दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १८
२-मंत्र ६० :
[यंत्र: श्रीं] पैंतालीस दिनों तक एक हजार नित्य जपने
से 'सर्वज्ञान' होता है ।
३-मंत्र ३२ :
[यंत्र: श्रीं] पैंतालीस दिनों तक प्रतिदिन एक हजार
जपने से धन वृद्धि होती है ।
४-मंत्र २७ :
[यंत्र: ह्रीं] पैंतालीस दिनों तक प्रतिदिन एक हजार
जपने से ईश्वर दर्शन एवं आत्म ज्ञान होता
है ।
५-मंत्र ८८ :
[यंत्र: ह्रीं] २१ दिन तक छः हजार जपने से सभी रोगों
का नाश ।
६-मंत्र ३० :
[यंत्र: ॐ] छियाणवें दिन तक एक हजार नित्य जपने
से आधिदैविक शक्ति प्राप्ति ।
७-मंत्र ५२ :
[यंत्र: रं] पैंतालोस दिनों तक प्रतिदिन एक हजार
जपने से कान तथा नेत्र चिकित्सा ।
orधis right near the left margin! OR, wait, could it beध? Wait, look at ध-मंत्र ७६ :: Wait, is it ध? If the vertical stem broke off, only the curved left part would print, which looks EXACTLY like ६! Wait, but what if it's ६? If it were ६, what would the one above it be? द? Why would दbe followed by६? Wait, could the one above be ८? No, ८has no reason to be above६. Could it be ५? No, it's NOT ५. What if the first one is ८? No, in Hindi: १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०. Could it be ८-मंत्र १६and९-मंत्र ७६? Wait! In Bengali or Maithili or something? No, this is standard Hindi. Wait, what if it's दandध? Let's look at द-मंत्र १६ : andध-मंत्र ७६ : Wait, what if it isध? Let's look at how it appears: in transcription, should we write ध-मंत्र ७६ :or६-मंत्र ७६
२० ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
'कवच'
पञ्च क्लेशों तथा कामादि प्रवल शत्रुओं से लड़ने से पहले
कवच पहिनना आवश्यक है । रावण से युद्ध करते समय श्रीराम
ने 'आदित्य हृदय' कवच धारण किया था । प्रत्येक अङ्गों की
रक्षा पराम्बा के नाम विशेष से की जाती है । माँ के उस नाम
के स्वरूप का उस अङ्ग में ध्यान करने से पूर्ण रक्षा होती है ।
यह कवच स्वयं ब्रह्माजी ने बताया है । इसका पाठ आवश्यक है
मात्र बाह्य आयुध रक्षा नहीं करते, रक्षा तो पराम्बा ही करती
है । भगवान् का नाम ही रक्षक है ।
कवच अभेद विप्र पद पूजा,
यही सम विजय उपाय न दूजा । मानस ।
समय आने पर मृत्यु तो सभी की होती है, किन्तु मरने
पर भी अमर हो जाने वाले भगवान् के भक्त ही होते हैं; क्योंकि
वे लोग भगवान् के नाम का कवच पहनते हैं । अपने-अपने इष्ट-
देव का अलग-अलग कवच होता है । साधकों को अपने इष्ट
के अनुसार कवच धारण करना चाहिए । दृष्टान्त के लिए निम्न
श्लोक उद्धृत हैं-
शंखिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वार-वासिनी ।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी ॥ । २३ ।
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका ।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ॥ । २४ ।
इसी प्रकार तत्तदङ्गों में देवीस्वरूप का ध्यान करना
चाहिए-
प्रार्थना (शरण पड़े)
उद्धार करो हे मातः ! तिहारो शरण पड़े ।
भव पार करो हे मातः ! तुम्हारो शरण पड़े ॥
कैसे तेरा नाम रटायें, कैसे तुमसे लगन लगायें ।
हृदय जगा दो मैय्या, तुम्हारी शरण पड़े ॥
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ २१
ऐसी अंतर ज्योति जगाना, हम दीनों को शरण लगाना ।
भटकों को राह दिखाना, मैय्या तेरी शरण पड़े ॥
अर्गला
अर्गला शब्द का अर्थ अवरोध, सांकल या कुण्डा होता है ।
कपाटों के पीछे एक और लोहे या लकड़ी का मोटा डंडा लगाया
जाता है । यदि किसी प्रकार सांकल या कुण्डी खुल भी जाये तो
भी वह डंडा (मूसला या अर्गला) कपाटों को दृढ़ता से बन्द
रखता है इसी प्रकार जीवन को सुरक्षित रखने के लिए यह
अर्गला स्तोत्र है । इसका पाठ करना आवश्यक है , आप जानते
हैं कि भक्त भगवान् की कृपा से ही विकार दूर कर पाते हैं ।
इस अर्गला स्तोत्र के पढ़ने से ऐसा मालूम होता है कि केवल
सांसारिकों के लिए ही नहीं अपितु मुमुक्षुओं के लिए भी
इसका पाठ अनिवार्य है ।
वस्तुतः जो जिस भावना से भगवती का स्मरण करता है,
करुणामयी माँ उसे वही प्रदान करती है । जैसे-“रूपं देहि जयं
देहि, यशो देहि, द्विषो जहि” श्लोकार्द्ध बार-बार आया है ।
इसके शब्दों के अर्थ भावानुसार ही फलितार्थ होते हैं । 'रूपं'
शब्द को ही लीजिए-रूप्यते, अनेनेतिरूपम्-निरूपणीयम् इस अर्थ
