दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
१३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
का भयावना रूप है और करुणामयी माँ की दृष्टि वालों के लिए
पराम्बा का सौम्य रूप है । इनके कहीं दो, कहीं चार, कहीं
आठ तथा कहीं अठारह हाथ हैं जिनमें खड्ग, खप्पर, त्रिशूल,
वाण, मूसल, गदा, शङ्ख, चक्र, पद्म आदि आयुध हैं । इन
आयुधों के भी विशेष अर्थ हैं ।
सप्तशती की गीता से साम्यता
सप्त - सात, शत-सौ, सात सौ की संख्या वाली
रचना की संज्ञा 'सप्त-शती' होती है । इस ग्रन्थ के सात सौ
श्लोकों द्वारा माँ पराम्बा की उपासना के साथ - साथ उनका
चारित्रिक महत्व - लीलाओं का भी प्रतिपादन हुआ है । कतिपय
विद्वान् इस ग्रन्थ को आगम ही स्वीकारते हैं; जबकि यह वैदिक
परम्परा के अनुसार है । इस पर यहाँ थोड़ा विचार कर लेना
युक्ति संगत एवं उपादेय ही है । श्रीमद्भगवद् गीता का नाम
प्रस्थान-त्रयी के अन्तर्गत है; दुर्गा - सप्तशती ठीक इसी गीता के
अनुसार समरूप उपदेशात्मक एवं कल्याण कारक ग्रन्थ हैं, क्योंकि
दोनों के रचयिता महर्षि वेद व्यास जी हैं, दोनों के मंत्रों की
संख्या सात सौ है । दोनों के श्रोता और वक्ता भी एक ही हैं ।
अर्जुन का ही नाम सुरथ है और वक्ता, मेधा, बुद्धि, सारथि
बासुदेव हैं । दोनों के अवतारों का प्रयोजन भी एक ही है ।
निम्न श्लोकों पर ध्यान दीजिए-
यदा-यदा हि धर्मस्य, ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य, तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥गीता ।४।
इत्थं यदा यदा बाधा, दानवोत्था भविष्यति ।
तदा तदावतीर्याऽहं, करिष्याम्यरि संक्षयम् ॥दु. स, १२॥
दोनों की प्रारम्भ में स्थिति भी समान है । जैसे अर्जुन
परिवार के प्रति मोहित है, उसी प्रकार सुरथ भी मोह ग्रस्त है ।
इस प्रकार दोनों की स्थैत्य एवं उपदेशात्मकता की समता तथा
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १४
एक रूपता पूर्णतः विद्यमान है । यही नहीं अपितु फलागम की
उपलब्धि भी समान है । अर्जुन भी सुरथ की तरह विजयी
होकर राजा हुआ । अतः सुधीजन स्वयं इसका निर्णय करें ।
दुर्गा-सप्तशती में तीन चरित्र हैं । प्रथम चरित्र से यह
शिक्षा मिलती है कि जगत का कोई कार्य अपनी सोयी हुई शक्ति
को जगाये बिना कभी नहीं हो सकता । स्वयं कोई कार्य नहीं
कर सकते । इसके अतिरिक्त पशु-शक्ति से बुद्धि-शक्ति की श्रेष्ठता
भी इस चरित्र में प्रतिपादित हुई है । पशु-बल सम्पन्न मधु-कैटभ
बुद्धि-बल युक्त विष्णु का सामना करते रहे; जब अहंकार से
उन्मत्त होकर वरदान देने के लिये तैयार हो गये, तब विष्णु ने
बुद्धि शक्ति का प्रयोग कर उन्हीं के वध का वर मांग लिया ।
यही बुद्धि-शक्ति पराम्बा माँ ही है जो कि ‘बुद्धिरूपेण संस्थिता !
