सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 156 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 44

२० ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
'कवच'
पञ्च क्लेशों तथा कामादि प्रवल शत्रुओं से लड़ने से पहले
कवच पहिनना आवश्यक है । रावण से युद्ध करते समय श्रीराम
ने 'आदित्य हृदय' कवच धारण किया था । प्रत्येक अङ्गों की
रक्षा पराम्बा के नाम विशेष से की जाती है । माँ के उस नाम
के स्वरूप का उस अङ्ग में ध्यान करने से पूर्ण रक्षा होती है ।
यह कवच स्वयं ब्रह्माजी ने बताया है । इसका पाठ आवश्यक है
मात्र बाह्य आयुध रक्षा नहीं करते, रक्षा तो पराम्बा ही करती
है । भगवान् का नाम ही रक्षक है ।
कवच अभेद विप्र पद पूजा,
यही सम विजय उपाय न दूजा । मानस ।
समय आने पर मृत्यु तो सभी की होती है, किन्तु मरने
पर भी अमर हो जाने वाले भगवान् के भक्त ही होते हैं; क्योंकि
वे लोग भगवान् के नाम का कवच पहनते हैं । अपने-अपने इष्ट-
देव का अलग-अलग कवच होता है । साधकों को अपने इष्ट
के अनुसार कवच धारण करना चाहिए । दृष्टान्त के लिए निम्न
श्लोक उद्धृत हैं-
शंखिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वार-वासिनी ।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी ॥ । २३ ।
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका ।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ॥ । २४ ।
इसी प्रकार तत्तदङ्गों में देवीस्वरूप का ध्यान करना
चाहिए-
प्रार्थना (शरण पड़े)
उद्धार करो हे मातः ! तिहारो शरण पड़े ।
भव पार करो हे मातः ! तुम्हारो शरण पड़े ॥
कैसे तेरा नाम रटायें, कैसे तुमसे लगन लगायें ।
हृदय जगा दो मैय्या, तुम्हारी शरण पड़े ॥