दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
पुराणों में सीता, लक्ष्मी, राधा, उमा आदि नामों से यही
शक्ति अभिहित है जो 'केनोपनिषद्' के यक्ष प्रसङ्ग में ब्रह्म-विद्या
होकर देवों को उपदेश देती है । ऋग्वेद में यही वाक्-शक्ति है ।
सांख्य-दर्शन में इसी का नाम 'अमृता' है । कहा है—पुरुषे षोडश
कले तामाहुमृतां कलाम् ।'
ऋषियों के विचार से प्रतिपाद्य वस्तु का प्रतिपादन
पुराण, श्रुति, ध्वनि, तेज, प्रभा इन पांच प्रकार से होता है ।
इसी क्रम से उनका वर्णन भी है । इसी देवी से अवतारों का
प्राकट्य इस क्रम से प्रतिपादित है । देवी के दायें हाथ के अंगूठे
से मत्स्य, तर्जनी से कूर्म, मध्यमा से वराह, अनामिका से नृसिंह,
कनिष्ठा से वामन और बायें हाथ के अंगूठे से परशुराम, तर्जनी
से राम, मध्यमा से कृष्ण, अनामिका से बुद्ध जी प्रकट हुये हैं ।
कश्मीर की पावन कन्दराओं से लेकर कन्या कुमारी तक,
कच्छ से लेकर कामाख्या तक सम्पूर्ण भारत में इस पराम्बा
शक्ति की अनेक स्थलों पर ख्याति प्राप्त सिद्ध पीठें हैं, जहाँ माँ
के परम उपासक उपासना के माध्यम से अभीष्ट प्राप्त करते हैं
ये सिद्ध पीठें सर्वत्र हैं जिनमें काशी, काञ्ची, मलयगिरि, विन्ध्य
मालावार, मालवा, गुजरात, दतिया, प्रयाग, बंगाल तथा नेपाल
कामाख्या आदि में विशेष प्रसिद्ध हैं ।
यही शक्ति दस महा विद्याओं के रूप में वर्णित है—
काली तारा महाविद्या षोडशी भुवनेश्वरी ।
भैरवी छिन्न मस्ता च विद्या धूमावती तथा ॥
बगला सिद्ध विद्या च मातंगी कमलात्मिका ।
एतादश महा विद्या *सर्व तन्त्रेषु गोपिता ॥
- (सिद्ध विद्या प्रकीर्तिता पाठान्तर)
इनमें से किसी एक की उपासना में दीक्षित होकर ही
आराधना की जाती है ।
समस्त शाक्त - उपासना का लक्ष्य 'सर्वं खलु, इदं ब्रह्म'
का ज्ञान ही है ।” इसी की सिद्धि हेतु 'दुर्गा-पूजा' महोत्सव क
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६
आयोजन होता है । यही दुर्गा-पूजा, दुर्गा सप्तशती में कही गई
है । एनर्जी पावर कहकर वैज्ञानिक भी इसे मानते हैं, किन्तु कुछ
कौल मतावलम्बियों के द्वारा आचारहीन-कृत्य किये जाने के
कारण शाक्त लोग समाज में बदनाम भी हुए हैं वस्तुतः यह
उनकी अल्पज्ञता अर्थवाद की अनर्थता के कारण हुई है । किस
शब्द का कहाँ क्या अर्थ होता है ? इस ज्ञान के अभाव में बड़े-
बड़े अनर्थ हुए हैं । अतः इससे बचने के लिए अर्थ समझ लेना
अनिवार्य है । जैसे देवी बलि से प्रसन्न होती है । लोगों ने
इसका अर्थ पशु-बलि ही नहीं, अपितु नर-बलि देने जैसे पाशविक
कृत्य करने का अर्थ ले लिया है, जबकि इस 'बलि' शब्द का
अर्थ स्वयं देवी जी ने स्पष्ट किया है जो दृष्टव्य ही नहीं; अपितु
ध्यातव्य भी है—'काम क्रोधौ द्वौ पशू तावेव बलिमर्पयेत्' अर्थात्
काम - क्रोध दोनों पशु है । मनुष्य जब इन दोनों को सर्वथा नष्ट
करता है, तभी देवी प्रसन्न होती हैं । कुछ दो - चार शब्दों के
उदाहरण प्रस्तुत करना यहाँ प्रासङ्गिक ही नहीं, अपितु अनिवार्य
भी है जिससे सुधीजन तो लाभान्वित होंगे ही, सामान्य जन भी
अनावश्यक पाप कर्म से वञ्चित होकर धर्म लाभ उठावेंगे ।
अब आप 'अजा' शब्द को लीजिए—अजा अविद्या को
कहते हैं । मूर्खों ने अविद्या का संहार करने की अपेक्षा बकरों
की बलि चढ़ाना प्रारंभ कर दिया । इसी प्रकार—मद्य, मांस,
मत्स्य, मैथुन और मुद्रा ये पञ्च मकार बड़े प्रसिद्ध हैं, जिनका
अर्थ न समझ कर अज्ञ तथा इन्द्रिय - लोलुप जनों ने बड़ा ही
दुरुपयोग किया है । वस्तुतः सन्त योगी जन ही इन गुत्थियों को
सुलझा कर मार्ग - दर्शन करते हैं । अतः संक्षेपतः इनका अर्थ
भी देखिए—
१. मद्य (मदिरा)—आत्मानन्द की परम अनुभूति में जो
(भूमा स्थिति) मस्ती आती है उसी को 'मदिरा' कहते हैं । जैसे
भरी है सहस्रार पद्म-रूपी भाजन में, पली है जो चन्द्र की कला
७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
सुधा के स्रव से ? कुण्डलिनी जागरण और अमृत रस या सोम
पान ही मद्य के लिये प्रयुक्त होता है ।
२. मांस-काम, क्रोध, लोभ मोह आदि पशु वृंद हनै, धैर्य
से विवेक रूपी खड्ग चलाय के' इस अर्थ में मांस शब्द का प्रयोग