मूल ग्रन्थ में उक्त है ।
एक बात और है कि वैष्णव और शक्ति परस्पर सद्भाव
पूर्ण होकर एक दूसरे के इष्ट का सम्मान करें । विष्णु की ही शक्ति
पराम्बा है; और पराम्बा की सहायता से विष्णु जी के समस्त
कार्य होते हैं जैसा कि मधु-कैटभ प्रसङ्ग से स्पष्ट है ।
द्वितीय चरित्र में ‘संघे - शक्ति’ की शिक्षा दी गई है ।
बहुत बड़ा असुर ‘महिषासुर’ महा-शक्ति के द्वारा शीघ्र मारा
जाता है । वह महा-शक्ति सभी देवताओं के मिलने से तथा सभी
देवों के अस्त्र-शस्त्रों से युक्त होने पर ही दैत्य-दलन में समर्थ
हुई है । परिवार एवं समाज के प्रत्येक व्यक्ति को यह संगठन
एवं सहयोग की शिक्षा लेनी चाहिए । मधु-पीने की बात का भी
अर्थ उत्साह है । प्रायः जीवन में देखा गया है कि उत्साह के
अभाव में बड़े-बड़े परमाणु अस्त्रों के भण्डारण का प्रयोग भी
निष्फल ही होता है, किन्तु उत्साह तथा अपनी निजी संगठन शक्ति
यदि नहीं है तो केवल अस्त्र-शस्त्र से भी सिद्धि नहीं मिलती । ठीक
इसी प्रकार उत्साह एवं साहस तो बहुत है, किन्तु न संगठन है
१५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
और न युद्ध के उपकरण, तो भी सिद्धि नहीं मिलती, अतः दोनों
ही अनिवार्य हैं ।
तृतीय चरित्र में यह शिक्षा है कि कोई उत्साही, धार्मिक,
समाज हितैषी एक ही शक्ति सत्कार्य के लिए आगे बढ़े तो उसे
अपने आप शक्तियाँ मिलने लगती हैं । इसके साथ यह भी ध्यान
रहना चाहिए कि जब अन्य किसी उपाय से आसुरी शक्ति का
दमन न हो तभी युद्ध का प्रयोग करना चाहिए । आपको जो भी
दैवी-शक्ति मिले उसका उपयोग संहार के लिए नहीं सुधार के
लिए, निर्माण के लिए ही करना चाहिए ।
इन तीनों चरित्रों में इच्छा, ज्ञान-क्रिया का सुन्दर समन्वय
है । इच्छाओं का होना स्वाभाविक है, किन्तु सावधानी से सजगता
से उस इच्छा को ज्ञान से सम्बन्धित करके ही क्रियान्वित करना
चाहिए । बिना विचारे, विवेक का अनादर करक इच्छा-पूर्ति
का प्रयत्न महाभारत में दुर्योधन और इस ग्रन्थ में मधु-कैटभ एवं
शुँभ-निशुँभ आदि का है । इच्छा-शक्ति महालक्ष्मी, ज्ञान-शक्ति
महा सरस्वती और क्रिया शक्ति महा काली है । ये तीनों एक
ही हैं । इनकी आराधना से मुक्ति ही सुलभ होती है, किन्तु
पञ्च क्लेशों में फँसा जीव कामनाओं के साथ जीवित रहता है ।
अतः यही पराम्बा ऐसे जनों को भी उनके मनोरथों की पूर्ति
करके श्रद्धा जगाकर धर्म में प्रवृत्त करती है । इनका उद्देश्य
भौतिकता में फँसाना नहीं, अपितु वैराग्य देकर अशुभ से हटा
शुभ में लगाना है । कुछ प्रयोग नीचे दिये जा रहे हैं-
कामना के अनुसार मंत्र से लाल चंदन सहित घृत द्वारा
पाँच माला हवन करके उस मंत्र का विधिवत् अनुष्ठान करने से
सिद्धि मिलती है ।
१) पत्नी प्राप्ति के लिए-
पत्नीं मनोरमां देहि, मनोवृत्तानुसारिणीम् ।
तारिणीं दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम् ॥
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १६
२) रोग नाश के लिये-
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा,
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां,
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति । ११/२६
३) उत्तम वर प्राप्ति के लिये-
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि ।
नन्दगोप सुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः ॥
श्रीमद्भागवत १०/२२
उक्त मंत्र से लाल चन्दन मिश्रित घृत से पाँच माला प्रथम
दिन हवन करके प्रतिदिन २१ इक्कीस माला जपने से निश्चित
ही योग्य वर (ईश्वर के समान) मिलता है ।
४) विपत्ति नाश के लिए-
(क) देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीते-
र्नित्यं यथासुर वधादधुनैव सद्यः ।
पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु,
उत्पात पाकजनितांश्च महोपसर्गान् । ११/३४
अथवा
(ख) शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे,
सर्वस्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोस्तुते । ११/१०
५) भय नाश के लिए-
सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते,
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोस्तुते ।
अथवा
एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रय भूषितम् ।
पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोस्तुते ।
अध्याय ११/२३-२४
१७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
६) बाधा शान्ति हेतु-
सर्वा बाधा विनिर्मुक्तो धन-धान्य सुतान्वितः ।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः ॥ १२/१३
अथवा
सर्वा बाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरि विनाशनम् ॥ ११/३६
७) दरिद्रता नाश हेतु-
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः,
स्वस्थैःस्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।
