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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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पृष्ठ 35

११ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
जगन्माता के पाँच कार्य—(१) तिरोभाव (२) सृष्टि
(३) स्थिति (४) अनुग्रह (५) संहार हैं। भगवान् नारायण
की सत्व-गुण से प्रकट एवं सदैव विद्यमान रहने वाली शक्ति ही
यह पराम्बा है। आइए नारायण ! अब थोड़ा इसके स्वरूप पर
विचार करें।
देवी का स्वरूप (बह्वृचोपनिषद्)
प्रज्ञाने ब्रह्मेति वा अहं ब्रह्मास्मि वा भाष्यते। तत्वमसीत्येव
सम्भाष्यते। अयमात्मा ब्रह्मेति वा अहं ब्रह्मास्मि वा ब्रह्म वा-
हमस्मीति वा योऽहमस्मीति। वा सोऽहमस्मीति वा योऽसौ
सोऽहमस्मीति वा या भाष्यते।
दुर्गा-सप्तशती के अध्याय ४ मंत्र ९ के अनुसार—
या मुक्ति हेतुरविचिन्त्य महाव्रता त्व-
मभ्यस्यसे सुनियतेन्द्रिय तत्त्व सारैः
मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्त समस्त दोषै-
र्विद्यासि सा भगवती परमाहि देवि ॥अ. ४।९॥
अर्थात् प्रज्ञान ही ब्रह्म है अथवा मैं ही ब्रह्म हूँ, आदि
वाक्य उसी परम तत्व को प्रकट करते हैं। वही भगवती सृष्टि
से पूर्व थी और उसी ने संसार की रचना की है-‘देवी ह्येकाऽग्रा
सीत् सैव जगदण्डमसृजत।' (बह्वृचोपनिषद्) वही आत्म-शक्ति,
विश्व मोहिनी, पाश-अंकुश एवं धनुर्वाण धारिणी महा - विद्या
है।
शक्ति के अर्थ भी इस प्रकार हैं—शक्तिः, पराक्रमः, प्राणः
अथवा कास् सामर्थ्ये शक्तिः, वा शक्लृ शक्तौऽर्थेमें शक्ति, सामर्थ्य,
प्राण, पराक्रम आदि अर्थ में प्रयुक्त होती है।
१. भगवतः शक्तिः-यह षष्ठी तत्पुरुष द्वारा भगवान् की
शक्ति सिद्ध करती है। ईश्वर को प्रेरणा देती है।
२. भगवति शक्तिः-इस सप्तमी अर्थ में भगवान् के
उपासकों के लिए संकेत करती हैं।