ते ही अपार चिन्ता उत्पन्न होती है। उन बाल बच्चों के प्रति वात्सल्य
उत्पन्न होता है। उनके लिये नौकर-चाकर, दास-दासी, जानवर आदि रखने पड़ते हैं। इसके लिये कठिन कष्ट
सहने पड़ते हैं। सुख का एक क्षण भी नहीं मिलता। समधी और दामाद का आकर्षण उत्पन्न होता है, सगे-
सम्बन्धियों के झुण्ड एकत्र होते हैं। उनका उचित स्वागत-सत्कार करने में अनेक संकट आते हैं और वह सब
सहते-सहते देह चूर-चूर हो जाता है। आश्रित परिवार का पोषण करने के लिये अनेक उपाय करता है, देश-
परदेश में भटकने लगता है और रात-दिन परिश्रम करके हैरान हो जाता है। शरीर को सुख देने के लिये कई
गुना दुःख बढ़ाता रहता है। मूर्ख लोगों का यह ढंग ही है कि वे देह के अहंकार के कारण व्यर्थ की
अभिलाषा बढ़ाते हैं। देहसुख की इच्छा से जमीन, जायदाद आदि की बेड़ी पैरों में पड़ती है। घर-बार, स्त्री-
पुत्रों का प्रेम उसे पागल कर देता है जिससे वह अपना स्वार्थ नहीं जान पाता। घरबार, बच्चे, सम्पत्ति आदि
का लोभ शरीर ने बढ़ाया रहता है। वही वासना देह के अन्त समय में दूसरे जन्म की प्राप्ति का बीजारोपण
करती है। ज्वार का दाना बाली पर चढ़ता है और फिर बाली से अलग होकर धरती पर गिर पड़ता है, पेड़
टूट जाता है किन्तु बीज धरती के भीतर शेष रहता है। उस बीज को जल और धरती मिलते ही तत्काल दूसरा
पेड़ बढ़ने लगता है। उसी प्रकार दूसरा जन्म लेने के लिये यह वासना शेष रहती है। उस पेड़ की ही तरह
बीज लिंगदेह में शेष रहता है और योनि के द्वार से पुनः जन्म दिलाता है और स्वर्ग या संसार का भ्रमण
कराता है। देह में वासना किस प्रकार बढ़ती है यह भी तुम्हें बताऊँगा। आसक्तिपूर्वक विषयों का सेवन करने
से वासना असीमित बढ़ जाती है।
जिह्वैकतोऽमुमपकर्षति कर्हि तर्षा शिश्नोऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवणं कुतश्चित् ।
घ्राणोऽन्यतश्चपलदृक् क्व च कर्मशक्तिर्बह्वयः सपत्न्य इव गेहपतिं लुनन्ति ॥ २७ ॥
जिह्वा रस की ओर आकर्षित होती है, तृष्णा प्राशन करने के लिये लालायित रहती है, शिश्न को रतिसुख
की चाह होने के कारण वह उसमें रममाण होने के लिये छटपटाता रहता है। त्वचा मृदुता चाहती है, उदर भरपेट
अन्न मिलने की इच्छा करता रहता है। कान गान, मंजुल, ध्वनि, आलाप आदि की आकांक्षा करते रहते हैं। नाक
सुगन्ध के लिये उद्यत रहते हैं। अच्छा रूप देखने के लिए आँखें लालायित रहती हैं। अनेक प्रकार की क्रीड़ाएँ
करने के लिये हाथ बेचैन रहते हैं। पैर भ्रमण करना चाहते हैं। जिस प्रकार घर में एक पति को अनेक पत्नियाँ
रहने पर सौतें आपस में खींचतान करती रहती हैं उसी प्रकार इन्द्रियों को विषय की आसक्ति होने के कारण वे
उसे अपनी ओर खींचती रहती हैं। इस प्रकार इन्द्रियों को विषय की आसक्ति होने के कारण वासना भी प्रबल
होती रहती है। वास्तव में ये वासनायें ही पुरुष को इस देह से उस देह में ले जाती रहती है। इसलिये विषय का
त्याग करने के लिये देहसंग बिलकुल छोड़ देना चाहिये। ऐसा करने के लिये मनुष्य देह ही उत्तम है क्योंकि
ज्ञानप्राप्ति इसी देह में है।