में रूप शब्द परमात्मा के लिए हैं । "वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः”
गीता से स्पष्ट है कि सभी वेद-शास्त्रों द्वारा प्रतिपाद्य पदार्थ
परमात्मा ही है, शारीरिक अंग-रंग-नख-शिख सम्बन्धी रूप
अभिप्रेत नहीं । यहाँ माँ से प्रार्थना की गई है कि हे माँ ! मुझे
उस परमात्मा का ज्ञान कराओ, जो श्रेय-प्रेय दोनों हैं; किन्तु
यह ज्ञान तब तक नहीं होता, जब तक कामादि विकारों पर
विजय नहीं मिलती । उपनिषद् में यह घोषणा इस प्रकार की
है :-
ना विरतो दुश्चरितान्ना शान्तो ना समाहितः ।
नाशान्त मानसो वापि, प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥
२२ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
जब तक जीवन से दुश्चरित्र निवृत्त नहीं होते, काम -
क्रोधादि विकार दूर नहीं होते, तब तक अशान्त मन से परमात्मा
की प्राप्ति हो ही नहीं सकती । इसी से साधक प्रार्थना करता है
कि मुझे इन शत्रुओं से विजय दिलाओ, बिना आपकी कृपा के
विजय नहीं मिल सकती । श्री रामजी ने भी शक्ति की पूजा की
थी । अर्जुन ने महाभारत के पहले दुर्गा की आराधना की थी;
अतः विजय प्राप्त करने के लिए 'जयं देहि' कहा गया है । इसके
बाद 'यशो देहि' शब्द बहुत स्पष्ट है । जीवन में यदि अच्छे
कार्य न हो सके, ऐसे शास्त्र-विरुद्ध आचरणों से तो जीवित ही
मर जाना श्रेयस्कर है । भगवान् ने अर्जुन से कहा था कि युद्ध -
पलायन से शत्रु तुम्हारी निंदा करेंगे तब तुम कैसे रह पाओगे ?
‘कीर्तिर्यस्य स जीवति’ का सिद्धान्त है ।
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते । गी/२/३४
जीवन में जितने दिन जीवित हो, उतने ही दिन यशस्वी
होकर जीना चाहिए । इसलिए यश की कामना की गई है ।
द्विषो जहि-जिन विकारों को जीतने के बाद ही साधक
को साध्य की उपलब्धि होती है । उन विकारों का मारना
उतना सरल नहीं है । इसी से माँ से प्रार्थना की गई है कि हे
माँ ! आप करुणा करके हमारे भीतर बसे हुए इन शत्रुओं को
नष्ट कर दो । तुलसी दास जी ने भी प्रार्थना की है-
मम हृदय प्रभु भवन तोरा, वहाँ बसे आय बहु चोरा ।
ते करहिं उपद्रव नाथा, मर्दहिं मोहि जानि अनाथा ॥
इसी प्रकार संस्कृत के विद्वानों ने शत्रुओं पर विजय पाने
के लिए अपने इष्ट देव से प्रार्थनायें की हैं । एक भक्तने काम -
वासना से पीड़ित होकर भगवान् शंकर से प्रार्थना की है :-
भवदुपगमशून्ये मन्मनो दुर्ग मध्ये,
निवसति भयहीनः कामवैरिन् ! रिपुस्ते ।
२३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
स यदि तव विजयस्तूर्णमागच्छ शम्भो !
नृपतिरधिमृगव्यं किन्नुकान्तारमेति ।
हे शिव जी ! आपका शत्रु काम मेरे मन में है; इसे मार
दो । यहाँ भी पराम्बा से शत्रुओं को नष्ट करने की प्रार्थना की
गई है । इस अर्गला स्तोत्र में भगवती के विविध नामों को
लेकर यही वाक्य बार-बार दोहराते हुए भक्त ने निवेदन किया
है । अन्त में ‘पत्नीं मनोरमां देहि, मनोवृत्तानुसारिणीम्, ‘तारिणीं’
दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम् ।' शास्त्रीय तीनों--(धर्म,
काम, अर्थ, दैविक, दैहिक, भौतिक) अर्थों की दृष्टि से लिखा
गया है । केवल आधिभौतिक अर्थ करने से सभी के लिए वह
शास्त्रों का अर्थ पूर्ण नहीं हो सकता है । जैसे एक संन्यासी के
लिए या ब्रह्मचारी के लिए पत्नी मांगना अनुचित है । अतः
उनके लिए यहाँ पत्नी शब्द का अर्थ ‘ब्रह्माकार वृत्ति या
भगवदाकार वृत्ति' है । वास्तव में अविद्या और उसका कार्य
संसार रूपी कूप है । उसमें अज्ञान से पड़ा हुआ जीव कैसे पार
हो, उसके लिए कुछ आश्रय चाहिए । उस आश्रय का अर्थ यहाँ
पत्नी शब्द से कहा गया है । पाणिनिजी ने भी ‘पत्युर्नो यज्ञ
संयोगे' कह कर यह सिद्ध किया है कि धर्म सहचारिणी बनकर
पतन से बचाने वाली पत्नी होती है । साधक जिस कोटि का
होता है, उसके
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ २४
कर्तृत्व भोक्तृत्व समाप्त नहीं होगा, तबतक जन्म-मरण से मुक्ति
नहीं मिल सकती है । वास्तव में जीव नित्य मुक्त ही है,
किन्तु भ्रान्ति वस अपने को कर्ता, भोक्ता, जन्मने, मरने वाला
समझकर दुःखी हो रहा है । अतः ब्रह्म-विद्या से प्रार्थना है कि
मुझे इस संकट से बचाने के लिये आप की कृपा आवश्यक है ।
अथ कीलकम्
अर्गला स्तोत्र के उपरान्त "कीलक" का पाठ किया
जाता है । कीलक के विषय में तान्त्रिकों के अनेक मत हैं !
