दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
(१) जीव तथा ईश्वर भिन्न है (२) आत्मा में कर्तापन का
आरोप (३) जीव स्थूल सूक्ष्म कारण तीनों शरीर से युक्त है।
(४) आत्मा जगत् का कारण होने से विकारी है। (५) जगत्
आत्मा से भिन्न सत्य है।
वस्तुतः ब्रह्म की सत् शक्ति के आधार पर भौतिक सृष्टि
की प्रतीति (हो रही) है, चित्त में चेतन जगत् की प्रतीति, आनंद
से जगत् में प्रियता की प्रतीति है। इस प्रकार जगत् सत्, चित्,
आनंद रूप ही है, भ्रम से अन्य प्रतीत हो रहा है। यही भ्रम-
निवृति हेतु साधना की जाती है। साधक का यह शरीर सात
मञ्जिल का भवन है—
(१) मूलाधार (२) स्वाधिष्ठान (३) मणिपूर (४) अनाहत
(५) विशुद्ध (६) आज्ञा (७) सहस्त्रार, ये चक्र ही
सात मञ्जिलें हैं। इनमें प्रत्येक का चिन्तन किया जाता है।
जैसे—
मूलाधार (पैर के अंगूठे से गुदा तक) में पृथ्वी तत्व, पीत
वर्ण, चौकोर आकृति, लं बीज, हाथी सवारी, चार दल कमल में
वं शं षं सं, लिखा है, लाल रंग है—ब्रह्म-ब्रह्माणी लाल रंग के
शिशु रूप में विराजमान हैं, डाकिनी-योगिनी है, स्वयम्भू लिङ्ग
साढ़े तीन वालिस्त कुण्डली लिपटी है। इसी का जागरण किया
जाता है।
इसी प्रकार 'स्वाधिष्ठान' में छः दल सिन्दूर रंग के हैं
जिनमें वं, भं, मं, यं रं, लं, वर्ण हैं। मणिपूर में दश दल मेघ
वर्ण के हैं, ड से फ तक के वर्ण हैं। 'अनाहत' में बारह दल धूम्र
वर्ण के हैं उनमें क से ठ तक वर्ण हैं। विशुद्ध में सोलह दल
गुलाबी रंग के हैं इसके १६ वर्ण अ से अः तक स्वरों से युक्त
हैं। आज्ञा चक्र में दो दल तथा ह, क्ष दो वर्ण अंकित हैं।
सहस्त्रार चक्र में पचास वर्ण बीस आवृत्ति में हैं। इनका विस्तृत
वर्णन 'षट्-चक्र-निरूपणम्' में देख सकते हैं।