दारिद्र्य दुःख भय हारिणि का त्वदन्या,
सर्वोपकार करणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता ॥ ४/१७
८) मोक्ष प्राप्ति हेतु-
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्त वीर्या,
विश्वस्य बीजं परमासि माया ।
सम्मोहितं देवि समस्तमेतत्,
त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्ति हेतुः ॥ ११-५ ॥
इसके अतिरिक्त लक्ष्मी-प्राप्ति के अभिलाषी को नित्य-
प्रति चतुर्थ अध्याय तथा ज्ञान-प्राप्त्यर्थ ग्यारहवें अध्याय का पाठ
करना चाहिए ।
कुछ सौंदर्य लहरी के भी सिद्ध प्रयोग दिये जा रहे हैं ।
कामना अनुसार यंत्र को स्वर्ण-धातु से बनाकर पूजन करें
और उनमें लिखी संख्यानुसार सौंदर्य-लहरी के उस श्लोक का
जप करें ।
१-मंत्र ६३ :
[यंत्र: ह्रीँ] प्रतिदिन तीस हजार के जप क्रम से तीस
दिन तक करने से वशीकरण होता है ।
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १८
२-मंत्र ६० :
[यंत्र: श्रीं] पैंतालीस दिनों तक एक हजार नित्य जपने
से 'सर्वज्ञान' होता है ।
३-मंत्र ३२ :
[यंत्र: श्रीं] पैंतालीस दिनों तक प्रतिदिन एक हजार
जपने से धन वृद्धि होती है ।
४-मंत्र २७ :
[यंत्र: ह्रीं] पैंतालीस दिनों तक प्रतिदिन एक हजार
जपने से ईश्वर दर्शन एवं आत्म ज्ञान होता
है ।
५-मंत्र ८८ :
[यंत्र: ह्रीं] २१ दिन तक छः हजार जपने से सभी रोगों
का नाश ।
६-मंत्र ३० :
[यंत्र: ॐ] छियाणवें दिन तक एक हजार नित्य जपने
से आधिदैविक शक्ति प्राप्ति ।
७-मंत्र ५२ :
[यंत्र: रं] पैंतालोस दिनों तक प्रतिदिन एक हजार
जपने से कान तथा नेत्र चिकित्सा ।
orधis right near the left margin! OR, wait, could it beध? Wait, look at ध-मंत्र ७६ :: Wait, is it ध? If the vertical stem broke off, only the curved left part would print, which looks EXACTLY like ६! Wait, but what if it's ६? If it were ६, what would the one above it be? द? Why would दbe followed by६? Wait, could the one above be ८? No, ८has no reason to be above६. Could it be ५? No, it's NOT ५. What if the first one is ८? No, in Hindi: १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०. Could it be ८-मंत्र १६and९-मंत्र ७६? Wait! In Bengali or Maithili or something? No, this is standard Hindi. Wait, what if it's दandध? Let's look at द-मंत्र १६ : andध-मंत्र ७६ : Wait, what if it isध? Let's look at how it appears: in transcription, should we write ध-मंत्र ७६ :or६-मंत्र ७६
२० ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
'कवच'
पञ्च क्लेशों तथा कामादि प्रवल शत्रुओं से लड़ने से पहले
कवच पहिनना आवश्यक है । रावण से युद्ध करते समय श्रीराम
ने 'आदित्य हृदय' कवच धारण किया था । प्रत्येक अङ्गों की
रक्षा पराम्बा के नाम विशेष से की जाती है । माँ के उस नाम
के स्वरूप का उस अङ्ग में ध्यान करने से पूर्ण रक्षा होती है ।
यह कवच स्वयं ब्रह्माजी ने बताया है । इसका पाठ आवश्यक है
मात्र बाह्य आयुध रक्षा नहीं करते, रक्षा तो पराम्बा ही करती
है । भगवान् का नाम ही रक्षक है ।
कवच अभेद विप्र पद पूजा,
यही सम विजय उपाय न दूजा । मानस ।
समय आने पर मृत्यु तो सभी की होती है, किन्तु मरने
पर भी अमर हो जाने वाले भगवान् के भक्त ही होते हैं; क्योंकि
वे लोग भगवान् के नाम का कवच पहनते हैं । अपने-अपने इष्ट-
देव का अलग-अलग कवच होता है । साधकों को अपने इष्ट
के अनुसार कवच धारण करना चाहिए । दृष्टान्त के लिए निम्न
श्लोक उद्धृत हैं-
शंखिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वार-वासिनी ।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी ॥ । २३ ।
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका ।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ॥ । २४ ।
इसी प्रकार तत्तदङ्गों में देवीस्वरूप का ध्यान करना
चाहिए-
प्रार्थना (शरण पड़े)
उद्धार करो हे मातः ! तिहारो शरण पड़े ।
भव पार करो हे मातः ! तुम्हारो शरण पड़े ॥
कैसे तेरा नाम रटायें, कैसे तुमसे लगन लगायें ।
हृदय जगा दो मैय्या, तुम्हारी शरण पड़े ॥
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ २१
ऐसी अंतर ज्योति जगाना, हम दीनों को शरण लगाना ।
भटकों को राह दिखाना, मैय्या तेरी शरण पड़े ॥
अर्गला
अर्गला शब्द का अर्थ अवरोध, सांकल या कुण्डा होता है ।
कपाटों के पीछे एक और लोहे या लकड़ी का मोटा डंडा लगाया
जाता है । यदि किसी प्रकार सांकल या कुण्डी खुल भी जाये तो
भी वह डंडा (मूसला या अर्गला) कपाटों को दृढ़ता से बन्द
रखता है इसी प्रकार जीवन को सुरक्षित रखने के लिए यह
अर्गला स्तोत्र है । इसका पाठ करना आवश्यक है , आप जानते
हैं कि भक्त भगवान् की कृपा से ही विकार दूर कर पाते हैं ।