हुआ है । मांस, उड़द को भी कहते हैं । सूरदास ने अपने कूट
पद (हरि-आहार चलिजात) में इसका अर्थ मांस (मास) महीना
अर्थात् अवधि के रूप में भी किया है ।
३. मत्स्य-विषय विराग रूपी बागुरा बिछाइ दैकै, धीवर
कृती की प्रतिकृति को अनुसरै । द्वेष-मद, मान, दम्भ, मत्सर पशु-
द्वय आदि मीन मति वृद्ध विद्या सहित मेलै धरै । अर्थात् विषय
रूपी जल में आसक्त इन्द्रिय रूपी मछलियों को अलग करना
है ।
४. मैथुन-
पर पद को पहुंची हैं सूक्ष्म रूप नाड़िका जो,
सुषुम्ना है नाम वाको, सुन्दरी समझिये ।
चन्द्र-सूर्य योग में उसी के साथ संग करि,
सुन्दर सब भूषण ले श्यामा को साजिये ।'
अर्थात् यह दिव्य नाड़ी सुषुम्ना का प्रसंग है । जिसका
इडा-पिंगला (सूर्य-चंद्र) नाड़ियों के साथ समागम है ।
५. मुद्रा-
आशा अरु तृष्णा, भय, घृणा, लज्जा, कोप, जुगुप्सा
(घृणा) ये अष्ट भारी कष्ट कारी हैं । वृक्ष रूपी पावक में आठों
को पकायदे वै, तांत्रिक क्रिया कलाप के जो अधिकारी हैं ।"
भावानुकारिणी आकृति - विकृति ही मुद्रायें हैं । गायत्री - जप के
पूर्वापर में भी मुद्रायें की जाती हैं। जिज्ञासु जन इन पाँचों मकारों
के अर्थ 'दुर्गा-महिमा' ग्रन्थ में विस्तार से देख सकते हैं ।
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ८
“वरिवर्या रहस्य” की टीका में पूज्य चरण स्वामी जी
महाराज (दतिया) ने पञ्च मकारों का अर्थ विस्तार से इस
प्रकार समझाया है ।
(१) मत्स्य-
गङ्गा यमुनयोर्मध्ये द्वौ मत्स्यौ चरतः सदा ।
तौ मत्स्यौ भक्षयेद् यस्तु स भवेन्मत्स्य साधकः
इडा भागीरथी गङ्गा पिङ्गला यमुना नदी ।
तयोर्मध्यगा नाड़ी सुषम्णास्था सरस्वती,
त्रिवेणी संगमो यत्र तीर्थ-राजः स उच्यते ।
क्रमशः इडा, पिङ्गला. सुषुम्ना का मिलन ही गंगा-यमुना-
सरस्वती के मिलन का तीर्थराज प्रयाग है । इन दोनों नाड़ियों
की साधना ही मत्स्य साधना है, मत्स्य भक्षण नहीं ।
(२) मुद्रा-
सत्सङ्गेन भवेन्मुक्तिरसत्सङ्गेषु बन्धनम् ।
असत्सङ्ग मुद्रणं यस्तु तन्मुद्रा परिकीर्तिता ॥
सत्संग से चिर शान्ति, स्वाधीनता और रसभरा जीवन
मिलता है तथा असत्संग से बन्धन । अतः कुसंग का त्याग तथा
सत्संग का सेवन ही मुद्रा सेवन है ।
(३) मैथुन-
इड़ा पिङ्गल्योः प्राणान् सुषम्नायां प्रवर्तयेत् ।
सुषुम्ना शक्ति रुद्दिष्टा जीवोऽयं तु परः शिवः ॥
तयोस्तु सङ्गमे देवैः सुरतं नाम कीर्तितम् ।
अर्थात् इडा - पिङ्गला नाड़ियों के माध्यम से प्राणों को
सुषुम्ना में प्रवर्तन करने वाला प्राणी शिवत्व प्राप्त कर लेता
है । इन दोनों के साथ सुषुम्ना के मिलन को देवों ने 'सुरत'
मैथुन कहा है । इसे सहज ही यूँ भी कह सकते हैं कि दायीं
नासिका में (सूर्य) 'पिगंला', बायीं नासिका में (चन्द्र) 'इडा' है।
६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
गुरुजनों के सान्निध्य में इन दोनों को सुषुम्ना में संगत करना
मैथुन है, दुराचार साधन करना नहीं । इस कथन की पुष्टि
निम्न श्लोक से भी होती है ।
पर द्रव्येषु योऽन्धः, पर स्त्रीषु नपुंसकः ।
परापवादे यो मूकः सर्वदा विजितेन्द्रियः ।
उक्त श्लोक में पर द्रव्यों के प्रति उदासीन, दूसरी स्त्रियों
के प्रति नपुंसकत्व तथा पर निन्दा के प्रकरण में मौन धारण
करने वाले जितेन्द्रिय पुरुष ही महा - महिम एवं गौरवशाली हैं
मत्स्य, मुद्रा, मैथुन, मदिरा, मांसाहारी नहीं ।
४. मांस-५. मदिरा-इन दोनों को आप पूर्व वर्णित रूप
में ही ग्रहण करें ।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो गया कि काम, क्रोधादि
की बलि देना तथाकथित पञ्च मकारों का सेवन करना साधना
है । इसी से तंत्र-साधना कठिन मानी गई है । जानकार तत्त्वज्ञ
महा पुरुषों की सेवा एवं आराधना वेद - भगवान् में भी प्रति -
पादित है । उनकी सेवा से ज्ञान की प्राप्ति एवं आनन्द की
उपलब्धि होती है । इनकी महिमा देखिए-
कामान् यः कामयते मन्यमानः, सः कामभिर्जायते तत्र तत्र ।
पर्याप्त कामस्य कृतात्मनस्त्विहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः ॥
अर्थात् कामनाओं की पूर्ति हेतु प्रयत्न करने वालों को
