श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकोई दुःख नहीं है। युवावस्था में वृद्धावस्था का दुःख देखकर यह जान लेना चाहिये कि यह दुःख कल मेरा भी
हाथ पकड़ लेगा। देह षड्विकारों से भरा हुआ है। उसके प्रत्येक विकार में अनेक अनर्थ हैं। इसके अतिरिक्त
जिस प्रकार अग्नि में घी डाला जाय उसी प्रकार उनमें छह ऊर्मी लगी हुई हैं। इस दुःख का जो मूल है वह इस
देह के बहुत लाड़ करता है। इसलिये उस देह का पोषण करने से दुःख बढ़ता है और महादुःख की फल प्राप्ति
होती है। सारांश, देह की संगति निरन्तर दुःखदायी है यह जानकर उसकी आसक्ति छोड़ देनी चाहिये। विरक्ति
मन में प्रतिपादित करने के लिये देह गुरु का काम करता है। इस देह की सहायता से ही अविनाश पद की प्राप्ति
होती है। इस गुण के कारण भी देह को गुरु कहना चाहिये। देह उपकार भी करता है और अपकार भी। उसमें
दोनों ओर से गुरुता है। इसका विचार कर जो चतुर पुरुष अपना हित साध लेता है, वह धन्य है। तात्त्विक दृष्टि
से विचार करने पर ज्ञात होता है कि अज्ञान ही इस देह का मूल है और आत्मस्वरूप का न दिखायी देना ही
प्रकृति का आभास होना है। प्रकृति के कारण ही त्रिसूत्र की उत्पत्ति होती है, तीन गुणों से तीन प्रकार के
अहंकार उत्पन्न होते हैं और वहीं से महद्भूतों का विकार उत्पन्न होकर देह के साथ इन्द्रियों के व्यापार चलते हैं।
अर्थात्, रस्सी के कारण सर्प तो हुआ ही नहीं केवल भ्रम के कारण उसे सर्प कहते हैं। उसी प्रकार ब्रह्मवस्तु पर
पिण्ड-ब्रह्माण्ड का आरोप किया जाता है। देह का मूल यदि देखा जाय तो वह मृगजल की तरह लगता है,
सर्वत्र भ्रम का ही जाल फैला हुआ है। परब्रह्म के प्रति यह केवल आरोप है। देह न होते हुए भी उसका आभास
होता है, इसे आरोप कहते हैं। अब 'अपवाद' किसे कहते हैं यह भी बताता हूँ। मन को एकाग्र करके श्रवण
करो। देह के पंचभूतात्मक होने की बात प्रसिद्ध है। उसे 'मैं' कहना बुद्धिसंगत नहीं है क्योंकि देह मलिन है
और मैं शुद्ध हूँ। देह और मैं परस्पर अत्यन्त विपरीत हैं। मैं पृथ्वी नहीं हूँ क्योंकि वह जड़ होती है। मैं जल नहीं
हूँ क्योंकि वह द्रव रूप होता है। मैं तेज नहीं, क्योंकि उसमें दाहकता होती है। उसी प्रकार मैं वायु भी नहीं हूँ
क्योंकि उसमें चंचलता होती है। मैं आकाश नहीं क्योंकि वह शून्य होता है। 'अहं' भी मैं नहीं हूँ क्योंकि वह
दृश्य है। मैं जीव नहीं हूँ क्योंकि वह एकदेशी है। उसी प्रकार मैं माया भी नहीं हूँ, क्योंकि वह मिथ्या है। नश्वर
होने के कारण मैं देह नहीं हूँ बाधकत्व के लिये मैं विष नहीं हूँ। सारांश, इन तत्त्वों का और मेरा यहाँ सम्बन्ध
नहीं है। 'मैं ब्रह्म हूँ' यह अभिमान हंस और परमहंसों को भी रहता है। लेकिन वह भी सत्त्वावस्था का साधन
है। वह अभिमान भी मैं नहीं। जिन तत्त्वों का ऊपर वर्णन किया है उन सबका मुझमें 'अपवाद' अर्थात् अभाव
है। हे यदु ! इस प्रकार मेरी बुद्धि को जो बोध हुआ है वह मैंने तुम्हें बतलाया तुम्हारी अनन्य भक्ति और भाव
देखकर मैंने यह सारा गूढ़ ज्ञान तुम्हें बतलाया अन्यथा यह सब बतलाने की मुझे कोई आवश्यकता नहीं थी।
किन्तु हे भाग्यवान राजा ! तुम्हारी यह आस्था ही मुझे तुम्हारे पास बुलाती है। इस प्रकार संवादसुख की
एकतानता में ही उन्होंने अद्वैत बोध से सानंद ताली बजायी और आनन्द के अतिरेक के कारण दोनों ब्रह्मस्वरूप
में लीन हो गये। अवधूत ने कहा, इस देह जैसा उपकारी मित्र कोई नहीं है इसलिये उसे जतन करके रखना
चाहिये। लेकिन वह तो मूलरूप में पराया ही है। उसका अच्छी तरह जतन करने से उसका अन्त भयंकर होता
है। वह श्वान, शृगाल का भोजन बन जाता है अथवा अग्नि की आहुति बन जाता है। यदि इन दोनों अवस्था से
बच निकला तो वह कृमि कीटकों का शिकार हो जाता है। इन तीन के अतिरिक्त देह की कोई चौथी अवस्था
नहीं है। इसलिये हे राजा ! मैं देह के प्रति आसक्ति ही नहीं करता। आत्मस्वरूप के ज्ञान से मैं निःसंग होकर
पृथ्वी पर घूमता हूँ। देह के उपभोग के जितने साधन हैं वे सब बन्धन ही हैं इसे ध्यान में रखो। उसके योग से
वासना प्रबल होकर असीमित रूप से बढ़ जाती है।