इस अर्गला स्तोत्र के पढ़ने से ऐसा मालूम होता है कि केवल
सांसारिकों के लिए ही नहीं अपितु मुमुक्षुओं के लिए भी
इसका पाठ अनिवार्य है ।
वस्तुतः जो जिस भावना से भगवती का स्मरण करता है,
करुणामयी माँ उसे वही प्रदान करती है । जैसे-“रूपं देहि जयं
देहि, यशो देहि, द्विषो जहि” श्लोकार्द्ध बार-बार आया है ।
इसके शब्दों के अर्थ भावानुसार ही फलितार्थ होते हैं । 'रूपं'
शब्द को ही लीजिए-रूप्यते, अनेनेतिरूपम्-निरूपणीयम् इस अर्थ
में रूप शब्द परमात्मा के लिए हैं । "वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः”
गीता से स्पष्ट है कि सभी वेद-शास्त्रों द्वारा प्रतिपाद्य पदार्थ
परमात्मा ही है, शारीरिक अंग-रंग-नख-शिख सम्बन्धी रूप
अभिप्रेत नहीं । यहाँ माँ से प्रार्थना की गई है कि हे माँ ! मुझे
उस परमात्मा का ज्ञान कराओ, जो श्रेय-प्रेय दोनों हैं; किन्तु
यह ज्ञान तब तक नहीं होता, जब तक कामादि विकारों पर
विजय नहीं मिलती । उपनिषद् में यह घोषणा इस प्रकार की
है :-
ना विरतो दुश्चरितान्ना शान्तो ना समाहितः ।
नाशान्त मानसो वापि, प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥
२२ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
जब तक जीवन से दुश्चरित्र निवृत्त नहीं होते, काम -
क्रोधादि विकार दूर नहीं होते, तब तक अशान्त मन से परमात्मा
की प्राप्ति हो ही नहीं सकती । इसी से साधक प्रार्थना करता है
कि मुझे इन शत्रुओं से विजय दिलाओ, बिना आपकी कृपा के
विजय नहीं मिल सकती । श्री रामजी ने भी शक्ति की पूजा की
थी । अर्जुन ने महाभारत के पहले दुर्गा की आराधना की थी;
अतः विजय प्राप्त करने के लिए 'जयं देहि' कहा गया है । इसके
बाद 'यशो देहि' शब्द बहुत स्पष्ट है । जीवन में यदि अच्छे
कार्य न हो सके, ऐसे शास्त्र-विरुद्ध आचरणों से तो जीवित ही
मर जाना श्रेयस्कर है । भगवान् ने अर्जुन से कहा था कि युद्ध -
पलायन से शत्रु तुम्हारी निंदा करेंगे तब तुम कैसे रह पाओगे ?
‘कीर्तिर्यस्य स जीवति’ का सिद्धान्त है ।
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते । गी/२/३४
जीवन में जितने दिन जीवित हो, उतने ही दिन यशस्वी
होकर जीना चाहिए । इसलिए यश की कामना की गई है ।
द्विषो जहि-जिन विकारों को जीतने के बाद ही साधक
को साध्य की उपलब्धि होती है । उन विकारों का मारना
उतना सरल नहीं है । इसी से माँ से प्रार्थना की गई है कि हे
माँ ! आप करुणा करके हमारे भीतर बसे हुए इन शत्रुओं को
नष्ट कर दो । तुलसी दास जी ने भी प्रार्थना की है-
मम हृदय प्रभु भवन तोरा, वहाँ बसे आय बहु चोरा ।
ते करहिं उपद्रव नाथा, मर्दहिं मोहि जानि अनाथा ॥
इसी प्रकार संस्कृत के विद्वानों ने शत्रुओं पर विजय पाने
के लिए अपने इष्ट देव से प्रार्थनायें की हैं । एक भक्तने काम -
वासना से पीड़ित होकर भगवान् शंकर से प्रार्थना की है :-
भवदुपगमशून्ये मन्मनो दुर्ग मध्ये,
निवसति भयहीनः कामवैरिन् ! रिपुस्ते ।
२३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
स यदि तव विजयस्तूर्णमागच्छ शम्भो !
नृपतिरधिमृगव्यं किन्नुकान्तारमेति ।
हे शिव जी ! आपका शत्रु काम मेरे मन में है; इसे मार
दो । यहाँ भी पराम्बा से शत्रुओं को नष्ट करने की प्रार्थना की
गई है । इस अर्गला स्तोत्र में भगवती के विविध नामों को
लेकर यही वाक्य बार-बार दोहराते हुए भक्त ने निवेदन किया
है । अन्त में ‘पत्नीं मनोरमां देहि, मनोवृत्तानुसारिणीम्, ‘तारिणीं’
दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम् ।' शास्त्रीय तीनों--(धर्म,
काम, अर्थ, दैविक, दैहिक, भौतिक) अर्थों की दृष्टि से लिखा
गया है । केवल आधिभौतिक अर्थ करने से सभी के लिए वह
शास्त्रों का अर्थ पूर्ण नहीं हो सकता है । जैसे एक संन्यासी के
लिए या ब्रह्मचारी के लिए पत्नी मांगना अनुचित है । अतः
उनके लिए यहाँ पत्नी शब्द का अर्थ ‘ब्रह्माकार वृत्ति या
भगवदाकार वृत्ति' है । वास्तव में अविद्या और उसका कार्य
संसार रूपी कूप है । उसमें अज्ञान से पड़ा हुआ जीव कैसे पार
हो, उसके लिए कुछ आश्रय चाहिए । उस आश्रय का अर्थ यहाँ
पत्नी शब्द से कहा गया है । पाणिनिजी ने भी ‘पत्युर्नो यज्ञ
संयोगे' कह कर यह सिद्ध किया है कि धर्म सहचारिणी बनकर
पतन से बचाने वाली पत्नी होती है । साधक जिस कोटि का
होता है, उसके
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ २४
कर्तृत्व भोक्तृत्व समाप्त नहीं होगा, तबतक जन्म-मरण से मुक्ति
नहीं मिल सकती है । वास्तव में जीव नित्य मुक्त ही है,
किन्तु भ्रान्ति वस अपने को कर्ता, भोक्ता, जन्मने, मरने वाला
समझकर दुःखी हो रहा है । अतः ब्रह्म-विद्या से प्रार्थना है कि
मुझे इस संकट से बचाने के लिये आप की कृपा आवश्यक है ।
अथ कीलकम्
अर्गला स्तोत्र के उपरान्त "कीलक" का पाठ किया
जाता है । कीलक के विषय में तान्त्रिकों के अनेक मत हैं !