बार - बार जन्म लेना पड़ता है किन्तु आप्त काम अनपेक्ष भगवद्
भक्तों को जीव-मुक्ति का आनन्द यहीं मिल जाता है ।
यं यं लोकं मनसा संविभाति,
विशुद्ध सत्वः कामयते यांश्चकामान् ।
तं तं लोकं जयते तांश्च,
कामास्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद्भूतिकामः ॥
ऐसे महापुरुषों के संकल्प स्वयं सिद्ध होते हैं । जो लोग
उनकी सेवा करते हैं, उन्हें भी सब कुछ मिल जाता है ।
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १०
इस प्रकार सत्सङ्ग से, पञ्च मकार सेवन से सत्व गुण की
वृद्धिहोती है । त्रिगुणमयी प्रकृति से परे परम तत्व की उपलब्धि
आत्मस्वरूप में होती है । प्रत्येक जीव में ईश्वर ने दिव्य गुण
दिये हैं, उन्हें प्रकट करना ही पुरुषार्थ है । शरीर क्षेत्र (खेत) है
'इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते' गीता (१३) । इसमें
दोनों प्रवृत्तियाँ हैं—सत्य क्षमादि सात्विकी तथा काम - क्रोधादि
तामसी । ये ही कभी धर्मराज - दुर्योधन तो कभी राम - रावण
कभी कृष्ण-कंस और कभी महिषासुर, चण्ड-मुण्डादि कह दिये
जाते हैं । देवासुर संग्राम अपने भीतर देखना ही साधना है,
आसुरी प्रवृत्तियों को जीतना ही पुरुषार्थ है ।
सच्चे साधक को सदैव निन्दा से दूर रहना अपेक्षित है ।
उसे किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिए । विशेषतः उसमें भी
'स्त्रियं न निन्देत' के अनुसार स्त्रियों की तो कदापि निन्दा न
करें, क्योंकि नारी तो सभी पराम्बा स्वरूपा ही हैं । तभी
'या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता' कहा है । इसी आचार
से माँ के किसी निम्नलिखित रूप का ध्यान करके लक्ष्य-सिद्धि
संभव है, क्योंकि यही आचार पुरुषार्थ है ।
माँ के ये मुख्य आठ रूप ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी,
वैष्णवीं, वाराही, नारंसिही, ऐन्द्री, चामुण्डा नामों से उल्लिखित
हैं, ये आठ शक्तियों के रूप में प्रसिद्ध हैं । दृष्टान्त के रूप में
'चामुण्डा' को ही ले लीजिए । 'चामुण्डा' आठवी शक्ति का नाम
चामुण्डा है । प्रवृत्ति का अर्थ चण्ड तथा निवृत्ति का अर्थ मुण्ड
है । ये दोनों भाई हैं जो काम और क्रोध के रूप में भी माने
गये हैं । पाणिनि जी की 'चडि कोपे तथा मुडि खण्डने धातुओं
से इसकी निष्पत्ति हुई है ।' इसकी संहारक शक्ति का नाम ही
चामुण्डा है, जो स्वयं प्रकाशमान हैं । वे किसी आधार को लेकर
प्रकाशित नहीं हैं । अतः इनका कोई वाहन भी नहीं बतलाया
गया है । इस पराम्बा शक्ति के पाँच कार्य बताये गये हैं ।
११ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
जगन्माता के पाँच कार्य—(१) तिरोभाव (२) सृष्टि
(३) स्थिति (४) अनुग्रह (५) संहार हैं। भगवान् नारायण
की सत्व-गुण से प्रकट एवं सदैव विद्यमान रहने वाली शक्ति ही
यह पराम्बा है। आइए नारायण ! अब थोड़ा इसके स्वरूप पर
विचार करें।
देवी का स्वरूप (बह्वृचोपनिषद्)
प्रज्ञाने ब्रह्मेति वा अहं ब्रह्मास्मि वा भाष्यते। तत्वमसीत्येव
सम्भाष्यते। अयमात्मा ब्रह्मेति वा अहं ब्रह्मास्मि वा ब्रह्म वा-
हमस्मीति वा योऽहमस्मीति। वा सोऽहमस्मीति वा योऽसौ
सोऽहमस्मीति वा या भाष्यते।
दुर्गा-सप्तशती के अध्याय ४ मंत्र ९ के अनुसार—
या मुक्ति हेतुरविचिन्त्य महाव्रता त्व-
मभ्यस्यसे सुनियतेन्द्रिय तत्त्व सारैः
मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्त समस्त दोषै-
र्विद्यासि सा भगवती परमाहि देवि ॥अ. ४।९॥
अर्थात् प्रज्ञान ही ब्रह्म है अथवा मैं ही ब्रह्म हूँ, आदि
वाक्य उसी परम तत्व को प्रकट करते हैं। वही भगवती सृष्टि
से पूर्व थी और उसी ने संसार की रचना की है-‘देवी ह्येकाऽग्रा
सीत् सैव जगदण्डमसृजत।' (बह्वृचोपनिषद्) वही आत्म-शक्ति,
विश्व मोहिनी, पाश-अंकुश एवं धनुर्वाण धारिणी महा - विद्या
है।
शक्ति के अर्थ भी इस प्रकार हैं—शक्तिः, पराक्रमः, प्राणः
अथवा कास् सामर्थ्ये शक्तिः, वा शक्लृ शक्तौऽर्थेमें शक्ति, सामर्थ्य,
प्राण, पराक्रम आदि अर्थ में प्रयुक्त होती है।
१. भगवतः शक्तिः-यह षष्ठी तत्पुरुष द्वारा भगवान् की
