दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ २४
कर्तृत्व भोक्तृत्व समाप्त नहीं होगा, तबतक जन्म-मरण से मुक्ति
नहीं मिल सकती है । वास्तव में जीव नित्य मुक्त ही है,
किन्तु भ्रान्ति वस अपने को कर्ता, भोक्ता, जन्मने, मरने वाला
समझकर दुःखी हो रहा है । अतः ब्रह्म-विद्या से प्रार्थना है कि
मुझे इस संकट से बचाने के लिये आप की कृपा आवश्यक है ।
अथ कीलकम्
अर्गला स्तोत्र के उपरान्त "कीलक" का पाठ किया
जाता है । कीलक के विषय में तान्त्रिकों के अनेक मत हैं !
सात्विक साधकों के लिये अनुपादेय होने के कारण उन प्रसङ्गों
को यहाँ नहीं लिया गया है, केवल दुर्गा सप्त-शती के कुछ
आध्यात्मिक भाव साधकों के मनन करने के लिये प्रस्तुत किये
जा रहे हैं ।
“ददाति प्रतिगृह्णाति, नान्यथैषा प्रसीदति
इत्थं रूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ॥
इस मंत्र पर विद्वानों ने बहुत विचार किया, किन्तु प्रायः
इसका अर्थ सभी प्रकार के लोगों के लिए यही ठीक है जो
गोरखपुर गीता प्रेस वालों ने किया है । न्यायोपार्जित द्रव्य
समर्पित करके उन्हीं का समझ कर प्रार्थना करें —हे माँ ! यह
सारा धन आपको समर्पण कर रहा हूँ, इसमें मेरा कुछ नहीं,
(मुझको इतना ही क्या कम है ? ) । ऐसे कृतज्ञ हृदय के गद्गद्
भाव से माँ के चरणों में निवेदन करे । पुनः ऐसी भावना करे
कि माँ कह रही है-“मैंने स्वीकार किया”-अब तू इसे प्रसाद
रूप समझ कर संसार यात्रा के निर्वाह में सदुपयोग कर । इस
प्रकार माँ की आज्ञा लेकर, प्रसाद समझ कर धर्म - शास्त्र के
अनुसार सदुपयोग करते हुए जीवन यापन करे ।
यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि समर्पण का
जीवन में बहुत महत्त्व है । समर्पण के सम्बन्ध में भागवतकार
का मत देखिए :-