दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १६
२) रोग नाश के लिये-
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा,
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां,
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति । ११/२६
३) उत्तम वर प्राप्ति के लिये-
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि ।
नन्दगोप सुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः ॥
श्रीमद्भागवत १०/२२
उक्त मंत्र से लाल चन्दन मिश्रित घृत से पाँच माला प्रथम
दिन हवन करके प्रतिदिन २१ इक्कीस माला जपने से निश्चित
ही योग्य वर (ईश्वर के समान) मिलता है ।
४) विपत्ति नाश के लिए-
(क) देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीते-
र्नित्यं यथासुर वधादधुनैव सद्यः ।
पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु,
उत्पात पाकजनितांश्च महोपसर्गान् । ११/३४
अथवा
(ख) शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे,
सर्वस्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोस्तुते । ११/१०
५) भय नाश के लिए-
सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते,
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोस्तुते ।
अथवा
एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रय भूषितम् ।
पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोस्तुते ।
अध्याय ११/२३-२४