शक्ति सिद्ध करती है। ईश्वर को प्रेरणा देती है।
२. भगवति शक्तिः-इस सप्तमी अर्थ में भगवान् के
उपासकों के लिए संकेत करती हैं।
प्रथम चरित्र: मधु-कैटभ वध एवं महाकाली प्रादुर्भाव (अध्याय १)
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १२
३. भगवती चासौ शक्ति-यह कर्म धारय भगवती के ऐश्वर्यों
का संकेत करती है । जैसे कहा है-यत्रास्ति मोक्षः, नहि तत्र-
भोगः, यत्रास्ति भोगः नहि तत्र मोक्षः ! श्री सुन्दरी साधन
तत्पराणां भोगश्च मोक्षश्च करस्थ एव ! अर्थात् जहाँ भोग है
वहाँ मोक्ष नहीं और जहाँ मोक्ष हैं वहाँ भोग नहीं किन्तु माँ के
उपासकों के लिए ये दोनों ही सहज सुलभ हैं ।
४. भगवान् चासौ शक्तिश्च-इस द्वन्द्वार्थ में भगवती और
भगवान् में अभेद सिद्ध होता है ।
दुर्गा-सप्तशती
भगवती और भगवान्, शक्ति और शक्तिमान् की अभेदता
जान लेने के उपरान्त यह भी पूर्णतः शाश्वत् सत्य है कि इस
शक्ति की सत्ता सर्वत्र परिलक्षित हो रही है । यह जगत्प्रपञ्च
इसी चिद्विलासिनी की लीला है । अतः जीव-मात्र का इस
लीलामयी की कृपा-दृष्टि के लिये लालायित होना नैसर्गिक है ।
संतों ने दिग्भ्रमित भटकते हुए अनाथ जीव को इस पराम्बा,
जगज्जननी जगत्स्वरूपा, परा-शक्ति आत्म स्वरूपा तक पहुंचने
के लिए जो अनेक साधन बताये हैं । उनमें 'दुर्गा-सप्तशती' का
साधकों के लिए विशेष महत्वपूर्ण स्थान रहा है । इसलिए, आइए
हम यहाँ 'दुर्गा' एवं 'सप्तशती' पर विचार करें ।
दुर्गा-वेद, पुराण और उपनिषद् जिसे दुर्गा (जगदम्बा)
मानते हैं, सभी के सोने पर जो स्वयं जगती हैं । जिसकी सहायता
से ब्रह्मा, विष्णु, महेश क्रमशः सृष्टि का सृजन, पोषण एवं संहार
करते हैं । जिससे तीनों गुण तथा पञ्च महाभूत कार्य करते हैं ।
जिसकी इच्छा से ही समष्टि व्यष्टि में, कण से लेकर पर्वत तक,
चींटी से ब्रह्मा तक व्यवहार हो रहा है । वही यह दुर्ग-विनाशिनी
प्राणी मात्र के कष्ट-निवारिणी, संकट-हारिणी माँ 'दुर्गा' है ।
इनकी ओर कुदृष्टि से देखने वालों के लिए इनका सिंह-वाहिनी
१३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
का भयावना रूप है और करुणामयी माँ की दृष्टि वालों के लिए
पराम्बा का सौम्य रूप है । इनके कहीं दो, कहीं चार, कहीं
आठ तथा कहीं अठारह हाथ हैं जिनमें खड्ग, खप्पर, त्रिशूल,
वाण, मूसल, गदा, शङ्ख, चक्र, पद्म आदि आयुध हैं । इन
आयुधों के भी विशेष अर्थ हैं ।
सप्तशती की गीता से साम्यता
सप्त - सात, शत-सौ, सात सौ की संख्या वाली
रचना की संज्ञा 'सप्त-शती' होती है । इस ग्रन्थ के सात सौ
श्लोकों द्वारा माँ पराम्बा की उपासना के साथ - साथ उनका
चारित्रिक महत्व - लीलाओं का भी प्रतिपादन हुआ है । कतिपय
विद्वान् इस ग्रन्थ को आगम ही स्वीकारते हैं; जबकि यह वैदिक
परम्परा के अनुसार है । इस पर यहाँ थोड़ा विचार कर लेना
युक्ति संगत एवं उपादेय ही है । श्रीमद्भगवद् गीता का नाम
प्रस्थान-त्रयी के अन्तर्गत है; दुर्गा - सप्तशती ठीक इसी गीता के
अनुसार समरूप उपदेशात्मक एवं कल्याण कारक ग्रन्थ हैं, क्योंकि
दोनों के रचयिता महर्षि वेद व्यास जी हैं, दोनों के मंत्रों की
संख्या सात सौ है । दोनों के श्रोता और वक्ता भी एक ही हैं ।
अर्जुन का ही नाम सुरथ है और वक्ता, मेधा, बुद्धि, सारथि
बासुदेव हैं । दोनों के अवतारों का प्रयोजन भी एक ही है ।
निम्न श्लोकों पर ध्यान दीजिए-
यदा-यदा हि धर्मस्य, ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य, तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥गीता ।४।
इत्थं यदा यदा बाधा, दानवोत्था भविष्यति ।
तदा तदावतीर्याऽहं, करिष्याम्यरि संक्षयम् ॥दु. स, १२॥
दोनों की प्रारम्भ में स्थिति भी समान है । जैसे अर्जुन
परिवार के प्रति मोहित है, उसी प्रकार सुरथ भी मोह ग्रस्त है ।
इस प्रकार दोनों की स्थैत्य एवं उपदेशात्मकता की समता तथा
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १४
एक रूपता पूर्णतः विद्यमान है । यही नहीं अपितु फलागम की
उपलब्धि भी समान है । अर्जुन भी सुरथ की तरह विजयी
होकर राजा हुआ । अतः सुधीजन स्वयं इसका निर्णय करें ।
