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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 156 में से

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पृष्ठ 37

१३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
का भयावना रूप है और करुणामयी माँ की दृष्टि वालों के लिए
पराम्बा का सौम्य रूप है । इनके कहीं दो, कहीं चार, कहीं
आठ तथा कहीं अठारह हाथ हैं जिनमें खड्ग, खप्पर, त्रिशूल,
वाण, मूसल, गदा, शङ्ख, चक्र, पद्म आदि आयुध हैं । इन
आयुधों के भी विशेष अर्थ हैं ।
सप्तशती की गीता से साम्यता
सप्त - सात, शत-सौ, सात सौ की संख्या वाली
रचना की संज्ञा 'सप्त-शती' होती है । इस ग्रन्थ के सात सौ
श्लोकों द्वारा माँ पराम्बा की उपासना के साथ - साथ उनका
चारित्रिक महत्व - लीलाओं का भी प्रतिपादन हुआ है । कतिपय
विद्वान् इस ग्रन्थ को आगम ही स्वीकारते हैं; जबकि यह वैदिक
परम्परा के अनुसार है । इस पर यहाँ थोड़ा विचार कर लेना
युक्ति संगत एवं उपादेय ही है । श्रीमद्भगवद् गीता का नाम
प्रस्थान-त्रयी के अन्तर्गत है; दुर्गा - सप्तशती ठीक इसी गीता के
अनुसार समरूप उपदेशात्मक एवं कल्याण कारक ग्रन्थ हैं, क्योंकि
दोनों के रचयिता महर्षि वेद व्यास जी हैं, दोनों के मंत्रों की
संख्या सात सौ है । दोनों के श्रोता और वक्ता भी एक ही हैं ।
अर्जुन का ही नाम सुरथ है और वक्ता, मेधा, बुद्धि, सारथि
बासुदेव हैं । दोनों के अवतारों का प्रयोजन भी एक ही है ।
निम्न श्लोकों पर ध्यान दीजिए-
यदा-यदा हि धर्मस्य, ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य, तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥गीता ।४।
इत्थं यदा यदा बाधा, दानवोत्था भविष्यति ।
तदा तदावतीर्याऽहं, करिष्याम्यरि संक्षयम् ॥दु. स, १२॥
दोनों की प्रारम्भ में स्थिति भी समान है । जैसे अर्जुन
परिवार के प्रति मोहित है, उसी प्रकार सुरथ भी मोह ग्रस्त है ।
इस प्रकार दोनों की स्थैत्य एवं उपदेशात्मकता की समता तथा