सात्विक साधकों के लिये अनुपादेय होने के कारण उन प्रसङ्गों
को यहाँ नहीं लिया गया है, केवल दुर्गा सप्त-शती के कुछ
आध्यात्मिक भाव साधकों के मनन करने के लिये प्रस्तुत किये
जा रहे हैं ।
“ददाति प्रतिगृह्णाति, नान्यथैषा प्रसीदति
इत्थं रूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ॥
इस मंत्र पर विद्वानों ने बहुत विचार किया, किन्तु प्रायः
इसका अर्थ सभी प्रकार के लोगों के लिए यही ठीक है जो
गोरखपुर गीता प्रेस वालों ने किया है । न्यायोपार्जित द्रव्य
समर्पित करके उन्हीं का समझ कर प्रार्थना करें —हे माँ ! यह
सारा धन आपको समर्पण कर रहा हूँ, इसमें मेरा कुछ नहीं,
(मुझको इतना ही क्या कम है ? ) । ऐसे कृतज्ञ हृदय के गद्गद्
भाव से माँ के चरणों में निवेदन करे । पुनः ऐसी भावना करे
कि माँ कह रही है-“मैंने स्वीकार किया”-अब तू इसे प्रसाद
रूप समझ कर संसार यात्रा के निर्वाह में सदुपयोग कर । इस
प्रकार माँ की आज्ञा लेकर, प्रसाद समझ कर धर्म - शास्त्र के
अनुसार सदुपयोग करते हुए जीवन यापन करे ।
यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि समर्पण का
जीवन में बहुत महत्त्व है । समर्पण के सम्बन्ध में भागवतकार
का मत देखिए :-
२५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा, बुद्ध्याऽत्मना वानुसृतस्वभावात् ।
करोति यत् यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत् ॥
भागवत् ११/३/३६
शरीर, वाणी, मन, इन्द्रियाँ, बुद्धि, आत्मा या अपने जाने
अनजाने में मनुष्य जो-जो कार्य करे, उसे वह परब्रह्म नारायण
को अर्पण कर देने चाहिए। इससे अधिक क्या कृपा होगी भग -
वान् की; जो जीव के सारे कार्यों की ठेकेदारी स्वयं पर ले रहे
हैं । तुलसीदास ने इस समर्पण के भाव को समझकर ही 'तुम्हिं
निवेदित भोजन करहीं,' (मानस) के वाक्य द्वारा साधकों को
एक ही साथ श्रेय - प्रेय का अमृत पान कराया ।
शास्त्रीय आचरण ही आचरणीय है, शास्त्र विरुद्ध कभी
कोई आचरण नहीं करना चाहिए । आज समाज में 'शाक्त' इस
लिए बदनाम है कि पराम्बा जगदम्बा के बहाने मद्य - मांस का
सेवन करते हैं, जीवों की बलि चढ़ाते हैं, जो शास्त्र विरुद्ध है ।
कोई भी देवता शास्त्रीय विरुद्ध आचरण को क्षमा नहीं कर
सकता । इसका प्रमाण श्रीमद्भागवत के पाँचवें स्कन्द में
वर्णित प्रसङ्ग में दिया गया है – दन्दह्यमानेन वपुषा सहसोच्च -
चाट देवी भद्रकाली ...................स्वपार्षदैसहजगौ ननर्त च ।
५।९।१७।१८ । जब जड़ भरत की बलि भगवती को दी जाने
लगी तो माँ स्वयं प्रकट होकर उस महापुरुष की रक्षा करती हैं ।
यदि माँ को हिंसा के द्वारा रक्त पान पसन्द होता, तो वे क्यों
बचाती ? यह बार-बार दोहराया गया है कि बलि शब्द राजा
बलि ने अपना सर्वस्व समर्पण करके यह बलिदान शब्द प्राप्त
किया है । अर्थात् परमात्मा के चरणों में सर्वथा समर्पित होना
ही बलिदान है अथवा काम - क्रोधादि विकार रूपी पशु-वृत्तियों
को नष्ट करना ही वास्तविक बलि देना है । इसको स्पष्ट करने
के लिए पञ्च मकार पहले समझाए गए हैं । अतः आप साधकों
को तो सदैव अपने इष्ट के समक्ष नत मस्तक होकर समर्पण करना
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ २६
ही हित कारक है । अतः श्रद्धा पूर्वक समर्पण भाव से निवेदित
करते हुए यह गा उठे–
मेरे देवता, मुझको देना सहारा ।
कहीं छूट जाय न दामन तुम्हारा ॥
बिना तेरे मन में समाये न कोई ।
लगन का ये दीप बुझाये न कोई ॥
तुम ही मेरी किश्ती हो, तुम ही मेरे किनारा,
कहीं छूट जाय न दामन तुम्हारा ॥
तेरे रास्ते से हटाती है दुनियाँ ।
इशारे से मुझको बुलाती है दुनियाँ ॥
मुझे बचा सकता है, केवल तेरा सहारा ।
कहीं छूट न जाय दामन तुम्हारा ॥