दुर्गा-सप्तशती में तीन चरित्र हैं । प्रथम चरित्र से यह
शिक्षा मिलती है कि जगत का कोई कार्य अपनी सोयी हुई शक्ति
को जगाये बिना कभी नहीं हो सकता । स्वयं कोई कार्य नहीं
कर सकते । इसके अतिरिक्त पशु-शक्ति से बुद्धि-शक्ति की श्रेष्ठता
भी इस चरित्र में प्रतिपादित हुई है । पशु-बल सम्पन्न मधु-कैटभ
बुद्धि-बल युक्त विष्णु का सामना करते रहे; जब अहंकार से
उन्मत्त होकर वरदान देने के लिये तैयार हो गये, तब विष्णु ने
बुद्धि शक्ति का प्रयोग कर उन्हीं के वध का वर मांग लिया ।
यही बुद्धि-शक्ति पराम्बा माँ ही है जो कि ‘बुद्धिरूपेण संस्थिता !
मूल ग्रन्थ में उक्त है ।
एक बात और है कि वैष्णव और शक्ति परस्पर सद्भाव
पूर्ण होकर एक दूसरे के इष्ट का सम्मान करें । विष्णु की ही शक्ति
पराम्बा है; और पराम्बा की सहायता से विष्णु जी के समस्त
कार्य होते हैं जैसा कि मधु-कैटभ प्रसङ्ग से स्पष्ट है ।
द्वितीय चरित्र में ‘संघे - शक्ति’ की शिक्षा दी गई है ।
बहुत बड़ा असुर ‘महिषासुर’ महा-शक्ति के द्वारा शीघ्र मारा
जाता है । वह महा-शक्ति सभी देवताओं के मिलने से तथा सभी
देवों के अस्त्र-शस्त्रों से युक्त होने पर ही दैत्य-दलन में समर्थ
हुई है । परिवार एवं समाज के प्रत्येक व्यक्ति को यह संगठन
एवं सहयोग की शिक्षा लेनी चाहिए । मधु-पीने की बात का भी
अर्थ उत्साह है । प्रायः जीवन में देखा गया है कि उत्साह के
अभाव में बड़े-बड़े परमाणु अस्त्रों के भण्डारण का प्रयोग भी
निष्फल ही होता है, किन्तु उत्साह तथा अपनी निजी संगठन शक्ति
यदि नहीं है तो केवल अस्त्र-शस्त्र से भी सिद्धि नहीं मिलती । ठीक
इसी प्रकार उत्साह एवं साहस तो बहुत है, किन्तु न संगठन है
१५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
और न युद्ध के उपकरण, तो भी सिद्धि नहीं मिलती, अतः दोनों
ही अनिवार्य हैं ।
तृतीय चरित्र में यह शिक्षा है कि कोई उत्साही, धार्मिक,
समाज हितैषी एक ही शक्ति सत्कार्य के लिए आगे बढ़े तो उसे
अपने आप शक्तियाँ मिलने लगती हैं । इसके साथ यह भी ध्यान
रहना चाहिए कि जब अन्य किसी उपाय से आसुरी शक्ति का
दमन न हो तभी युद्ध का प्रयोग करना चाहिए । आपको जो भी
दैवी-शक्ति मिले उसका उपयोग संहार के लिए नहीं सुधार के
लिए, निर्माण के लिए ही करना चाहिए ।
इन तीनों चरित्रों में इच्छा, ज्ञान-क्रिया का सुन्दर समन्वय
है । इच्छाओं का होना स्वाभाविक है, किन्तु सावधानी से सजगता
से उस इच्छा को ज्ञान से सम्बन्धित करके ही क्रियान्वित करना
चाहिए । बिना विचारे, विवेक का अनादर करक इच्छा-पूर्ति
का प्रयत्न महाभारत में दुर्योधन और इस ग्रन्थ में मधु-कैटभ एवं
शुँभ-निशुँभ आदि का है । इच्छा-शक्ति महालक्ष्मी, ज्ञान-शक्ति
महा सरस्वती और क्रिया शक्ति महा काली है । ये तीनों एक
ही हैं । इनकी आराधना से मुक्ति ही सुलभ होती है, किन्तु
पञ्च क्लेशों में फँसा जीव कामनाओं के साथ जीवित रहता है ।
अतः यही पराम्बा ऐसे जनों को भी उनके मनोरथों की पूर्ति
करके श्रद्धा जगाकर धर्म में प्रवृत्त करती है । इनका उद्देश्य
भौतिकता में फँसाना नहीं, अपितु वैराग्य देकर अशुभ से हटा
शुभ में लगाना है । कुछ प्रयोग नीचे दिये जा रहे हैं-
कामना के अनुसार मंत्र से लाल चंदन सहित घृत द्वारा
पाँच माला हवन करके उस मंत्र का विधिवत् अनुष्ठान करने से
सिद्धि मिलती है ।
१) पत्नी प्राप्ति के लिए-
पत्नीं मनोरमां देहि, मनोवृत्तानुसारिणीम् ।
तारिणीं दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम् ॥
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १६
२) रोग नाश के लिये-
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा,
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां,
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति । ११/२६
३) उत्तम वर प्राप्ति के लिये-
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि ।
नन्दगोप सुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः ॥
श्रीमद्भागवत १०/२२
उक्त मंत्र से लाल चन्दन मिश्रित घृत से पाँच माला प्रथम
