दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
पृष्ठ 47, कुल 156 में से
संदर्भ में पढ़ें२३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
स यदि तव विजयस्तूर्णमागच्छ शम्भो !
नृपतिरधिमृगव्यं किन्नुकान्तारमेति ।
हे शिव जी ! आपका शत्रु काम मेरे मन में है; इसे मार
दो । यहाँ भी पराम्बा से शत्रुओं को नष्ट करने की प्रार्थना की
गई है । इस अर्गला स्तोत्र में भगवती के विविध नामों को
लेकर यही वाक्य बार-बार दोहराते हुए भक्त ने निवेदन किया
है । अन्त में ‘पत्नीं मनोरमां देहि, मनोवृत्तानुसारिणीम्, ‘तारिणीं’
दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम् ।' शास्त्रीय तीनों--(धर्म,
काम, अर्थ, दैविक, दैहिक, भौतिक) अर्थों की दृष्टि से लिखा
गया है । केवल आधिभौतिक अर्थ करने से सभी के लिए वह
शास्त्रों का अर्थ पूर्ण नहीं हो सकता है । जैसे एक संन्यासी के
लिए या ब्रह्मचारी के लिए पत्नी मांगना अनुचित है । अतः
उनके लिए यहाँ पत्नी शब्द का अर्थ ‘ब्रह्माकार वृत्ति या
भगवदाकार वृत्ति' है । वास्तव में अविद्या और उसका कार्य
संसार रूपी कूप है । उसमें अज्ञान से पड़ा हुआ जीव कैसे पार
हो, उसके लिए कुछ आश्रय चाहिए । उस आश्रय का अर्थ यहाँ
पत्नी शब्द से कहा गया है । पाणिनिजी ने भी ‘पत्युर्नो यज्ञ
संयोगे' कह कर यह सिद्ध किया है कि धर्म सहचारिणी बनकर
पतन से बचाने वाली पत्नी होती है । साधक जिस कोटि का
होता है, उसके