तुम्हारा ही गुण गान गाता रहूं मैं ।
हृदय में तुम्हीं को ध्याता रहूँ मैं ॥
तुम्हारे सिवा अब लगे कुछ न प्यारा ।
कहीं छूट जाय न दामन तुम्हारा ॥
नवार्ण
नवार्ण वर्णन के पहले कुछ बातें समझनी आवश्यक हैं ।
यह जीव भ्रान्तिवश दुःखी है । अतः आणवी दीक्षा (मंत्र द्वारा)
श्री चक्र पूजन, प्राणवी शक्ति-शाम्भवी-इन तीन दीक्षाओं में से
कोई एक ग्रहण की जाती है, तभी गुरु कृपा से निम्न पाँच प्रकार
के भ्रम दूर होते हैं—
जीवेश्वरौ भिन्न रूपौ इति प्राथमिको भ्रमः ।
आत्मनिष्ठं कर्तृगुणं वास्तवं वा द्वितीयकः ॥
शरीर त्रय संयुक्तो जीवः सङ्गी तृतीयकः ।
जगत्कारण रूपस्य विकारित्वं चतुर्थकः ॥
कारणाद् भिन्न जगत ! सत्य त्वे पञ्चमो भ्रमः ॥
२७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
(१) जीव तथा ईश्वर भिन्न है (२) आत्मा में कर्तापन का
आरोप (३) जीव स्थूल सूक्ष्म कारण तीनों शरीर से युक्त है।
(४) आत्मा जगत् का कारण होने से विकारी है। (५) जगत्
आत्मा से भिन्न सत्य है।
वस्तुतः ब्रह्म की सत् शक्ति के आधार पर भौतिक सृष्टि
की प्रतीति (हो रही) है, चित्त में चेतन जगत् की प्रतीति, आनंद
से जगत् में प्रियता की प्रतीति है। इस प्रकार जगत् सत्, चित्,
आनंद रूप ही है, भ्रम से अन्य प्रतीत हो रहा है। यही भ्रम-
निवृति हेतु साधना की जाती है। साधक का यह शरीर सात
मञ्जिल का भवन है—
(१) मूलाधार (२) स्वाधिष्ठान (३) मणिपूर (४) अनाहत
(५) विशुद्ध (६) आज्ञा (७) सहस्त्रार, ये चक्र ही
सात मञ्जिलें हैं। इनमें प्रत्येक का चिन्तन किया जाता है।
जैसे—
मूलाधार (पैर के अंगूठे से गुदा तक) में पृथ्वी तत्व, पीत
वर्ण, चौकोर आकृति, लं बीज, हाथी सवारी, चार दल कमल में
वं शं षं सं, लिखा है, लाल रंग है—ब्रह्म-ब्रह्माणी लाल रंग के
शिशु रूप में विराजमान हैं, डाकिनी-योगिनी है, स्वयम्भू लिङ्ग
साढ़े तीन वालिस्त कुण्डली लिपटी है। इसी का जागरण किया
जाता है।
इसी प्रकार 'स्वाधिष्ठान' में छः दल सिन्दूर रंग के हैं
जिनमें वं, भं, मं, यं रं, लं, वर्ण हैं। मणिपूर में दश दल मेघ
वर्ण के हैं, ड से फ तक के वर्ण हैं। 'अनाहत' में बारह दल धूम्र
वर्ण के हैं उनमें क से ठ तक वर्ण हैं। विशुद्ध में सोलह दल
गुलाबी रंग के हैं इसके १६ वर्ण अ से अः तक स्वरों से युक्त
हैं। आज्ञा चक्र में दो दल तथा ह, क्ष दो वर्ण अंकित हैं।
सहस्त्रार चक्र में पचास वर्ण बीस आवृत्ति में हैं। इनका विस्तृत
वर्णन 'षट्-चक्र-निरूपणम्' में देख सकते हैं।
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ २८
ऐं-यह ज्ञान प्रदात्री सरस्वती का बीज मन्त्र है । सरस्वती
रहस्योपनिषद् तथा योग शिखोपनिषद् ग्रन्थों में इस मंत्र के
विस्तार, प्रयोग एवं महत्व का अवलोकन किया जा सकता है ।
वाक्-सिद्धि के प्रयोग शास्त्रों में है । सर्वं वाक्यात्मका मात्रा वेद
शास्त्राणि कृत्स्नशः । पुराणानि च काव्यानि भाषाश्च विविधा
अपि । सप्त स्वराश्च गाथाश्च सर्वनाद समुद्भवः ।
एषा सरस्वती देवी सर्वभूत गुहाशया ।
य इमां वैखरीं शक्तिं योगी स्वात्मनि पश्यति ।
स वाक् सिद्धिमवाप्नोति सरस्वत्याः प्रसादतः ॥
इस बीज मंत्र का जापक विद्वान् हो जाता है । एक ही
पराशक्ति द्वारा शरीर में सभी क्रियायें सम्पन्न होती हैं । जैसे—
(१) क्रियावती—शरीर कम्पादि, नृत्यादि, जगाना, (२) कला-
वती—३६ छत्तीस तत्वों से व्यतिरेक एवं जीव शुद्धि प्रकार,
(३) वर्णात्मिका—मंत्रों द्वारा कुण्डलिनो जगाना, (४) वेधमयी-
षट् चक्र वेध द्वारा-इस प्रकार गुरु जनों से पूछ कर प्रक्रिया का
ज्ञान होता है । ऋग्वेद १/२२/१६४/४५ देखें—चत्वारि वाक्
परिमितानि पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः । गुहा त्रीणि
