दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ २१
ऐसी अंतर ज्योति जगाना, हम दीनों को शरण लगाना ।
भटकों को राह दिखाना, मैय्या तेरी शरण पड़े ॥
अर्गला
अर्गला शब्द का अर्थ अवरोध, सांकल या कुण्डा होता है ।
कपाटों के पीछे एक और लोहे या लकड़ी का मोटा डंडा लगाया
जाता है । यदि किसी प्रकार सांकल या कुण्डी खुल भी जाये तो
भी वह डंडा (मूसला या अर्गला) कपाटों को दृढ़ता से बन्द
रखता है इसी प्रकार जीवन को सुरक्षित रखने के लिए यह
अर्गला स्तोत्र है । इसका पाठ करना आवश्यक है , आप जानते
हैं कि भक्त भगवान् की कृपा से ही विकार दूर कर पाते हैं ।
इस अर्गला स्तोत्र के पढ़ने से ऐसा मालूम होता है कि केवल
सांसारिकों के लिए ही नहीं अपितु मुमुक्षुओं के लिए भी
इसका पाठ अनिवार्य है ।
वस्तुतः जो जिस भावना से भगवती का स्मरण करता है,
करुणामयी माँ उसे वही प्रदान करती है । जैसे-“रूपं देहि जयं
देहि, यशो देहि, द्विषो जहि” श्लोकार्द्ध बार-बार आया है ।
इसके शब्दों के अर्थ भावानुसार ही फलितार्थ होते हैं । 'रूपं'
शब्द को ही लीजिए-रूप्यते, अनेनेतिरूपम्-निरूपणीयम् इस अर्थ
में रूप शब्द परमात्मा के लिए हैं । "वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः”
गीता से स्पष्ट है कि सभी वेद-शास्त्रों द्वारा प्रतिपाद्य पदार्थ
परमात्मा ही है, शारीरिक अंग-रंग-नख-शिख सम्बन्धी रूप
अभिप्रेत नहीं । यहाँ माँ से प्रार्थना की गई है कि हे माँ ! मुझे
उस परमात्मा का ज्ञान कराओ, जो श्रेय-प्रेय दोनों हैं; किन्तु
यह ज्ञान तब तक नहीं होता, जब तक कामादि विकारों पर
विजय नहीं मिलती । उपनिषद् में यह घोषणा इस प्रकार की
है :-
ना विरतो दुश्चरितान्ना शान्तो ना समाहितः ।
नाशान्त मानसो वापि, प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