दिन हवन करके प्रतिदिन २१ इक्कीस माला जपने से निश्चित
ही योग्य वर (ईश्वर के समान) मिलता है ।
४) विपत्ति नाश के लिए-
(क) देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीते-
र्नित्यं यथासुर वधादधुनैव सद्यः ।
पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु,
उत्पात पाकजनितांश्च महोपसर्गान् । ११/३४
अथवा
(ख) शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे,
सर्वस्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोस्तुते । ११/१०
५) भय नाश के लिए-
सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते,
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोस्तुते ।
अथवा
एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रय भूषितम् ।
पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोस्तुते ।
अध्याय ११/२३-२४
१७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
६) बाधा शान्ति हेतु-
सर्वा बाधा विनिर्मुक्तो धन-धान्य सुतान्वितः ।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः ॥ १२/१३
अथवा
सर्वा बाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरि विनाशनम् ॥ ११/३६
७) दरिद्रता नाश हेतु-
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः,
स्वस्थैःस्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।
दारिद्र्य दुःख भय हारिणि का त्वदन्या,
सर्वोपकार करणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता ॥ ४/१७
८) मोक्ष प्राप्ति हेतु-
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्त वीर्या,
विश्वस्य बीजं परमासि माया ।
सम्मोहितं देवि समस्तमेतत्,
त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्ति हेतुः ॥ ११-५ ॥
इसके अतिरिक्त लक्ष्मी-प्राप्ति के अभिलाषी को नित्य-
प्रति चतुर्थ अध्याय तथा ज्ञान-प्राप्त्यर्थ ग्यारहवें अध्याय का पाठ
करना चाहिए ।
कुछ सौंदर्य लहरी के भी सिद्ध प्रयोग दिये जा रहे हैं ।
कामना अनुसार यंत्र को स्वर्ण-धातु से बनाकर पूजन करें
और उनमें लिखी संख्यानुसार सौंदर्य-लहरी के उस श्लोक का
जप करें ।
१-मंत्र ६३ :
[यंत्र: ह्रीँ] प्रतिदिन तीस हजार के जप क्रम से तीस
दिन तक करने से वशीकरण होता है ।
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १८
२-मंत्र ६० :
[यंत्र: श्रीं] पैंतालीस दिनों तक एक हजार नित्य जपने
से 'सर्वज्ञान' होता है ।
३-मंत्र ३२ :
[यंत्र: श्रीं] पैंतालीस दिनों तक प्रतिदिन एक हजार
जपने से धन वृद्धि होती है ।
४-मंत्र २७ :
[यंत्र: ह्रीं] पैंतालीस दिनों तक प्रतिदिन एक हजार
जपने से ईश्वर दर्शन एवं आत्म ज्ञान होता
है ।
५-मंत्र ८८ :
[यंत्र: ह्रीं] २१ दिन तक छः हजार जपने से सभी रोगों
का नाश ।
६-मंत्र ३० :
[यंत्र: ॐ] छियाणवें दिन तक एक हजार नित्य जपने
से आधिदैविक शक्ति प्राप्ति ।
७-मंत्र ५२ :
[यंत्र: रं] पैंतालोस दिनों तक प्रतिदिन एक हजार
जपने से कान तथा नेत्र चिकित्सा ।
orधis right near the left margin! OR, wait, could it beध? Wait, look at ध-मंत्र ७६ :: Wait, is it ध? If the vertical stem broke off, only the curved left part would print, which looks EXACTLY like ६! Wait, but what if it's ६? If it were ६, what would the one above it be? द? Why would दbe followed by६? Wait, could the one above be ८? No, ८has no reason to be above६. Could it be ५? No, it's NOT ५. What if the first one is ८? No, in Hindi: १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०. Could it be ८-मंत्र १६and९-मंत्र ७६? Wait! In Bengali or Maithili or something? No, this is standard Hindi. Wait, what if it's दandध? Let's look at द-मंत्र १६ : andध-मंत्र ७६ : Wait, what if it isध? Let's look at how it appears: in transcription, should we write ध-मंत्र ७६ :or६-मंत्र ७६
२० ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
'कवच'
पञ्च क्लेशों तथा कामादि प्रवल शत्रुओं से लड़ने से पहले
