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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 869 में से

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पृष्ठ 238

२२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
हे चतुरश्रेष्ठ! देह को जो गुरुत्व प्राप्त हुआ है, वह दो प्रकार से है। परमार्थ की रक्षा करने के लक्षण भी
तुम्हें बताता हूँ। देह जैसी खराब वस्तु पृथ्वी पर कहीं भी नहीं है लेकिन उसी प्रकार देह जैसी अच्छी चीज भी
त्रिभुवन में अन्यत्र नहीं प्राप्त होगी। यदि खराब कह कर उसका त्याग करें तो मोक्षसुख से वंचित हो जाते हैं
और अच्छा कह कर उसका उपभोग करें तो तत्काल नरक में जाना पड़ता है। इसलिये न उसका त्याग ही करना
चाहिये और न भोग ही करना चाहिये। उसे दोनों अवस्थाओं के बीच ही नियंत्रित करके रखना चाहिये। अर्थात्
उसे अपने हित के लिये आत्मसाधन में ही रखना चाहिये। जिस प्रकार गंतव्य स्थान तक पहुँचने के लिये
किराये के घोड़े को वहाँ तक ले जाना पड़ता है और इसके बाद हमें उसकी चिन्ता नहीं रहती, उसी प्रकार
परमार्थ को ध्यान में रखकर घर संसार में किसी उदासीन राही की तरह बस्ती करनी चाहिये। देह के प्रति
आसक्ति का विचार बुद्धि तक नहीं पहुँचना चाहिये। देह की स्थिति नश्वर है और नश्वरत्व के कारण ही विराग
उत्पन्न होता है। जो मुमुक्षु हैं वे किसी भी प्रकार के नाशवान वस्तु पर आसक्ति नहीं रखते और जिससे विरक्ति
उत्पन्न होती है वही वास्तव में विवेक है। सारांश, विवेक और वैराग्य की प्राप्ति अपने ही विचारों से नरदेह में
होती है। अन्य देहों में इस प्रकार का विचार ही नहीं होता क्योंकि अन्य देहधारी प्राणी केवल शिश्नोदर का ही
व्यवसाय करते हैं। इसीलिये नरदेह एक अमूल्य निधि है। उसके योग से ब्रह्मसायुज्य में जाया जा सकता है।
इसलिये देवता भी नरदेह का वर्णन कर मनुष्य होने की कामना करते हैं। इससे यदि तुम यह विचार करोगे कि
नरदेह अत्यन्त पवित्र है, तो ऐसी बात नहीं है। उसे अत्यन्त निन्दनीय समझो क्योंकि उसका जन्म योनी द्वार से
होकर मृत्यु उसका पीछा करती रहती है। प्राणी ने पूरी तरह जन्म लिया भी नहीं होता तभी मृत्यु उसके पीछे
लग जाती है। गर्भ में भी मृत्यु का भय लगा रहता है। सारांश, इस देह के साथ मृत्यु चिपका हुआ है। वह
बाल्यावस्था में भी रहता है और यौवन में भी सट कर बैठता है। ऐसा होते हुए भी मनुष्य अपनी मृत्यु के बारे में
भूलकर अपने यौवन का अभिमान करता है। चतुर, बुद्धिमान, ज्ञाता, बलवान सब कुछ मैं ही हूँ यही कहता
रहता है। तभी काल उस यौवन के ताजा फल को बिना डंठल तोड़े ही निगल लेता है। फिर वृद्धावस्था से जर्जर
होकर मृत्यु को प्राप्त करता है। सफेद बालों के साथ वृद्धावस्था का आगमन होता है और मृत्यु प्रतीक्षा करती
रहती है। जब सारा शरीर काँपने लगे तभी मृत्यु की आहट समझ लेनी चाहिये और जब गर्दन काँपने लगे तो
समझना चाहिये कि मृत्यु की सवारी आ रही है। शत्रु की सेना सुगमता से भीतर प्रवेश कर सके इसलिये काल
सारे दाँत गिरा कर मार्ग प्रशस्त कर देता है। कमर टेढ़ी हो जाती है उसे मृत्यु की ही निशानी समझना चाहिये।
दोनों कानों में कील ठुक जाती है। मृत्यु आने वाली है इसलिये नेत्रों की ज्योति उसकी अगवानी करने जाती है,
फिर आप उसमें अंजन डालिये या और कुछ कीजिये लेकिन अक्षर भी नहीं दिखायी देते। रातभर खाँसते रहने
से पड़ोसियों को भी कष्ट होता है और वे कहने लगते हैं यह बुड्ढा मरता भी नहीं है, व्यर्थ ही हमारे बच्चों की
नींद खराब करता है। मृत्यु की बाढ़ आते ही पैर लड़खड़ाने लगते हैं, जीभ लड़खड़ाने लगती है और शरीर की
नाड़ियाँ टूटने लगती हैं। यदि मृत्यु शीघ्र नहीं आयी तो वृद्धावस्था की विडम्बना अत्यन्त खराब रहती है। पत्नी,
बच्चे तथा अन्य लोग भी पास नहीं आते। उस समय जीना अत्यन्त दयनीय हो उठता है। जब देह को वृद्धावस्था
जकड़ लेती है तो जीवनभर जिनका परिश्रमपूर्वक पोषण किया है वही पास आने से कतराते हैं। उसकी बात भी
कोई नहीं सुनता, सब उसका तिरस्कार करते हैं और कुत्ते उसके पीछे भौंकते हैं। जानकार लोग बच्चों को उसे
भूत कह कर डराते हैं। खाँसी तो क्षणभर के लिये भी शान्त नहीं बैठने देती और जी व्याकुल होने लगता है।
जिसने बचपन में उसे 'वृद्ध होने' का आशीर्वाद दिया था वह वास्तव में शाप ही था। वृद्धावस्था की तरह अन्य