सात्विक साधकों के लिये अनुपादेय होने के कारण उन प्रसङ्गों
को यहाँ नहीं लिया गया है, केवल दुर्गा सप्त-शती के कुछ
आध्यात्मिक भाव साधकों के मनन करने के लिये प्रस्तुत किये
जा रहे हैं ।
“ददाति प्रतिगृह्णाति, नान्यथैषा प्रसीदति
इत्थं रूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ॥
इस मंत्र पर विद्वानों ने बहुत विचार किया, किन्तु प्रायः
इसका अर्थ सभी प्रकार के लोगों के लिए यही ठीक है जो
गोरखपुर गीता प्रेस वालों ने किया है । न्यायोपार्जित द्रव्य
समर्पित करके उन्हीं का समझ कर प्रार्थना करें —हे माँ ! यह
सारा धन आपको समर्पण कर रहा हूँ, इसमें मेरा कुछ नहीं,
(मुझको इतना ही क्या कम है ? ) । ऐसे कृतज्ञ हृदय के गद्गद्
भाव से माँ के चरणों में निवेदन करे । पुनः ऐसी भावना करे
कि माँ कह रही है-“मैंने स्वीकार किया”-अब तू इसे प्रसाद
रूप समझ कर संसार यात्रा के निर्वाह में सदुपयोग कर । इस
प्रकार माँ की आज्ञा लेकर, प्रसाद समझ कर धर्म - शास्त्र के
अनुसार सदुपयोग करते हुए जीवन यापन करे ।
यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि समर्पण का
जीवन में बहुत महत्त्व है । समर्पण के सम्बन्ध में भागवतकार
का मत देखिए :-
२५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा, बुद्ध्याऽत्मना वानुसृतस्वभावात् ।
करोति यत् यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत् ॥
भागवत् ११/३/३६
शरीर, वाणी, मन, इन्द्रियाँ, बुद्धि, आत्मा या अपने जाने
अनजाने में मनुष्य जो-जो कार्य करे, उसे वह परब्रह्म नारायण
को अर्पण कर देने चाहिए। इससे अधिक क्या कृपा होगी भग -
वान् की; जो जीव के सारे कार्यों की ठेकेदारी स्वयं पर ले रहे
हैं । तुलसीदास ने इस समर्पण के भाव को समझकर ही 'तुम्हिं
निवेदित भोजन करहीं,' (मानस) के वाक्य द्वारा साधकों को
एक ही साथ श्रेय - प्रेय का अमृत पान कराया ।
शास्त्रीय आचरण ही आचरणीय है, शास्त्र विरुद्ध कभी
कोई आचरण नहीं करना चाहिए । आज समाज में 'शाक्त' इस
लिए बदनाम है कि पराम्बा जगदम्बा के बहाने मद्य - मांस का
सेवन करते हैं, जीवों की बलि चढ़ाते हैं, जो शास्त्र विरुद्ध है ।
कोई भी देवता शास्त्रीय विरुद्ध आचरण को क्षमा नहीं कर
सकता । इसका प्रमाण श्रीमद्भागवत के पाँचवें स्कन्द में
वर्णित प्रसङ्ग में दिया गया है – दन्दह्यमानेन वपुषा सहसोच्च -
चाट देवी भद्रकाली ...................स्वपार्षदैसहजगौ ननर्त च ।
५।९।१७।१८ । जब जड़ भरत की बलि भगवती को दी जाने
लगी तो माँ स्वयं प्रकट होकर उस महापुरुष की रक्षा करती हैं ।
यदि माँ को हिंसा के द्वारा रक्त पान पसन्द होता, तो वे क्यों
बचाती ? यह बार-बार दोहराया गया है कि बलि शब्द राजा
बलि ने अपना सर्वस्व समर्पण करके यह बलिदान शब्द प्राप्त
किया है । अर्थात् परमात्मा के चरणों में सर्वथा समर्पित होना
ही बलिदान है अथवा काम - क्रोधादि विकार रूपी पशु-वृत्तियों
को नष्ट करना ही वास्तविक बलि देना है । इसको स्पष्ट करने
के लिए पञ्च मकार पहले समझाए गए हैं । अतः आप साधकों
को तो सदैव अपने इष्ट के समक्ष नत मस्तक होकर समर्पण करना
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ २६
ही हित कारक है । अतः श्रद्धा पूर्वक समर्पण भाव से निवेदित
करते हुए यह गा उठे–
मेरे देवता, मुझको देना सहारा ।
कहीं छूट जाय न दामन तुम्हारा ॥
बिना तेरे मन में समाये न कोई ।
लगन का ये दीप बुझाये न कोई ॥
तुम ही मेरी किश्ती हो, तुम ही मेरे किनारा,
कहीं छूट जाय न दामन तुम्हारा ॥
तेरे रास्ते से हटाती है दुनियाँ ।
इशारे से मुझको बुलाती है दुनियाँ ॥
मुझे बचा सकता है, केवल तेरा सहारा ।
कहीं छूट न जाय दामन तुम्हारा ॥
तुम्हारा ही गुण गान गाता रहूं मैं ।
हृदय में तुम्हीं को ध्याता रहूँ मैं ॥
तुम्हारे सिवा अब लगे कुछ न प्यारा ।
कहीं छूट जाय न दामन तुम्हारा ॥
नवार्ण
नवार्ण वर्णन के पहले कुछ बातें समझनी आवश्यक हैं ।
यह जीव भ्रान्तिवश दुःखी है । अतः आणवी दीक्षा (मंत्र द्वारा)