कवच पहिनना आवश्यक है । रावण से युद्ध करते समय श्रीराम
ने 'आदित्य हृदय' कवच धारण किया था । प्रत्येक अङ्गों की
रक्षा पराम्बा के नाम विशेष से की जाती है । माँ के उस नाम
के स्वरूप का उस अङ्ग में ध्यान करने से पूर्ण रक्षा होती है ।
यह कवच स्वयं ब्रह्माजी ने बताया है । इसका पाठ आवश्यक है
मात्र बाह्य आयुध रक्षा नहीं करते, रक्षा तो पराम्बा ही करती
है । भगवान् का नाम ही रक्षक है ।
कवच अभेद विप्र पद पूजा,
यही सम विजय उपाय न दूजा । मानस ।
समय आने पर मृत्यु तो सभी की होती है, किन्तु मरने
पर भी अमर हो जाने वाले भगवान् के भक्त ही होते हैं; क्योंकि
वे लोग भगवान् के नाम का कवच पहनते हैं । अपने-अपने इष्ट-
देव का अलग-अलग कवच होता है । साधकों को अपने इष्ट
के अनुसार कवच धारण करना चाहिए । दृष्टान्त के लिए निम्न
श्लोक उद्धृत हैं-
शंखिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वार-वासिनी ।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी ॥ । २३ ।
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका ।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ॥ । २४ ।
इसी प्रकार तत्तदङ्गों में देवीस्वरूप का ध्यान करना
चाहिए-
प्रार्थना (शरण पड़े)
उद्धार करो हे मातः ! तिहारो शरण पड़े ।
भव पार करो हे मातः ! तुम्हारो शरण पड़े ॥
कैसे तेरा नाम रटायें, कैसे तुमसे लगन लगायें ।
हृदय जगा दो मैय्या, तुम्हारी शरण पड़े ॥
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ २१
ऐसी अंतर ज्योति जगाना, हम दीनों को शरण लगाना ।
भटकों को राह दिखाना, मैय्या तेरी शरण पड़े ॥
अर्गला
अर्गला शब्द का अर्थ अवरोध, सांकल या कुण्डा होता है ।
कपाटों के पीछे एक और लोहे या लकड़ी का मोटा डंडा लगाया
जाता है । यदि किसी प्रकार सांकल या कुण्डी खुल भी जाये तो
भी वह डंडा (मूसला या अर्गला) कपाटों को दृढ़ता से बन्द
रखता है इसी प्रकार जीवन को सुरक्षित रखने के लिए यह
अर्गला स्तोत्र है । इसका पाठ करना आवश्यक है , आप जानते
हैं कि भक्त भगवान् की कृपा से ही विकार दूर कर पाते हैं ।
इस अर्गला स्तोत्र के पढ़ने से ऐसा मालूम होता है कि केवल
सांसारिकों के लिए ही नहीं अपितु मुमुक्षुओं के लिए भी
इसका पाठ अनिवार्य है ।
वस्तुतः जो जिस भावना से भगवती का स्मरण करता है,
करुणामयी माँ उसे वही प्रदान करती है । जैसे-“रूपं देहि जयं
देहि, यशो देहि, द्विषो जहि” श्लोकार्द्ध बार-बार आया है ।
इसके शब्दों के अर्थ भावानुसार ही फलितार्थ होते हैं । 'रूपं'
शब्द को ही लीजिए-रूप्यते, अनेनेतिरूपम्-निरूपणीयम् इस अर्थ
में रूप शब्द परमात्मा के लिए हैं । "वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः”
गीता से स्पष्ट है कि सभी वेद-शास्त्रों द्वारा प्रतिपाद्य पदार्थ
परमात्मा ही है, शारीरिक अंग-रंग-नख-शिख सम्बन्धी रूप
अभिप्रेत नहीं । यहाँ माँ से प्रार्थना की गई है कि हे माँ ! मुझे
उस परमात्मा का ज्ञान कराओ, जो श्रेय-प्रेय दोनों हैं; किन्तु
यह ज्ञान तब तक नहीं होता, जब तक कामादि विकारों पर
विजय नहीं मिलती । उपनिषद् में यह घोषणा इस प्रकार की
है :-
ना विरतो दुश्चरितान्ना शान्तो ना समाहितः ।
नाशान्त मानसो वापि, प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥
२२ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
जब तक जीवन से दुश्चरित्र निवृत्त नहीं होते, काम -
क्रोधादि विकार दूर नहीं होते, तब तक अशान्त मन से परमात्मा
की प्राप्ति हो ही नहीं सकती । इसी से साधक प्रार्थना करता है
कि मुझे इन शत्रुओं से विजय दिलाओ, बिना आपकी कृपा के
विजय नहीं मिल सकती । श्री रामजी ने भी शक्ति की पूजा की
थी । अर्जुन ने महाभारत के पहले दुर्गा की आराधना की थी;
अतः विजय प्राप्त करने के लिए 'जयं देहि' कहा गया है । इसके
बाद 'यशो देहि' शब्द बहुत स्पष्ट है । जीवन में यदि अच्छे
कार्य न हो सके, ऐसे शास्त्र-विरुद्ध आचरणों से तो जीवित ही
मर जाना श्रेयस्कर है । भगवान् ने अर्जुन से कहा था कि युद्ध -
पलायन से शत्रु तुम्हारी निंदा करेंगे तब तुम कैसे रह पाओगे ?
