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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 869 में से

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पृष्ठ 242

[२२६] श्रीमद् एकनाथी भागवत

निजसुख साधने का प्रयत्न करना चाहिये। काल का प्रहार होने से पहले ही परमार्थ साधने में सारा जीवन खर्च
कर देना चाहिये। समय व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिये। किन्तु नरदेह के अनमोल जीवन में, गृहस्थी की आशा में,
विषय की लालसा में लोग भोग में लिप्त हो गये हैं। पशु आदि योनियों में विषय के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं
है। यदि उसी विषय को नरदेह में भी पुष्ट करें तो इससे क्या लाभ होगा? यदि विवेकपूर्वक विचार करें तो
विषय तो भाग्य से ही मिलते रहते हैं। उसके लिये व्यर्थ परिश्रम करने से मूल नरदेह का ही नाश होता है। नरदेह
अत्यन्त पवित्र है। वह प्राप्त होने पर भी जो ब्रह्मज्ञान साध्य नहीं करता उसे पुच्छ विहीन पशु ही समझना
चाहिये। अपरोक्ष ज्ञान के अतिरिक्त केवल पेट के लिये ढोंगी ज्ञान के लिये प्रयास करना वैसा ही है जैसे मर्कट
दारू पीकर उछलता रहता है। ब्रह्मज्ञान प्राप्त किये बिना जो शास्त्र ज्ञानी हो गये उन्हें अँधेरे में चमकने वाले
जुगनू की तरह समझना चाहिये। अज्ञानरूपी अँधेरे में वे खूब चमकते हैं लेकिन सूर्योदय हो जाने के बाद उन्हें
कौन पूछता है? ब्रह्मज्ञान के बिना संन्यासी नाटक के संन्यासी की तरह है जो मिष्ठान्न की भिक्षा के लिये
लालायित रहते हैं। मन में विषय की अभिलाषा रखकर जो वेदाध्ययन करते हैं उन्हें बरसाती मेढ़क के समान
समझना चाहिये। मेंढ़क कीचड़ खा कर 'टर्राँव टर्राँव' करते रहते हैं वैसी ही उनकी अवस्था रहती है। विषय
प्राप्ति के लिये रखा हुआ मौन बगुले के ध्यान की तरह है और विषयबुद्धि से किया हुआ गायन उसी प्रकार है,
जैसे गधी को देखकर गधा चिल्लाता है। विषय के लिये प्रवचन आदि करना उसी प्रकार है जैसे भात की हाँडी
देखकर कौए कोलाहल करते हैं। जिस प्रकार भाँड पेट के लिये जो मन में आये वह बकते रहते हैं, उसी प्रकार
विषय प्राप्ति के लिये शास्त्रों का उल्टा-सीधा अर्थ बताकर वितंडावाद बढ़ाते हैं। मन में विषय की दृढ़ भावना
रखकर ऊपर से सदाचार का स्वांग भरते हैं। यह कुछ वैसा है जैसे कौआ बाहर से शुद्धता का ढोंग करता है और
भीतर विष्ठा चिन्तन करता है। वेश्या जिस प्रकार अपना देह विक्रय कर अपनी गृहस्थी चलाती है उसी प्रकार वे
अपनी उपजीविका के लिये अग्निहोत्र, यज्ञयाग आदि करते हैं। लेकिन चौथा पुरुषार्थ सिद्ध करना यही तो नरदेह
का सच्चा स्वार्थ है। उसे न साधकर कुछ दूसरा ही अर्थ साधना महा अनर्थ है यह समझना चाहिये। नरदेह प्राप्त
कर जो ब्रह्मज्ञान नहीं साध पाते उसे श्वान अथवा शृगाल अथवा उससे भी नीच स्तर का समझना चाहिये। उस
सम्बन्ध में विचार सुनो। पशु को लात मारिये तो भी वह उसका द्वेष नहीं करता। लेकिन मनुष्य को यदि 'तू'
कहो तो वह प्राण लेने के लिये उद्यत हो जाता है। पशु में संग्रह करने की लालसा नहीं होती। जितनां खाना है
खाता है और बाकी छोड़कर चला जाता है। लेकिन मनुष्य इतना लोभी है कि करोड़ों रुपया जेब में होने पर भी
पेटभर खा नहीं पाता। फिर कहीं किसी को देने की बात आ जाए तो प्राण ही चला जाएगा। पशुओं को सुबह या
सायंकाल के भोजन की चिन्ता नहीं रहती लेकिन मनुष्य की चिन्ता पूरे जन्म में भी नहीं छूटती। अपरिमित द्रव्य
साथ में हो तो भी अनिवार चिन्ता होती ही है। नरदेही प्राणी को सारे संसार में अविश्वास ही दिखायी देता है।
शरीर भले ही मरणासन्न हो गया हो लेकिन जमीन जायदाद लेता ही रहता है और नाती, पोतों के लिये मकान
बनवाता रहता है। ऐसी दुर्धर चिन्ता पशुओं को नहीं होती। अब तुम्हें मैथुन की वास्तविक स्थिति बताता हूँ। पशु
ऋतुकाल में ही मैथुन करते हैं और फिर स्त्री का स्पर्श नहीं करते लेकिन पुरुष प्रतिदिन स्त्रीसंग करते हैं,
गर्भावस्था में भी नहीं छोड़ते। काम, क्रोध, लोभ, निन्दा और अहंकार ये सब मनुष्य के ही भाग्य में हैं। इसलिये
आत्मज्ञान साध्य न कर केवल विषयी हो जाते हैं। वे श्वान और शृगाल से भी नीच है। उनमें मनुष्यता नाम की
वस्तु ही नहीं है। विषय में जो सुख है वह स्वर्ग और नरक दोनों में समान है। इस मृत्युलोक में जो विषयसुख
श्वान भोगता है वही सुख स्वर्ग में इन्द्र भोगता है। मनुष्य देह के अलावा जो पशु-पक्षी आदि अन्य योनियाँ हैं वे