श्री चक्र पूजन, प्राणवी शक्ति-शाम्भवी-इन तीन दीक्षाओं में से
कोई एक ग्रहण की जाती है, तभी गुरु कृपा से निम्न पाँच प्रकार
के भ्रम दूर होते हैं—
जीवेश्वरौ भिन्न रूपौ इति प्राथमिको भ्रमः ।
आत्मनिष्ठं कर्तृगुणं वास्तवं वा द्वितीयकः ॥
शरीर त्रय संयुक्तो जीवः सङ्गी तृतीयकः ।
जगत्कारण रूपस्य विकारित्वं चतुर्थकः ॥
कारणाद् भिन्न जगत ! सत्य त्वे पञ्चमो भ्रमः ॥
२७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
(१) जीव तथा ईश्वर भिन्न है (२) आत्मा में कर्तापन का
आरोप (३) जीव स्थूल सूक्ष्म कारण तीनों शरीर से युक्त है।
(४) आत्मा जगत् का कारण होने से विकारी है। (५) जगत्
आत्मा से भिन्न सत्य है।
वस्तुतः ब्रह्म की सत् शक्ति के आधार पर भौतिक सृष्टि
की प्रतीति (हो रही) है, चित्त में चेतन जगत् की प्रतीति, आनंद
से जगत् में प्रियता की प्रतीति है। इस प्रकार जगत् सत्, चित्,
आनंद रूप ही है, भ्रम से अन्य प्रतीत हो रहा है। यही भ्रम-
निवृति हेतु साधना की जाती है। साधक का यह शरीर सात
मञ्जिल का भवन है—
(१) मूलाधार (२) स्वाधिष्ठान (३) मणिपूर (४) अनाहत
(५) विशुद्ध (६) आज्ञा (७) सहस्त्रार, ये चक्र ही
सात मञ्जिलें हैं। इनमें प्रत्येक का चिन्तन किया जाता है।
जैसे—
मूलाधार (पैर के अंगूठे से गुदा तक) में पृथ्वी तत्व, पीत
वर्ण, चौकोर आकृति, लं बीज, हाथी सवारी, चार दल कमल में
वं शं षं सं, लिखा है, लाल रंग है—ब्रह्म-ब्रह्माणी लाल रंग के
शिशु रूप में विराजमान हैं, डाकिनी-योगिनी है, स्वयम्भू लिङ्ग
साढ़े तीन वालिस्त कुण्डली लिपटी है। इसी का जागरण किया
जाता है।
इसी प्रकार 'स्वाधिष्ठान' में छः दल सिन्दूर रंग के हैं
जिनमें वं, भं, मं, यं रं, लं, वर्ण हैं। मणिपूर में दश दल मेघ
वर्ण के हैं, ड से फ तक के वर्ण हैं। 'अनाहत' में बारह दल धूम्र
वर्ण के हैं उनमें क से ठ तक वर्ण हैं। विशुद्ध में सोलह दल
गुलाबी रंग के हैं इसके १६ वर्ण अ से अः तक स्वरों से युक्त
हैं। आज्ञा चक्र में दो दल तथा ह, क्ष दो वर्ण अंकित हैं।
सहस्त्रार चक्र में पचास वर्ण बीस आवृत्ति में हैं। इनका विस्तृत
वर्णन 'षट्-चक्र-निरूपणम्' में देख सकते हैं।
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ २८
ऐं-यह ज्ञान प्रदात्री सरस्वती का बीज मन्त्र है । सरस्वती
रहस्योपनिषद् तथा योग शिखोपनिषद् ग्रन्थों में इस मंत्र के
विस्तार, प्रयोग एवं महत्व का अवलोकन किया जा सकता है ।
वाक्-सिद्धि के प्रयोग शास्त्रों में है । सर्वं वाक्यात्मका मात्रा वेद
शास्त्राणि कृत्स्नशः । पुराणानि च काव्यानि भाषाश्च विविधा
अपि । सप्त स्वराश्च गाथाश्च सर्वनाद समुद्भवः ।
एषा सरस्वती देवी सर्वभूत गुहाशया ।
य इमां वैखरीं शक्तिं योगी स्वात्मनि पश्यति ।
स वाक् सिद्धिमवाप्नोति सरस्वत्याः प्रसादतः ॥
इस बीज मंत्र का जापक विद्वान् हो जाता है । एक ही
पराशक्ति द्वारा शरीर में सभी क्रियायें सम्पन्न होती हैं । जैसे—
(१) क्रियावती—शरीर कम्पादि, नृत्यादि, जगाना, (२) कला-
वती—३६ छत्तीस तत्वों से व्यतिरेक एवं जीव शुद्धि प्रकार,
(३) वर्णात्मिका—मंत्रों द्वारा कुण्डलिनो जगाना, (४) वेधमयी-
षट् चक्र वेध द्वारा-इस प्रकार गुरु जनों से पूछ कर प्रक्रिया का
ज्ञान होता है । ऋग्वेद १/२२/१६४/४५ देखें—चत्वारि वाक्
परिमितानि पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः । गुहा त्रीणि
निहितानेङ्गयन्ति । तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति—परा, पश्यन्ति
मध्यमा ये तीनों वैखरी में निहित हैं ।
(१) ऐं—वाक् बीज है, वाणी का देवता अग्नि है, सूर्य
भी तेज रूप अग्नि ही है सूर्य से ही दृष्टि मिलती है; दृष्टि
सत्य की पीठ है, यही सत्य पर ब्रह्म है । वृहदारण्यकोपनिषद्
(में) सत् ब्रह्म का प्रतिपादक है । इसी वाग्भव कूट में काम
कला और शक्ति-कूट ह्रीँ युक्त है, यह लक्ष्मी का बीज मंत्र है,
यही मंत्र राज है । सृष्टि का उदय सोऽकामयत यही आदि-
विद्या तथा सृष्टि का उदय-आकाशाद् वायुः आदि हादि
विद्या है । दोनों ही इसी शक्ति के खेल हैं । इस प्रकार 'ऐं'
