सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 156 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 39

१५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
और न युद्ध के उपकरण, तो भी सिद्धि नहीं मिलती, अतः दोनों
ही अनिवार्य हैं ।
तृतीय चरित्र में यह शिक्षा है कि कोई उत्साही, धार्मिक,
समाज हितैषी एक ही शक्ति सत्कार्य के लिए आगे बढ़े तो उसे
अपने आप शक्तियाँ मिलने लगती हैं । इसके साथ यह भी ध्यान
रहना चाहिए कि जब अन्य किसी उपाय से आसुरी शक्ति का
दमन न हो तभी युद्ध का प्रयोग करना चाहिए । आपको जो भी
दैवी-शक्ति मिले उसका उपयोग संहार के लिए नहीं सुधार के
लिए, निर्माण के लिए ही करना चाहिए ।
इन तीनों चरित्रों में इच्छा, ज्ञान-क्रिया का सुन्दर समन्वय
है । इच्छाओं का होना स्वाभाविक है, किन्तु सावधानी से सजगता
से उस इच्छा को ज्ञान से सम्बन्धित करके ही क्रियान्वित करना
चाहिए । बिना विचारे, विवेक का अनादर करक इच्छा-पूर्ति
का प्रयत्न महाभारत में दुर्योधन और इस ग्रन्थ में मधु-कैटभ एवं
शुँभ-निशुँभ आदि का है । इच्छा-शक्ति महालक्ष्मी, ज्ञान-शक्ति
महा सरस्वती और क्रिया शक्ति महा काली है । ये तीनों एक
ही हैं । इनकी आराधना से मुक्ति ही सुलभ होती है, किन्तु
पञ्च क्लेशों में फँसा जीव कामनाओं के साथ जीवित रहता है ।
अतः यही पराम्बा ऐसे जनों को भी उनके मनोरथों की पूर्ति
करके श्रद्धा जगाकर धर्म में प्रवृत्त करती है । इनका उद्देश्य
भौतिकता में फँसाना नहीं, अपितु वैराग्य देकर अशुभ से हटा
शुभ में लगाना है । कुछ प्रयोग नीचे दिये जा रहे हैं-
कामना के अनुसार मंत्र से लाल चंदन सहित घृत द्वारा
पाँच माला हवन करके उस मंत्र का विधिवत् अनुष्ठान करने से
सिद्धि मिलती है ।
१) पत्नी प्राप्ति के लिए-
पत्नीं मनोरमां देहि, मनोवृत्तानुसारिणीम् ।
तारिणीं दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम् ॥