सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 156 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 33

६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
गुरुजनों के सान्निध्य में इन दोनों को सुषुम्ना में संगत करना
मैथुन है, दुराचार साधन करना नहीं । इस कथन की पुष्टि
निम्न श्लोक से भी होती है ।
पर द्रव्येषु योऽन्धः, पर स्त्रीषु नपुंसकः ।
परापवादे यो मूकः सर्वदा विजितेन्द्रियः ।
उक्त श्लोक में पर द्रव्यों के प्रति उदासीन, दूसरी स्त्रियों
के प्रति नपुंसकत्व तथा पर निन्दा के प्रकरण में मौन धारण
करने वाले जितेन्द्रिय पुरुष ही महा - महिम एवं गौरवशाली हैं
मत्स्य, मुद्रा, मैथुन, मदिरा, मांसाहारी नहीं ।
४. मांस-५. मदिरा-इन दोनों को आप पूर्व वर्णित रूप
में ही ग्रहण करें ।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो गया कि काम, क्रोधादि
की बलि देना तथाकथित पञ्च मकारों का सेवन करना साधना
है । इसी से तंत्र-साधना कठिन मानी गई है । जानकार तत्त्वज्ञ
महा पुरुषों की सेवा एवं आराधना वेद - भगवान् में भी प्रति -
पादित है । उनकी सेवा से ज्ञान की प्राप्ति एवं आनन्द की
उपलब्धि होती है । इनकी महिमा देखिए-
कामान् यः कामयते मन्यमानः, सः कामभिर्जायते तत्र तत्र ।
पर्याप्त कामस्य कृतात्मनस्त्विहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः ॥
अर्थात् कामनाओं की पूर्ति हेतु प्रयत्न करने वालों को
बार - बार जन्म लेना पड़ता है किन्तु आप्त काम अनपेक्ष भगवद्
भक्तों को जीव-मुक्ति का आनन्द यहीं मिल जाता है ।
यं यं लोकं मनसा संविभाति,
विशुद्ध सत्वः कामयते यांश्चकामान् ।
तं तं लोकं जयते तांश्च,
कामास्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद्भूतिकामः ॥
ऐसे महापुरुषों के संकल्प स्वयं सिद्ध होते हैं । जो लोग
उनकी सेवा करते हैं, उन्हें भी सब कुछ मिल जाता है ।