का उदय अग्नि है । (मणिपूर) आयतन वाक्शक्ति का विशुद्ध-
२६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
चक्र-विकास जिह्वाग्र भाग है। इस बीज के जप से मूर्ख भी
विद्वान् हो जाता है।
(२) ह्रीं—यह माया या लक्ष्मी का बीज मंत्र है। इसका
उदय आकाश से है। पीठ विशुद्ध में, आयतन सहस्रार में, किन्तु
श्रीं का उदय आकाश में होने पर भी आयतन आज्ञाचक्र में
है। ह्रीं का सम्बन्ध श्रीं से है। वैसे तो ऐं, ह्रीं, क्लीं तीनों सर्व
काम-प्रद बीज हैं। सभी का सभी चक्रों से सम्बन्ध है 'अ+इ=ए,
ए+अ=ऐ. अकारो वै सर्वा वाक् सैवा स्पर्शान्तस्थोष्माभि-
र्व्यज्यमाना बह्वी नाना रूपा भवति (ऐतरेय) अकार विशुद्ध
सहस्रार में भी है। इसी अकार से ही सभी वर्ण बने हैं। ॐ में
अकार ही मुख्य है।
(३) क्लीं—इस बीज में पृथ्वी तत्व की प्रधानता सहित
वायु तत्व है-क = जल-पीठ मूलाधार आयतन, काम संकल्प जनक
होने स स्वाधिष्ठान; अनाहत, तथा आज्ञा चक्र से सम्बन्धित है
और वाक्-शक्ति का सम्बन्ध संकल्पों से होता है; अतः क्लीं
का सम्बन्ध 'ऐ' से है क्+ल्+ई+नाद-बिन्दु। क्-जल तो प्राण
है, सुखार्थक है, प्राण ही वायु है, वायु का कारण आकाश है।
प्राण स्वयं ब्रह्म है-कं, खं, प्राण तीनों ही ब्रह्म वाचक हैं ।
उपनिषद् में प्राणोह्येष........। प्रयोग है। अन्नमयं हि सौम्य मनः
आपोमयः प्राणस्तेजो मयी वाक्-लं से पृथ्वी, पृथ्वी से अन्न,
अन्न से मन मूलाधार पृथ्वी है। अतः 'क' जल से प्राण तप 'ल'
पृथ्वी से मन एवं प्राण + मन का विकास आज्ञाचक्र है. यही
आनन्द का स्थान है। 'आनन्दो ब्रह्मेतिव्यजानात्' प्राण का
निवास हृदय है। प्राण ही परमात्मा है, परमात्मा ही प्रेम-
स्वरूप है 'हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति' 'सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टः से
सिद्ध ही है। आदित्यो वै प्राणाः वचन है । इन प्रमाणों से
सिद्ध है कि तीनों बीज परमात्मा वाचक हैं। चामुण्डा शब्द का
अर्थ पहले हो चुका है। स्वयं प्रकाश चित् तत्व स्वरूपिणी पराम्बा
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ३०
है और 'विच्चे' का अर्थ समर्पण या नमस्कार है; अर्थात् ज्ञान
की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती तथा सम्पूर्ण संकल्पों की
अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी और सम्पूर्ण कर्मों की स्वामिनी महाकाली
स्वरूप में सच्चिदानन्द रूप ही हैं। उनके इस अभिन्नरूप को
नमस्कार है; नमस्कार का अर्थ समर्पण है; व्याकरण में सम्प्रदान
चतुर्थी का यही अर्थ है। इसी से नमः के योग में चतुर्थी होती
है आप ये भी जान चुके हैं कि ये तीनों बीज परमात्मा के
वाचक हैं। सभी आकृतियाँ सत् तत्व में (काली रूप) सभी
प्रतीतियाँ चित् तत्व में (महालक्ष्मी) सभी प्रीतियाँ आनन्द तत्व
(महा सरस्वती) में ही विवर्त हैं।
३१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
'रात्रि-सूक्त'
नवार्ण मंत्र के जप के पश्चात् 'रात्रि-सूक्त' स्तोत्र के पाठ
का क्रम है। इसी स्तोत्र के द्वारा ब्रह्माजी ने भगवान् को योग
निद्रा से जगाया था। यह जीव न जाने कब से मोह की रात्रि
में सोया हुआ है। उसका जागरण दैवी आराधना से ही
सम्भव है। रात्रि-सूक्त में पराम्बा की की गई स्तुति अत्यन्त ही
महत्वपूर्ण है। अन्त में बहुत ही स्पष्ट कहा गया है कि तुम ही
इस जगत् की मूल शक्ति हो—
परा पराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ।
यच्च किञ्चद् क्वचिद् वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ।
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा ॥ रा०सू० १०-११
हे जगदम्बे ! परा एवं अपरा प्रकृति तुम ही हो, जो कुछ
भी स्थूल सूक्ष्म रूप से इन्द्रियगोचर है, तथा प्रकृति से परे तत्व
है; वह सब तुम ही हो। स्पष्टतः 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' की यही
घोषणा है। हमारे पुराणों की यही रीति है कि जो प्रति-
पाद्य तत्व परमात्मा है उसी को लक्ष्य रूप से दिखाया जाता है।
