दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
चक्र-विकास जिह्वाग्र भाग है। इस बीज के जप से मूर्ख भी
विद्वान् हो जाता है।
(२) ह्रीं—यह माया या लक्ष्मी का बीज मंत्र है। इसका
उदय आकाश से है। पीठ विशुद्ध में, आयतन सहस्रार में, किन्तु
श्रीं का उदय आकाश में होने पर भी आयतन आज्ञाचक्र में
है। ह्रीं का सम्बन्ध श्रीं से है। वैसे तो ऐं, ह्रीं, क्लीं तीनों सर्व
काम-प्रद बीज हैं। सभी का सभी चक्रों से सम्बन्ध है 'अ+इ=ए,
ए+अ=ऐ. अकारो वै सर्वा वाक् सैवा स्पर्शान्तस्थोष्माभि-
र्व्यज्यमाना बह्वी नाना रूपा भवति (ऐतरेय) अकार विशुद्ध
सहस्रार में भी है। इसी अकार से ही सभी वर्ण बने हैं। ॐ में
अकार ही मुख्य है।
(३) क्लीं—इस बीज में पृथ्वी तत्व की प्रधानता सहित
वायु तत्व है-क = जल-पीठ मूलाधार आयतन, काम संकल्प जनक
होने स स्वाधिष्ठान; अनाहत, तथा आज्ञा चक्र से सम्बन्धित है
और वाक्-शक्ति का सम्बन्ध संकल्पों से होता है; अतः क्लीं
का सम्बन्ध 'ऐ' से है क्+ल्+ई+नाद-बिन्दु। क्-जल तो प्राण
है, सुखार्थक है, प्राण ही वायु है, वायु का कारण आकाश है।
प्राण स्वयं ब्रह्म है-कं, खं, प्राण तीनों ही ब्रह्म वाचक हैं ।
उपनिषद् में प्राणोह्येष........। प्रयोग है। अन्नमयं हि सौम्य मनः
आपोमयः प्राणस्तेजो मयी वाक्-लं से पृथ्वी, पृथ्वी से अन्न,
अन्न से मन मूलाधार पृथ्वी है। अतः 'क' जल से प्राण तप 'ल'
पृथ्वी से मन एवं प्राण + मन का विकास आज्ञाचक्र है. यही
आनन्द का स्थान है। 'आनन्दो ब्रह्मेतिव्यजानात्' प्राण का
निवास हृदय है। प्राण ही परमात्मा है, परमात्मा ही प्रेम-
स्वरूप है 'हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति' 'सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टः से
सिद्ध ही है। आदित्यो वै प्राणाः वचन है । इन प्रमाणों से
सिद्ध है कि तीनों बीज परमात्मा वाचक हैं। चामुण्डा शब्द का
अर्थ पहले हो चुका है। स्वयं प्रकाश चित् तत्व स्वरूपिणी पराम्बा