दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ २६
ही हित कारक है । अतः श्रद्धा पूर्वक समर्पण भाव से निवेदित
करते हुए यह गा उठे–
मेरे देवता, मुझको देना सहारा ।
कहीं छूट जाय न दामन तुम्हारा ॥
बिना तेरे मन में समाये न कोई ।
लगन का ये दीप बुझाये न कोई ॥
तुम ही मेरी किश्ती हो, तुम ही मेरे किनारा,
कहीं छूट जाय न दामन तुम्हारा ॥
तेरे रास्ते से हटाती है दुनियाँ ।
इशारे से मुझको बुलाती है दुनियाँ ॥
मुझे बचा सकता है, केवल तेरा सहारा ।
कहीं छूट न जाय दामन तुम्हारा ॥
तुम्हारा ही गुण गान गाता रहूं मैं ।
हृदय में तुम्हीं को ध्याता रहूँ मैं ॥
तुम्हारे सिवा अब लगे कुछ न प्यारा ।
कहीं छूट जाय न दामन तुम्हारा ॥
नवार्ण
नवार्ण वर्णन के पहले कुछ बातें समझनी आवश्यक हैं ।
यह जीव भ्रान्तिवश दुःखी है । अतः आणवी दीक्षा (मंत्र द्वारा)
श्री चक्र पूजन, प्राणवी शक्ति-शाम्भवी-इन तीन दीक्षाओं में से
कोई एक ग्रहण की जाती है, तभी गुरु कृपा से निम्न पाँच प्रकार
के भ्रम दूर होते हैं—
जीवेश्वरौ भिन्न रूपौ इति प्राथमिको भ्रमः ।
आत्मनिष्ठं कर्तृगुणं वास्तवं वा द्वितीयकः ॥
शरीर त्रय संयुक्तो जीवः सङ्गी तृतीयकः ।
जगत्कारण रूपस्य विकारित्वं चतुर्थकः ॥
कारणाद् भिन्न जगत ! सत्य त्वे पञ्चमो भ्रमः ॥