श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवाँ अध्याय २२७
विषयभोग के ही लिये हैं किन्तु नरदेह केवल विषयत्याग के लिये है। वह नरदेह कैसे प्राप्त होता है ? तो उसका
मिलना अत्यन्त कठिन है। उसका भी प्रकार तुम्हें बताता हूँ, ध्यान से सुन लो। पुण्य अधिक हो जाता है तो जीव
स्वर्ग में जाता है और पाप बढ़ जाता है तो वह नरक में जाता है। पाप और पुण्य जब पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं
तो मुक्ति प्राप्त होती है। जब पाप-पुण्य एक समान होते हैं तब मनुष्य देह प्राप्त होता है तथा कर्मभूमि में
आश्रमधर्म में बुद्धिमंत होकर जन्म लेता है। निश्चित रूप से मनुष्य देह प्राप्त करने के लिये कुछ किया नहीं जा
सकता। जिसका भाग्य उत्तम रहता है, उसे ही वह अकस्मात प्राप्त होता है। अमूल्य रत्न द्रव्य देकर क्रय किये
जा सकते हैं किन्तु चिन्तामणि हाथ नहीं आता उसी प्रकार अनेक योनियों में जन्म प्राप्त होता है लेकिन मनुष्य
देह मिलना अत्यन्त दुर्लभ है। ऐसा नरदेह प्राप्त होते हुए जो ब्रह्मसुख की साधना नहीं करता वह जन में महामूर्ख
तथा देवताओं में विश्वासघाती समझा जाता है। निजात्मप्राप्ति के लिये ही भगवान ने मनुष्ययोनि की योजना की
है। जो उसके विश्वास का घात करता है उसका पतन अवश्यंभावी है। पितरों की इच्छा यही रहती है कि हमारा
बेटा हरिभक्त हो तथा सारे कुल का उद्धार करे। लेकिन विषयासक्ति से वह सब पर पानी फेर देता है। (अवधूत
कहते हैं) मनुष्यदेह केवल सकल भाग्य का फल है, यह वचन सफल करने के लिये ही मैंने यह अटल वैराग्य
धारण किया है।
एवं संजातवैराग्यो विज्ञानालोक आत्मनि।
विचरामि महीमेतां मुक्तसङ्गोऽनहंकृतिः ॥ ३०॥
आत्मसाधना करने के लिये देह साधक है, किन्तु वही देह विषयभोग के कारण बाधक हो जाता है। यह
जानकर मैंने निश्चय करके वैराग्य धारण किया। उस वैराग्य के बल से तथा गुरुकृपा वचन की सहायता से
विषयों का इन्द्रियों से सम्बन्ध तोड़ दिया। जीव जैसे ही अविद्या को अंगीकार करता है वैसे ही वह अविद्या
कहती है, 'मैं तो विद्यमान' ही नहीं हूँ। यह मैंने अनुभव से जान लिया। इस प्रकार मिथ्यत्व से अविद्या नष्ट होने
के कारण चित्प्रकाश का पूर्ण लाभ प्राप्त हुआ और इससे देह में व्याप्त अहंता भी पूर्ण रूप से निकल गयी। ज्ञान
का साधन है अपनी देह, यदि उसके प्रति ही वैराग्य हो जाय तो देह के प्रति स्नेह कैसे उत्पन्न होगा ? इसी
अनुभव के कारण मैं निःसंग होकर पृथ्वी पर संचार करता रहता हूँ। स्वदेह में बिल्कुल ही अहंकार क्यों नहीं है
इसका उत्तर तुम्हें बताया। जब पुरुष की अहंता नष्ट हो जाती है तो देह भाग्य के अनुसार चलता है। उसी प्रकार
जैसे सूखा पत्ता वायु के धक्के से इधर-उधर लोटता रहता है। इसीलिये, हे वीर ! जब तक ब्रह्मसाक्षात्कार में वृत्ति
विलीन नहीं हो जाती तब तक जो सच्चे वैराग्य के साथ रहता है वही अव्यंग्य और परिपूर्ण पुरुषार्थी होता है।
अब शायद तुम कहोगे कि तुम्हें एक ही गुरु पर कभी विश्वास नहीं था तो उसके सम्बन्ध में सावधानीपूर्वक
सुनो। नमक और जल मिलकर जिस प्रकार समरस हो जाते हैं, उसी प्रकार गुरुवाक्य कान में पड़ते ही वृत्ति पूर्ण
रूप से लय हो जाती है। उसे साधक-बाधक से पीड़ा होती है यह कहना ही विसंगत है। जिस प्रकार मृत व्यक्ति
को औषधि या गर्भ को दूध नहीं पिलाया जा सकता उसी प्रकार उसके लिये कोई कर्त्तव्य शेष नहीं रहता है।
लेकिन ऐसी अवस्था सभी को प्राप्त नहीं होती। गुरु कान में गुरुमंत्र देता है और मन में आत्मस्वरूप का बोध
होता है लेकिन वह अधिक समय तक नहीं टिकता। बाह्य पदार्थ की ओर दृष्टि जाते ही विक्षेप उत्पन्न हो जाता
है। आसन पर बैठते ही स्वरूपस्थिति और आसन छोड़ते ही संसारस्फूर्ति। ऐसी एक देश स्थिति सच्चे योगी को
स्पर्श नहीं करती। देह आसन पर स्थिर हो या वह कर्म का आचरण कर रहा हो लेकिन जिसकी वृत्ति सर्वकाल