‘कीर्तिर्यस्य स जीवति’ का सिद्धान्त है ।
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते । गी/२/३४
जीवन में जितने दिन जीवित हो, उतने ही दिन यशस्वी
होकर जीना चाहिए । इसलिए यश की कामना की गई है ।
द्विषो जहि-जिन विकारों को जीतने के बाद ही साधक
को साध्य की उपलब्धि होती है । उन विकारों का मारना
उतना सरल नहीं है । इसी से माँ से प्रार्थना की गई है कि हे
माँ ! आप करुणा करके हमारे भीतर बसे हुए इन शत्रुओं को
नष्ट कर दो । तुलसी दास जी ने भी प्रार्थना की है-
मम हृदय प्रभु भवन तोरा, वहाँ बसे आय बहु चोरा ।
ते करहिं उपद्रव नाथा, मर्दहिं मोहि जानि अनाथा ॥
इसी प्रकार संस्कृत के विद्वानों ने शत्रुओं पर विजय पाने
के लिए अपने इष्ट देव से प्रार्थनायें की हैं । एक भक्तने काम -
वासना से पीड़ित होकर भगवान् शंकर से प्रार्थना की है :-
भवदुपगमशून्ये मन्मनो दुर्ग मध्ये,
निवसति भयहीनः कामवैरिन् ! रिपुस्ते ।
२३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
स यदि तव विजयस्तूर्णमागच्छ शम्भो !
नृपतिरधिमृगव्यं किन्नुकान्तारमेति ।
हे शिव जी ! आपका शत्रु काम मेरे मन में है; इसे मार
दो । यहाँ भी पराम्बा से शत्रुओं को नष्ट करने की प्रार्थना की
गई है । इस अर्गला स्तोत्र में भगवती के विविध नामों को
लेकर यही वाक्य बार-बार दोहराते हुए भक्त ने निवेदन किया
है । अन्त में ‘पत्नीं मनोरमां देहि, मनोवृत्तानुसारिणीम्, ‘तारिणीं’
दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम् ।' शास्त्रीय तीनों--(धर्म,
काम, अर्थ, दैविक, दैहिक, भौतिक) अर्थों की दृष्टि से लिखा
गया है । केवल आधिभौतिक अर्थ करने से सभी के लिए वह
शास्त्रों का अर्थ पूर्ण नहीं हो सकता है । जैसे एक संन्यासी के
लिए या ब्रह्मचारी के लिए पत्नी मांगना अनुचित है । अतः
उनके लिए यहाँ पत्नी शब्द का अर्थ ‘ब्रह्माकार वृत्ति या
भगवदाकार वृत्ति' है । वास्तव में अविद्या और उसका कार्य
संसार रूपी कूप है । उसमें अज्ञान से पड़ा हुआ जीव कैसे पार
हो, उसके लिए कुछ आश्रय चाहिए । उस आश्रय का अर्थ यहाँ
पत्नी शब्द से कहा गया है । पाणिनिजी ने भी ‘पत्युर्नो यज्ञ
संयोगे' कह कर यह सिद्ध किया है कि धर्म सहचारिणी बनकर
पतन से बचाने वाली पत्नी होती है । साधक जिस कोटि का
होता है, उसके
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ २४
कर्तृत्व भोक्तृत्व समाप्त नहीं होगा, तबतक जन्म-मरण से मुक्ति
नहीं मिल सकती है । वास्तव में जीव नित्य मुक्त ही है,
किन्तु भ्रान्ति वस अपने को कर्ता, भोक्ता, जन्मने, मरने वाला
समझकर दुःखी हो रहा है । अतः ब्रह्म-विद्या से प्रार्थना है कि
मुझे इस संकट से बचाने के लिये आप की कृपा आवश्यक है ।
अथ कीलकम्
अर्गला स्तोत्र के उपरान्त "कीलक" का पाठ किया
जाता है । कीलक के विषय में तान्त्रिकों के अनेक मत हैं !
सात्विक साधकों के लिये अनुपादेय होने के कारण उन प्रसङ्गों
को यहाँ नहीं लिया गया है, केवल दुर्गा सप्त-शती के कुछ
आध्यात्मिक भाव साधकों के मनन करने के लिये प्रस्तुत किये
जा रहे हैं ।
“ददाति प्रतिगृह्णाति, नान्यथैषा प्रसीदति
इत्थं रूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ॥
इस मंत्र पर विद्वानों ने बहुत विचार किया, किन्तु प्रायः
इसका अर्थ सभी प्रकार के लोगों के लिए यही ठीक है जो
गोरखपुर गीता प्रेस वालों ने किया है । न्यायोपार्जित द्रव्य
समर्पित करके उन्हीं का समझ कर प्रार्थना करें —हे माँ ! यह
सारा धन आपको समर्पण कर रहा हूँ, इसमें मेरा कुछ नहीं,
(मुझको इतना ही क्या कम है ? ) । ऐसे कृतज्ञ हृदय के गद्गद्
भाव से माँ के चरणों में निवेदन करे । पुनः ऐसी भावना करे
कि माँ कह रही है-“मैंने स्वीकार किया”-अब तू इसे प्रसाद
रूप समझ कर संसार यात्रा के निर्वाह में सदुपयोग कर । इस
प्रकार माँ की आज्ञा लेकर, प्रसाद समझ कर धर्म - शास्त्र के
अनुसार सदुपयोग करते हुए जीवन यापन करे ।
यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि समर्पण का
जीवन में बहुत महत्त्व है । समर्पण के सम्बन्ध में भागवतकार
का मत देखिए :-