निहितानेङ्गयन्ति । तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति—परा, पश्यन्ति
मध्यमा ये तीनों वैखरी में निहित हैं ।
(१) ऐं—वाक् बीज है, वाणी का देवता अग्नि है, सूर्य
भी तेज रूप अग्नि ही है सूर्य से ही दृष्टि मिलती है; दृष्टि
सत्य की पीठ है, यही सत्य पर ब्रह्म है । वृहदारण्यकोपनिषद्
(में) सत् ब्रह्म का प्रतिपादक है । इसी वाग्भव कूट में काम
कला और शक्ति-कूट ह्रीँ युक्त है, यह लक्ष्मी का बीज मंत्र है,
यही मंत्र राज है । सृष्टि का उदय सोऽकामयत यही आदि-
विद्या तथा सृष्टि का उदय-आकाशाद् वायुः आदि हादि
विद्या है । दोनों ही इसी शक्ति के खेल हैं । इस प्रकार 'ऐं'
का उदय अग्नि है । (मणिपूर) आयतन वाक्शक्ति का विशुद्ध-
२६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
चक्र-विकास जिह्वाग्र भाग है। इस बीज के जप से मूर्ख भी
विद्वान् हो जाता है।
(२) ह्रीं—यह माया या लक्ष्मी का बीज मंत्र है। इसका
उदय आकाश से है। पीठ विशुद्ध में, आयतन सहस्रार में, किन्तु
श्रीं का उदय आकाश में होने पर भी आयतन आज्ञाचक्र में
है। ह्रीं का सम्बन्ध श्रीं से है। वैसे तो ऐं, ह्रीं, क्लीं तीनों सर्व
काम-प्रद बीज हैं। सभी का सभी चक्रों से सम्बन्ध है 'अ+इ=ए,
ए+अ=ऐ. अकारो वै सर्वा वाक् सैवा स्पर्शान्तस्थोष्माभि-
र्व्यज्यमाना बह्वी नाना रूपा भवति (ऐतरेय) अकार विशुद्ध
सहस्रार में भी है। इसी अकार से ही सभी वर्ण बने हैं। ॐ में
अकार ही मुख्य है।
(३) क्लीं—इस बीज में पृथ्वी तत्व की प्रधानता सहित
वायु तत्व है-क = जल-पीठ मूलाधार आयतन, काम संकल्प जनक
होने स स्वाधिष्ठान; अनाहत, तथा आज्ञा चक्र से सम्बन्धित है
और वाक्-शक्ति का सम्बन्ध संकल्पों से होता है; अतः क्लीं
का सम्बन्ध 'ऐ' से है क्+ल्+ई+नाद-बिन्दु। क्-जल तो प्राण
है, सुखार्थक है, प्राण ही वायु है, वायु का कारण आकाश है।
प्राण स्वयं ब्रह्म है-कं, खं, प्राण तीनों ही ब्रह्म वाचक हैं ।
उपनिषद् में प्राणोह्येष........। प्रयोग है। अन्नमयं हि सौम्य मनः
आपोमयः प्राणस्तेजो मयी वाक्-लं से पृथ्वी, पृथ्वी से अन्न,
अन्न से मन मूलाधार पृथ्वी है। अतः 'क' जल से प्राण तप 'ल'
पृथ्वी से मन एवं प्राण + मन का विकास आज्ञाचक्र है. यही
आनन्द का स्थान है। 'आनन्दो ब्रह्मेतिव्यजानात्' प्राण का
निवास हृदय है। प्राण ही परमात्मा है, परमात्मा ही प्रेम-
स्वरूप है 'हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति' 'सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टः से
सिद्ध ही है। आदित्यो वै प्राणाः वचन है । इन प्रमाणों से
सिद्ध है कि तीनों बीज परमात्मा वाचक हैं। चामुण्डा शब्द का
अर्थ पहले हो चुका है। स्वयं प्रकाश चित् तत्व स्वरूपिणी पराम्बा
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ३०
है और 'विच्चे' का अर्थ समर्पण या नमस्कार है; अर्थात् ज्ञान
की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती तथा सम्पूर्ण संकल्पों की
अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी और सम्पूर्ण कर्मों की स्वामिनी महाकाली
स्वरूप में सच्चिदानन्द रूप ही हैं। उनके इस अभिन्नरूप को
नमस्कार है; नमस्कार का अर्थ समर्पण है; व्याकरण में सम्प्रदान
चतुर्थी का यही अर्थ है। इसी से नमः के योग में चतुर्थी होती
है आप ये भी जान चुके हैं कि ये तीनों बीज परमात्मा के
वाचक हैं। सभी आकृतियाँ सत् तत्व में (काली रूप) सभी
प्रतीतियाँ चित् तत्व में (महालक्ष्मी) सभी प्रीतियाँ आनन्द तत्व
(महा सरस्वती) में ही विवर्त हैं।
३१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
'रात्रि-सूक्त'
