दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १२
३. भगवती चासौ शक्ति-यह कर्म धारय भगवती के ऐश्वर्यों
का संकेत करती है । जैसे कहा है-यत्रास्ति मोक्षः, नहि तत्र-
भोगः, यत्रास्ति भोगः नहि तत्र मोक्षः ! श्री सुन्दरी साधन
तत्पराणां भोगश्च मोक्षश्च करस्थ एव ! अर्थात् जहाँ भोग है
वहाँ मोक्ष नहीं और जहाँ मोक्ष हैं वहाँ भोग नहीं किन्तु माँ के
उपासकों के लिए ये दोनों ही सहज सुलभ हैं ।
४. भगवान् चासौ शक्तिश्च-इस द्वन्द्वार्थ में भगवती और
भगवान् में अभेद सिद्ध होता है ।
दुर्गा-सप्तशती
भगवती और भगवान्, शक्ति और शक्तिमान् की अभेदता
जान लेने के उपरान्त यह भी पूर्णतः शाश्वत् सत्य है कि इस
शक्ति की सत्ता सर्वत्र परिलक्षित हो रही है । यह जगत्प्रपञ्च
इसी चिद्विलासिनी की लीला है । अतः जीव-मात्र का इस
लीलामयी की कृपा-दृष्टि के लिये लालायित होना नैसर्गिक है ।
संतों ने दिग्भ्रमित भटकते हुए अनाथ जीव को इस पराम्बा,
जगज्जननी जगत्स्वरूपा, परा-शक्ति आत्म स्वरूपा तक पहुंचने
के लिए जो अनेक साधन बताये हैं । उनमें 'दुर्गा-सप्तशती' का
साधकों के लिए विशेष महत्वपूर्ण स्थान रहा है । इसलिए, आइए
हम यहाँ 'दुर्गा' एवं 'सप्तशती' पर विचार करें ।
दुर्गा-वेद, पुराण और उपनिषद् जिसे दुर्गा (जगदम्बा)
मानते हैं, सभी के सोने पर जो स्वयं जगती हैं । जिसकी सहायता
से ब्रह्मा, विष्णु, महेश क्रमशः सृष्टि का सृजन, पोषण एवं संहार
करते हैं । जिससे तीनों गुण तथा पञ्च महाभूत कार्य करते हैं ।
जिसकी इच्छा से ही समष्टि व्यष्टि में, कण से लेकर पर्वत तक,
चींटी से ब्रह्मा तक व्यवहार हो रहा है । वही यह दुर्ग-विनाशिनी
प्राणी मात्र के कष्ट-निवारिणी, संकट-हारिणी माँ 'दुर्गा' है ।
इनकी ओर कुदृष्टि से देखने वालों के लिए इनका सिंह-वाहिनी