चाहे वह नारद-पुराण में नारद, विष्णु-पुराण में विष्णु तथा देवी-
भागवत में देवी को कहा जाय, सबका तत्व एक ही है। वही
ब्रह्म है, परमात्मा है, परा शक्ति है-यया ततमिदं सर्वम् को गीता
में 'येन सर्वमिदम् ततम्' कहा है 'मेरी ओर निहार' गीत में
इसी परमात्मा, परा शक्ति, परम तत्व की करुणामयी उपासना
करके द्रवित किया गया है। गीत की मुख्य पंक्तियाँ उद्धृत हैं—
करुणामय प्रतिपाल प्रभो, करुणा दृष्टि निहार ।
जीवन ज्योति प्रकाशक, प्रियतम मेरी ओर निहार ॥
साधन साध्य उपाय उपेय तुम मेरे हो आधार ।
अबकी बार उबार दयानिधि आयो तेरे द्वार ॥
सब तुममें तुममें सब देखूँ चिद् विलास संसार,
आत्म ब्रह्म की लखूँ एकता अनुभव का दीदार,
अबकी बार उबार दयानिधि, मेरी ओर निहार ॥
भक्ति संगीत सौरभ पृ० १०
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ३२
अथ प्रथमोऽध्यायः
दुर्गा-सप्तशती के माध्यम से आप श्रवण कर रहे हैं कि
जीव राग, द्वेष, स्मिता, अभिनिवेश तथा अविद्या इन पञ्च
क्लेशों से बंधा हुआ है। अपने स्वरूप को पहिचाने बिना जीव
इन पाँचों के बन्धन से छूट नहीं सकता तथा दुःखों से भी
निवृत्ति नहीं हो सकती। प्रेमियो ! मानव-योनि ही एक ऐसा
जीवन हैं जिसमें जीव अपने स्वरूप को जानकर जन्म-मरण के
चक्र से उन्मुक्त हो सकता है। दूसरी योनियों में यह सामर्थ्य
नहीं । आप सब बड़े भाग्यशाली हैं जो भगवती गंगा मैय्या
के तट पर माँ पराम्बा भगवती दुर्गा-सप्तशती के माध्यम से
राम के दास सम बाबा रामदास के आश्रम में अपने जीवन
दर्शन का श्रवण कर रहे हैं। दुर्गा-सप्तशती में तान चरित्रों
का वर्णन है। हमारे जीवन में भी प्रतिक्षण तीन चरित होते
रहते हैं। पहले मन में इच्छा उदय होती है, तत्पश्चात् उस
इच्छा का ज्ञान होता है और तब उचित इच्छा की पूर्ति के
लिए प्रयत्न होता है। अवस्थायें भी शैशव, यौवन, वृद्ध तीनों
ही हैं। जीवन की पहली अवस्था बचपन है। माँ के पेट से आया
शिशु सबको प्रिय होता है, क्योंकि उसके रोम-रोम में निष्छल
पावन प्रेम झलकता है उसे न किसी के प्रति राग होता है न
द्वेष ही। जैसे ही वह धीरे-धीरे बड़ा होता है, उसकी आँखों
कानों के द्वारा संसार प्रविष्ट होता जाता है। उसमें 'मेरा-तेरा'
का प्रवेश होते ही किसी के प्रति राग तो किसी के प्रति द्वेष
प्रारम्भ हो जाता है। क्रियायें भी तत्त् रूप होने लगती हैं।
यही जीवन की पहली अवस्था है।
दूसरी अवस्था यौवन (जवानो) को है जिसमें विविध
प्रबल इच्छाओं का जन्म होता है। युवक बैठे हो बैठे मनो-
राज्यों द्वारा आकाशो महल बनाते रहते हैं । उनके विचार
उन्हों को झकझोरते रहते हैं। ऐसो अवस्था में यदि किसी
३३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
युवक ने न्यूनाधिक वोल्टेज को नियन्त्रित करने वाले यन्त्र की
तरह सत्संग के स्टेपलाइजार का सेवन किया, आराधना में मन
लगाया, तभी वह सन्तुलित रह सकता है, अन्यथा उसे अपना
जीवन भार बन जाता है; क्योंकि अहंकार की मात्रा उसमें बढ़
जाती है, जो उसे किसी काम का नहीं रहने देता ।
जीवन की तीसरी अवस्था बुढ़ापा है । वृद्धावस्था में रक्त-
बीज की तरह शरीर बूढ़ा होने पर विषय-अभिलाषायें निरन्तर
बढ़ती जाती हैं, माँ की आराधना के प्रयत्न से कैसे इनका दमन
होता है ? यह आप आगे कथा में श्रवण करेंगे ।
अब प्रथम चरित्र के विनियोग से क्या शिक्षा मिलती है,
यह सुनिए—
विनियोग :- ॐ प्रथम चरित्रस्य ब्रह्मा ऋषि, महा काली
देवता, गायत्री छन्दः, नन्दा शक्तिः रक्त-दन्तिका बीजम्, अग्नि-
स्तत्त्वम्, ऋग्वेदः स्वरूपम्, श्री महाकाली प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ।
इसके ऋषि स्वयं ब्रह्मा जी हैं; जो वेदों से मंत्र निकालकर
जनता-जनार्दन को देते हैं । ब्रह्मा जी सृष्टि के रचयिता हैं, रचना
करने के लिए दो चीजें आवश्यक हैं-एक विवेक और दूसरे कला-
शिल्प (कारीगरी) नैपुण्य । उनके इसी विवेक का प्रतीक हंस है,
जिस पर वे सवार होते हैं । हंस दूध और पानी को विलग कर