नवार्ण मंत्र के जप के पश्चात् 'रात्रि-सूक्त' स्तोत्र के पाठ
का क्रम है। इसी स्तोत्र के द्वारा ब्रह्माजी ने भगवान् को योग
निद्रा से जगाया था। यह जीव न जाने कब से मोह की रात्रि
में सोया हुआ है। उसका जागरण दैवी आराधना से ही
सम्भव है। रात्रि-सूक्त में पराम्बा की की गई स्तुति अत्यन्त ही
महत्वपूर्ण है। अन्त में बहुत ही स्पष्ट कहा गया है कि तुम ही
इस जगत् की मूल शक्ति हो—
परा पराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ।
यच्च किञ्चद् क्वचिद् वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ।
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा ॥ रा०सू० १०-११
हे जगदम्बे ! परा एवं अपरा प्रकृति तुम ही हो, जो कुछ
भी स्थूल सूक्ष्म रूप से इन्द्रियगोचर है, तथा प्रकृति से परे तत्व
है; वह सब तुम ही हो। स्पष्टतः 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' की यही
घोषणा है। हमारे पुराणों की यही रीति है कि जो प्रति-
पाद्य तत्व परमात्मा है उसी को लक्ष्य रूप से दिखाया जाता है।
चाहे वह नारद-पुराण में नारद, विष्णु-पुराण में विष्णु तथा देवी-
भागवत में देवी को कहा जाय, सबका तत्व एक ही है। वही
ब्रह्म है, परमात्मा है, परा शक्ति है-यया ततमिदं सर्वम् को गीता
में 'येन सर्वमिदम् ततम्' कहा है 'मेरी ओर निहार' गीत में
इसी परमात्मा, परा शक्ति, परम तत्व की करुणामयी उपासना
करके द्रवित किया गया है। गीत की मुख्य पंक्तियाँ उद्धृत हैं—
करुणामय प्रतिपाल प्रभो, करुणा दृष्टि निहार ।
जीवन ज्योति प्रकाशक, प्रियतम मेरी ओर निहार ॥
साधन साध्य उपाय उपेय तुम मेरे हो आधार ।
अबकी बार उबार दयानिधि आयो तेरे द्वार ॥
सब तुममें तुममें सब देखूँ चिद् विलास संसार,
आत्म ब्रह्म की लखूँ एकता अनुभव का दीदार,
अबकी बार उबार दयानिधि, मेरी ओर निहार ॥
भक्ति संगीत सौरभ पृ० १०
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ३२
अथ प्रथमोऽध्यायः
दुर्गा-सप्तशती के माध्यम से आप श्रवण कर रहे हैं कि
जीव राग, द्वेष, स्मिता, अभिनिवेश तथा अविद्या इन पञ्च
क्लेशों से बंधा हुआ है। अपने स्वरूप को पहिचाने बिना जीव
इन पाँचों के बन्धन से छूट नहीं सकता तथा दुःखों से भी
निवृत्ति नहीं हो सकती। प्रेमियो ! मानव-योनि ही एक ऐसा
जीवन हैं जिसमें जीव अपने स्वरूप को जानकर जन्म-मरण के
चक्र से उन्मुक्त हो सकता है। दूसरी योनियों में यह सामर्थ्य
नहीं । आप सब बड़े भाग्यशाली हैं जो भगवती गंगा मैय्या
के तट पर माँ पराम्बा भगवती दुर्गा-सप्तशती के माध्यम से
राम के दास सम बाबा रामदास के आश्रम में अपने जीवन
दर्शन का श्रवण कर रहे हैं। दुर्गा-सप्तशती में तान चरित्रों
का वर्णन है। हमारे जीवन में भी प्रतिक्षण तीन चरित होते
रहते हैं। पहले मन में इच्छा उदय होती है, तत्पश्चात् उस
इच्छा का ज्ञान होता है और तब उचित इच्छा की पूर्ति के
लिए प्रयत्न होता है। अवस्थायें भी शैशव, यौवन, वृद्ध तीनों
ही हैं। जीवन की पहली अवस्था बचपन है। माँ के पेट से आया
शिशु सबको प्रिय होता है, क्योंकि उसके रोम-रोम में निष्छल
पावन प्रेम झलकता है उसे न किसी के प्रति राग होता है न
द्वेष ही। जैसे ही वह धीरे-धीरे बड़ा होता है, उसकी आँखों
कानों के द्वारा संसार प्रविष्ट होता जाता है। उसमें 'मेरा-तेरा'
का प्रवेश होते ही किसी के प्रति राग तो किसी के प्रति द्वेष
प्रारम्भ हो जाता है। क्रियायें भी तत्त् रूप होने लगती हैं।
यही जीवन की पहली अवस्था है।
दूसरी अवस्था यौवन (जवानो) को है जिसमें विविध
प्रबल इच्छाओं का जन्म होता है। युवक बैठे हो बैठे मनो-
राज्यों द्वारा आकाशो महल बनाते रहते हैं । उनके विचार
उन्हों को झकझोरते रहते हैं। ऐसो अवस्था में यदि किसी