दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
जब तक जीवन से दुश्चरित्र निवृत्त नहीं होते, काम -
क्रोधादि विकार दूर नहीं होते, तब तक अशान्त मन से परमात्मा
की प्राप्ति हो ही नहीं सकती । इसी से साधक प्रार्थना करता है
कि मुझे इन शत्रुओं से विजय दिलाओ, बिना आपकी कृपा के
विजय नहीं मिल सकती । श्री रामजी ने भी शक्ति की पूजा की
थी । अर्जुन ने महाभारत के पहले दुर्गा की आराधना की थी;
अतः विजय प्राप्त करने के लिए 'जयं देहि' कहा गया है । इसके
बाद 'यशो देहि' शब्द बहुत स्पष्ट है । जीवन में यदि अच्छे
कार्य न हो सके, ऐसे शास्त्र-विरुद्ध आचरणों से तो जीवित ही
मर जाना श्रेयस्कर है । भगवान् ने अर्जुन से कहा था कि युद्ध -
पलायन से शत्रु तुम्हारी निंदा करेंगे तब तुम कैसे रह पाओगे ?
‘कीर्तिर्यस्य स जीवति’ का सिद्धान्त है ।
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते । गी/२/३४
जीवन में जितने दिन जीवित हो, उतने ही दिन यशस्वी
होकर जीना चाहिए । इसलिए यश की कामना की गई है ।
द्विषो जहि-जिन विकारों को जीतने के बाद ही साधक
को साध्य की उपलब्धि होती है । उन विकारों का मारना
उतना सरल नहीं है । इसी से माँ से प्रार्थना की गई है कि हे
माँ ! आप करुणा करके हमारे भीतर बसे हुए इन शत्रुओं को
नष्ट कर दो । तुलसी दास जी ने भी प्रार्थना की है-
मम हृदय प्रभु भवन तोरा, वहाँ बसे आय बहु चोरा ।
ते करहिं उपद्रव नाथा, मर्दहिं मोहि जानि अनाथा ॥
इसी प्रकार संस्कृत के विद्वानों ने शत्रुओं पर विजय पाने
के लिए अपने इष्ट देव से प्रार्थनायें की हैं । एक भक्तने काम -
वासना से पीड़ित होकर भगवान् शंकर से प्रार्थना की है :-
भवदुपगमशून्ये मन्मनो दुर्ग मध्ये,
निवसति भयहीनः कामवैरिन् ! रिपुस्ते ।