दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ८
“वरिवर्या रहस्य” की टीका में पूज्य चरण स्वामी जी
महाराज (दतिया) ने पञ्च मकारों का अर्थ विस्तार से इस
प्रकार समझाया है ।
(१) मत्स्य-
गङ्गा यमुनयोर्मध्ये द्वौ मत्स्यौ चरतः सदा ।
तौ मत्स्यौ भक्षयेद् यस्तु स भवेन्मत्स्य साधकः
इडा भागीरथी गङ्गा पिङ्गला यमुना नदी ।
तयोर्मध्यगा नाड़ी सुषम्णास्था सरस्वती,
त्रिवेणी संगमो यत्र तीर्थ-राजः स उच्यते ।
क्रमशः इडा, पिङ्गला. सुषुम्ना का मिलन ही गंगा-यमुना-
सरस्वती के मिलन का तीर्थराज प्रयाग है । इन दोनों नाड़ियों
की साधना ही मत्स्य साधना है, मत्स्य भक्षण नहीं ।
(२) मुद्रा-
सत्सङ्गेन भवेन्मुक्तिरसत्सङ्गेषु बन्धनम् ।
असत्सङ्ग मुद्रणं यस्तु तन्मुद्रा परिकीर्तिता ॥
सत्संग से चिर शान्ति, स्वाधीनता और रसभरा जीवन
मिलता है तथा असत्संग से बन्धन । अतः कुसंग का त्याग तथा
सत्संग का सेवन ही मुद्रा सेवन है ।
(३) मैथुन-
इड़ा पिङ्गल्योः प्राणान् सुषम्नायां प्रवर्तयेत् ।
सुषुम्ना शक्ति रुद्दिष्टा जीवोऽयं तु परः शिवः ॥
तयोस्तु सङ्गमे देवैः सुरतं नाम कीर्तितम् ।
अर्थात् इडा - पिङ्गला नाड़ियों के माध्यम से प्राणों को
सुषुम्ना में प्रवर्तन करने वाला प्राणी शिवत्व प्राप्त कर लेता
है । इन दोनों के साथ सुषुम्ना के मिलन को देवों ने 'सुरत'
मैथुन कहा है । इसे सहज ही यूँ भी कह सकते हैं कि दायीं
नासिका में (सूर्य) 'पिगंला', बायीं नासिका में (चन्द्र) 'इडा' है।