दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा, बुद्ध्याऽत्मना वानुसृतस्वभावात् ।
करोति यत् यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत् ॥
भागवत् ११/३/३६
शरीर, वाणी, मन, इन्द्रियाँ, बुद्धि, आत्मा या अपने जाने
अनजाने में मनुष्य जो-जो कार्य करे, उसे वह परब्रह्म नारायण
को अर्पण कर देने चाहिए। इससे अधिक क्या कृपा होगी भग -
वान् की; जो जीव के सारे कार्यों की ठेकेदारी स्वयं पर ले रहे
हैं । तुलसीदास ने इस समर्पण के भाव को समझकर ही 'तुम्हिं
निवेदित भोजन करहीं,' (मानस) के वाक्य द्वारा साधकों को
एक ही साथ श्रेय - प्रेय का अमृत पान कराया ।
शास्त्रीय आचरण ही आचरणीय है, शास्त्र विरुद्ध कभी
कोई आचरण नहीं करना चाहिए । आज समाज में 'शाक्त' इस
लिए बदनाम है कि पराम्बा जगदम्बा के बहाने मद्य - मांस का
सेवन करते हैं, जीवों की बलि चढ़ाते हैं, जो शास्त्र विरुद्ध है ।
कोई भी देवता शास्त्रीय विरुद्ध आचरण को क्षमा नहीं कर
सकता । इसका प्रमाण श्रीमद्भागवत के पाँचवें स्कन्द में
वर्णित प्रसङ्ग में दिया गया है – दन्दह्यमानेन वपुषा सहसोच्च -
चाट देवी भद्रकाली ...................स्वपार्षदैसहजगौ ननर्त च ।
५।९।१७।१८ । जब जड़ भरत की बलि भगवती को दी जाने
लगी तो माँ स्वयं प्रकट होकर उस महापुरुष की रक्षा करती हैं ।
यदि माँ को हिंसा के द्वारा रक्त पान पसन्द होता, तो वे क्यों
बचाती ? यह बार-बार दोहराया गया है कि बलि शब्द राजा
बलि ने अपना सर्वस्व समर्पण करके यह बलिदान शब्द प्राप्त
किया है । अर्थात् परमात्मा के चरणों में सर्वथा समर्पित होना
ही बलिदान है अथवा काम - क्रोधादि विकार रूपी पशु-वृत्तियों
को नष्ट करना ही वास्तविक बलि देना है । इसको स्पष्ट करने
के लिए पञ्च मकार पहले समझाए गए हैं । अतः आप साधकों
को तो सदैव अपने इष्ट के समक्ष नत मस्तक होकर समर्पण करना