दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १४
एक रूपता पूर्णतः विद्यमान है । यही नहीं अपितु फलागम की
उपलब्धि भी समान है । अर्जुन भी सुरथ की तरह विजयी
होकर राजा हुआ । अतः सुधीजन स्वयं इसका निर्णय करें ।
दुर्गा-सप्तशती में तीन चरित्र हैं । प्रथम चरित्र से यह
शिक्षा मिलती है कि जगत का कोई कार्य अपनी सोयी हुई शक्ति
को जगाये बिना कभी नहीं हो सकता । स्वयं कोई कार्य नहीं
कर सकते । इसके अतिरिक्त पशु-शक्ति से बुद्धि-शक्ति की श्रेष्ठता
भी इस चरित्र में प्रतिपादित हुई है । पशु-बल सम्पन्न मधु-कैटभ
बुद्धि-बल युक्त विष्णु का सामना करते रहे; जब अहंकार से
उन्मत्त होकर वरदान देने के लिये तैयार हो गये, तब विष्णु ने
बुद्धि शक्ति का प्रयोग कर उन्हीं के वध का वर मांग लिया ।
यही बुद्धि-शक्ति पराम्बा माँ ही है जो कि ‘बुद्धिरूपेण संस्थिता !
मूल ग्रन्थ में उक्त है ।
एक बात और है कि वैष्णव और शक्ति परस्पर सद्भाव
पूर्ण होकर एक दूसरे के इष्ट का सम्मान करें । विष्णु की ही शक्ति
पराम्बा है; और पराम्बा की सहायता से विष्णु जी के समस्त
कार्य होते हैं जैसा कि मधु-कैटभ प्रसङ्ग से स्पष्ट है ।
द्वितीय चरित्र में ‘संघे - शक्ति’ की शिक्षा दी गई है ।
बहुत बड़ा असुर ‘महिषासुर’ महा-शक्ति के द्वारा शीघ्र मारा
जाता है । वह महा-शक्ति सभी देवताओं के मिलने से तथा सभी
देवों के अस्त्र-शस्त्रों से युक्त होने पर ही दैत्य-दलन में समर्थ
हुई है । परिवार एवं समाज के प्रत्येक व्यक्ति को यह संगठन
एवं सहयोग की शिक्षा लेनी चाहिए । मधु-पीने की बात का भी
अर्थ उत्साह है । प्रायः जीवन में देखा गया है कि उत्साह के
अभाव में बड़े-बड़े परमाणु अस्त्रों के भण्डारण का प्रयोग भी
निष्फल ही होता है, किन्तु उत्साह तथा अपनी निजी संगठन शक्ति
यदि नहीं है तो केवल अस्त्र-शस्त्र से भी सिद्धि नहीं मिलती । ठीक
इसी प्रकार उत्साह एवं साहस तो बहुत है, किन्तु न संगठन है