देता है । अतः आप समझ लीजिये कि सत्य-असत्य का विवेक
करने वाला ही तो सृष्टि बना सकता है ।
दूसरी आवश्यक वस्तु कला और शिल्प-नैपुण्य (कारीगरी)
है । यदि कुम्हार घड़ा बनाने की कला से अनभिज्ञ है तो वह
मिट्टी, चक्र तथा सूत निमित्त तथा उपादान दोनों कारणों के
विद्यमान होने पर भी घट निर्माण नहीं कर सकता । प्रथम
चरित्र में ब्रह्माजी का नाम लेकर हमें यह शिक्षा दी गई है कि
प्रत्येक कर्म करने के पहले तत्सम्बन्धी विवेक, करने की विधि
एवं कला में नैपुण्य प्राप्त कर लें, तभी उस कार्य में सफलता
मिलती है । यही क्रिया का मूल सृजन करने वाले ब्रह्मा ऋषि
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ३४
का प्रयोजन है । एक बात और ध्यान देने की है, जिससे कुछ
लिया जाये, उसके प्रति कृतज्ञता अवश्य व्यक्त करनी चाहिए ।
आजकल तो कृतज्ञता-ज्ञापन का अभाव होता जा रहा है । जिन
गुरुजनों से कुछ भी मिला है, उनके प्रति कृतज्ञता अर्पित करना
तो सामान्य धर्म-मात्र है, सर्वस्व समर्पण ही परम धर्म है । मातृ
देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव । श्रुति भगवती के
ये वचन उक्त कथन का ज्वलन्त प्रमाण है । अपने गुरुजनों के
दोषों को छिपाने वाला ही तो छात्र है । 'वातस्तप वर्षाभ्यः
त्रायते इति छत्रम्, तथा छत्र शीलमस्य इस विग्रह में छत्रादिभ्योऽणः'
सूत्र से छात्र शब्द निष्पन्न होता है । तथ्य यह है कि जैसे छाता
सर्दी, गर्मी तथा वर्षा से रक्षा करता है ऐसे ही छात्रों को गुरु-
जनों की सेवा करनी चाहिए । ग्राह्य सारमपास्य फल्गु के
सिद्धान्तानुसार उनके दोषों को ढाँकना और गुणों को ग्रहण
करना चाहिए । इस कल्याण कारिणी परम्परा को चिर-अक्षुण्ण
बनाये रखने के लिए मैं हृदय से ब्रह्मा जी तथा माँ काली को
कृतज्ञता अर्पित करता हूँ । ये दोनों इस अध्याय में प्रमुख हैं ।
इसमें 'गायत्री छन्द से भी शिक्षा मिलती है, कि सद्बुद्धि मिले
'धियो यो नः प्रचोदयात्' सभी मंत्रों में गायत्री की श्रेष्ठता इसी
इसी कारण है कि इसमें सद्बुद्धि मांगी गई है । कितनी भी
अच्छी कार, सुन्दर प्रशस्त राज पथ हो, किन्तु ड्राईवर बोतल
पीकर बैठा हो तो क्या परिणाम होगा, आप सोचें ।
अतः चालक - सारथि रूपी बुद्धि का अच्छा होना
सर्वोपरि है ।
गीता में स्पष्ट है :—
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनु विधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥ गीता २/६७
यदि इन्द्रियों के अनुसार मन चलेगा तो बुद्धि डगमगा
जायेगी अतः भगवान् श्रीकृष्ण भी बुद्धि की शरण में जाने की
प्रेरणा देते हैं और स्थिर प्रज्ञ होने की दीक्षा देते हैं ।
३५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
आजकल रजोगुणी और तमोगुणी आहार, विहार, व्यव -
हार, विचार होने के कारण बुद्धि दूषित हो जाती है। अतः
सावधान रहना चाहिए। दोषों में बहुत सामञ्जस्य होता है।
जल की भाँति मन की गति भी निम्न-गामिनी होती है। एक
बुराई आते ही और भी बुराईयाँ आने लगती हैं। अतः हमें
सदैव सद्बुद्धि के लिए प्रयत्न करते रहना चाहिए।
पाठ में आगे नन्दा शक्ति का प्रयोग है। इससे हमें सदा
प्रसन्न रहने की शिक्षा मिलती है। शरीर प्रारब्ध से बना है,
अतः शुभ और अशुभ कर्मों का फल अवश्य मिलेगा। शुभा -
शुभाभ्यां मार्गाभ्यां वहन्ती वासना सरित्। पौरुष प्रयत्नेन योज-
येत सदा शुभे। शास्त्रों का यह सन्देश हमें जगा रहा है हमारे
पुरुषार्थ को ललकार कह रहा है कि शुभ की ओर ही अग्रसर
रहो; तभी श्रम की सार्थकता है।
आप स्वयं जैसे शुभ और अशुभ के साक्षी हो, वैसे ही
सुख - दुःख के साक्षी हो। सुखी और दुःखी करने वाली जो भी
सम-विषम परिस्थितियाँ उपस्थित हों, उनमें आपको अपनी मनः
स्थिति सम रखनी चाहिए और प्रत्येक स्थिति को भगवान् का
मंगलमय विधान समझना चाहिए।
भागवत में कहा है—
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्मकृत विपाकम्।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो भुक्ति पदे स दाय भाक् ॥
भाग-१०/१४/८
भाव यह है कि अपने प्रारब्धानुसार मिली कठिनाइयों या
