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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 246, कुल 869 में से

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पृष्ठ 246

२३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
दत्तात्रेय के शिष्यों का नाम बताते समय मुझे जनार्दन का भी स्मरण हुआ। मैं भले ही यह कहूँ कि मैं जनार्दन का
स्मरण नहीं करता लेकिन वह मुझे स्वयं का विस्मरण नहीं होने देता। वह हठपूर्वक निरन्तर, रात-दिन मुझे
अपनी याद दिलाता रहता है। मैं जहाँ भूलने का प्रयास करता हूँ, वहीं वह आकर खड़ा हो जाता है। मैं भले ही
उसकी ओर न देखूँ लेकिन मेरा वह न देखना भी वह स्वयं ही हो जाता है। घट आकाश को छोड़ना चाहता है
लेकिन आकाश घट को नहीं छोड़ता। उसी प्रकार जनार्दन हमारे पीछे लगा हुआ है। मैं उसकी बात नहीं करता
लेकिन वही मेरे मुख में वक्ता बनकर रहता है जो मुझे बोलने को बाध्य करता है। तो अब मैं करूँ तो क्या करूँ?
किसी दृश्य पदार्थ को देखने लगता हूँ तो मुझे उसके अन्दर-बाहर जनार्दन ही दिखाई देने लगता है। कान से
कुछ सुनने लगता हूँ तो उन शब्दों में जनार्दन ही घुस जाता है। अब न मैं कुछ देखूँगा, न सुनूँगा ऐसा विचार कर
शान्त बैठता हूँ तो उस शान्ति के रूप में भी जनार्दन दिखायी देने लगता है। बस, ऐसी परिस्थिति में फँस गया हूँ।
जनार्दन किसी बात का विस्मरण नहीं होने देता। हर दृष्टि से मैं अपराधी हूँ। अब श्रोतागण ही कोई उपाय
सुझाएँ। इस पर श्रोतागण बोले, "महान आश्चर्य है। इन बातों में अहंभाव तो जरा भी नहीं दिखायी देता। इसके
बोलने का भाव देखकर तो प्रेम का उफान आता है। तुम्हारे शब्दों पर विचार करें तो वे क्षीरसागर से भी गहरे
मालूम होते हैं। तुम्हारे प्रेम का आकर्षण कुछ विचित्र है।" हम स्वानन्द में डोलना चाहते हैं। तुमने गुरु सम्बन्धी
जो निरूपण किया वह प्रेमयुक्त ब्रह्मज्ञान का ही स्वरूप है। इसलिये हमें बहुत समाधान हुआ है। तुम्हारे निरूपण
में दोष देने की जगह ही नहीं है। गुरु का स्मरण नित्य करना चाहिये यह तत्त्व गुरु ने स्वयं ही बतलाया। अमृत
के सेवन से कौन तृप्त होगा ? तिस पर जनार्दन के प्रति तुम्हें असीम प्रेम है, यह बात भी हमें ज्ञात हो गयी है।
निरूपण तो अपूर्व था ही उसे रसालता भी प्राप्त हो गयी। तुम मूलकथा का आख्यान सुनाओ या उपाख्यान,
लेकिन तुम्हारा निरूपण का माधुर्य अन्य किसी बात में कैसे आयेगा ? शुद्ध निरूपण से गुरु का वर्णन करते हो
और तिस पर स्वयं को अपराधी कहते हो। इससे मालूम होता है कि तुम्हारी बुद्धि किस तरह एकरूप हो गयी
है। अपने विनय से श्रोताओं का सम्मान अधिक बढ़ाते हो। तुम्हारी जो अपराधबुद्धि है वह भगवद्चरणों में ही
विलीन हो गयी है। तो अपराध की शुद्धि तो हो ही गयी। सच्चे ज्ञानी तुम्हीं हो। जब गुरु की स्तुति करते हो तो
मूलकथा को भूल जाते हो। प्रेम का लक्षण ऐसा ही होता है। हमें अच्छी तरह मालूम हो चुका है। कुछ अन्य
श्रोताओं ने कहा, "हमारे मन को थोड़ा आश्चर्य हो रहा है। इसलिये ग्रन्थ के अगले भाग का प्रारम्भ कर मूल
कथा सुनाओ।" संतों के इस भाषण का सम्मान कर तथा उनके चरणों को प्रणाम कर आगे की कथा सुनाता हूँ,
श्रोतागण ध्यान से सुनें। इस प्रकार उस अवधूत ने यदु को परमार्थ बताया। उस भाषण से उसका बहुत समाधान
हुआ। इसके बाद वह शान्त होकर बैठा रहा।
श्रीभगवानुवाच
इत्युक्त्वा स यदुं विप्रस्तमामन्त्र्य गभीरधीः ।
वन्दितोऽभ्यर्थितो राज्ञा ययौ प्रीतो यथागतम् ॥ ३२ ॥
श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा, "इस प्रकार राजा को ब्रह्मज्ञान देकर तथा उसका समाधान हुआ देख अवधूत
उससे विदा लेकर जाने के लिये तत्पर हुआ। तब राजा ने उसके चरण पकड़ लिये। अत्यन्त प्रेम से उसकी पूजा
कर, उसे प्रदक्षिणा कर उसने पुनः उसके चरणों पर अपना मस्तक रख दिया।'" 'जाइये' वह कह नहीं सकता था
और 'रहिये' कहने से स्वामित्व का आभास होता। वियोग तो असहनीय होने लगा। इससे वाचा बन्द हो गयी।