प्रतिकूल परिस्थितियों को बड़ी प्रसन्नता के साथ भोग लें और
प्रतिपल प्रियतम प्रभु की कृपा का अनुभव करें। जो प्रेम से
हृदय, वाणी और शरीर द्वारा भगवान् का भजन करता है वह
जीवन मुक्त है।
भक्त के जीवन में यह निश्चय होना आवश्यक है कि सभी
वस्तुयें भगवान् की हैं। मुझे सदुपयोग करने के लिए मिली है।
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ३६
इस निश्चय से शोक और भय दोनों नहीं होंगे। दुःख, दर्द, शोक
और भय तभी होते हैं जब किसी वस्तु और व्यक्ति के साथ
ममत्व जुड़ता है, 'अपना' मानते हैं। वस्तु और व्यक्ति दोनों का
वियोग होना निश्चित ही है अतः दुःख होना भी निश्चित एवं
अवश्यम्भावी है। भूतकाल का शोक और भविष्य का भय होता
है। उदाहरण के लिए एक घटना प्रस्तुत है।
एक सज्जन ने अपना एक मकान बेच दिया। अगले दिन
उसमें आग लग गई। सूचना मिलने पर दुःख होना तो दूर,
प्रसन्न होकर बोले, अच्छा हुआ जो कल बेच दिया था। इतने में
उसके पुत्र ने आकर कहा-उस मकान में अभी मेरा सामान रखा
हुआ है। बस फिर क्या था ? महाशय तुरन्त व्याकुल हो आग
बुझाने के लिए दौड़ पड़े। उधर दूसरे बेटे ने आकर कहा-
पिता जी घबराइए नहीं, अपना सामान मैं सब ले आया हूं। यह
सुनकर भद्र पुरुष शान्त हो गये। मकान जलता रहा, देखते
रहने पर भी लेश-मात्र चिन्ता एवं दुःख न था।
इसका तात्पर्य यह है कि जीव की (अपनी) सृष्टि ही दुःख
देती है। अतः यहाँ नन्दा शक्ति का नाम लेकर यहाँ यह बताया
गया है कि भगवान् में समर्पित होकर शोक-मोह से रहित हो
सकते हो।
रक्त-दन्तिका बीज है। वैप्रचित्त दैत्यों को संहारिणी-इस
शक्ति का नाम है। इनका नाम लेकर स्मरण दिलाया है कि
मेरे भी आसुरी भावों को नष्ट करो। रक्त-दन्तिका पीठ सैदनगर
(जालौन उत्तर प्रदेश) में है।
अग्नि-तत्व है। अग्नि में जलाने और प्रकाशित करने के
दो गुण हैं। पापों को जलाना और दिव्य गुणों को प्रकाश में
लाना दोनों ही जीवन में अनिवार्य हैं।
(क) ऋग्वेद स्वरूप हैं। वेद किसो पुस्तक का नाम नहों
है। वेद शब्द का अर्थ ज्ञान है। हमें अपनो देह से हो यह ज्ञान
३७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
मिलता है कि पहले ज्ञानेन्द्रियाँ कार्य करती हैं इसके पश्चात्
कर्मेन्द्रियाँ कार्यरत होती हैं । जैसे पहले आँख देखती है, नाक
सूंघती है तब उस पदार्थ को हाथों के द्वारा मुख में प्रवेश की
स्वीकृति मिलती है ।
(ख) कान दिये दो ईश ने, जिह्वा दीनी एक ।
कहने से सुनना अधिक, सीखो प्रकृति विवेक ॥
(ग) किसी पके फल को आँखें देखती हैं, पैर दौड़ते हैं,
हाथ तोड़कर मुख को देते हैं, दाँत परिश्रम कर जिह्वा को स्वाद
देते हैं तब पेट में पहुँच रस-रक्त आदि बनकर शरीर का पोषण
करता है । यही ग्रहण कर त्यागने की और दूसरों को देने की
शिक्षा वेद से मिलती है—
ईशावास्यमिदंसर्वं, यत्किञ्चित् जगत्यांजगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा, मा गृधः कस्यचिद्धनम् ॥
इस प्रकार विनियोग द्वारा ब्रह्मादि का स्मरण करके
कृतज्ञता अर्पित की गई है । प्रतिपादित की गई शिक्षाओं को
धारण करना कर्त्तव्य है । यही विनियोग का तात्पर्य है ।
'ध्यानम्'
खड्गं चक्र गदेषु चाप परिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शंखं संदधती करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्भूषावृताम् ।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाद दशकां सेवे महाकालिकां,
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम् ॥
शेषशायी भगवान् सोये हुये थे; उनके कर्ण-मल से उत्पन्न
हुये मधु और कैटभ दोनों ही ब्रह्मा जी को खाने के लिये दौड़े ।
तब ब्रह्माजी ने जिस स्वरूप की स्तुति करके अभय प्राप्त किया
था; उन्हीं पराम्बा काली का स्तुवन करता हूँ । वे अपने दस
हाथों में तलवार, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, बन्दूक,
मस्तक तथा शङ्ख धारण किए हुए हैं । दस मुख और दस पैर
हैं । यह परा प्रकृति दसों दिशाओं में व्याप्त है । परमात्मा के